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जहरीली हवा से छुटकारा कब: गुणवत्ता को 'गंभीर' या 'खतरनाक' के बजाय 'खराब' के रूप में वर्गीकृत किए जाने के मायने

Wed, 16 Nov 2022 02:35 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Wed, 16 Nov 2022 02:35 AM IST
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सार
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा कि 'राज्य सरकारों को उन पराली से छुटकारा पाने के लिए हार्वेस्ट मशीनें उपलब्ध करानी चाहिए, लेकिन वे पर्याप्त संख्या में आवश्यक मशीनें और अन्य उपाय उपलब्ध कराने में विफल रही हैं; नतीजतन, किसान पराली जलाने को मजबूर हैं, जिससे प्रदूषण होता है।
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When to get rid of toxic air: meaning of quality being classified as poor rather than severe or hazardous
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नवंबर के महीने में क्या कभी प्रदूषित हवा से छुटकारा मिल सकता है? अगर आप दिल्ली में रहते हैं, या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र या उत्तर भारत के किसी भी इलाके में रहते हैं, तो यह ऐसा समय है, जब वायु गुणवत्ता सूचकांक (एयर क्वालिटी इंडेक्स-एक्यूआई) हर रोज चर्चा का विषय बन जाता है। हम एक ऐसे चरण में पहुंच गए हैं, जब हवा की गुणवत्ता में थोड़ा-सा भी सुधार होता है और हवा की गुणवत्ता को 'गंभीर' या 'खतरनाक' के बजाय 'खराब' के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, तो जश्न मनाने लगते हैं। 



लेकिन आंशिक रूप से पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने, औद्योगिक एवं वाहनों के धुएं तथा सड़कों की धूल की वजह से दिल्ली की जहरीली, धुएं से भरी हवा उन सभी लोगों के लिए आम बात हो गई है, जो इस शहर में रहते हैं। यह खबर बन जाती है, क्योंकि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है। हर साल सर्दियों में हवा में विषाक्तता कई कारणों से बढ़ जाती है, जिसमें हवा की कम गति, त्योहार की आतिशबाजी और पड़ोसी राज्यों में किसानों द्वारा फसल अवशेषों को जलाना शामिल है। 


मानव स्वास्थ्य पर इसके भयंकर दुष्प्रभावों के बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा है। मगर भारत में वायु प्रदूषण न तो दिल्ली तक सीमित है और न ही सर्दियों तक और न ही शहरों तक। वायु प्रदूषण के बारे में सभी गर्मागर्म चर्चाओं में, जिस बात को अक्सर नजर अंदाज किया जाता है वह है, लोगों के विभिन्न समूहों पर वायु प्रदूषण का अलग-अलग प्रभाव। प्रदूषित हवा सबको प्रभावित करती है, लेकिन समान रूप से नहीं। जिन लोगों को अपनी आजीविका के लिए बाहर रहने की आवश्यकता होती है, वे प्रदूषित हवा से अधिक प्रभावित होते हैं। 

निवास स्थान भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सघन औद्योगिक या व्यावसायिक स्थानों के पास रहने वाले गरीब लोग घर के साथ-साथ काम पर भी औद्योगिक प्रदूषण के अधिक जोखिम का सामना करते हैं। इस आलेख को लिखे जाने के समय दिल्ली का एक्यूआई कुल मिलाकर 295 है, लेकिन दिल्ली में हर कोई एक ही तरह की जहरीली हवा में सांस नहीं ले रहा है। प्रमुख परिवहन केंद्र आनंद विहार, जहां वाहनों के उत्सर्जन और सड़क की धूल की उच्च सांद्रता है और साहिबाबाद का औद्योगिक क्षेत्र तथा पास में स्थित गाजीपुर लैंडफिल का एक्यूआई 342 से ऊपर है।

उन लोगों की स्थिति की कल्पना कीजिए, जिनके पास दिन के अधिकांश समय बाहर रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, जैसे रिक्शा चालकों, सड़क पर दुकान लगाने वालों को जहरीली हवा में सांस लेना पड़ता है। इसके विपरीत, यदि आप दिल्ली के मध्य में स्थित लक्जरी होटल, द ओबेरॉय के मनोरंजन कक्ष में जाते हैं, तो आपको एक संकेत दिखाई देगा कि होटल सुइट्स के भीतर एक्यूआई 10 से कम है। पांच नवंबर को इस लक्जरी होटल के भीतर एक्यूआई वास्तव में सिर्फ तीन था, जबकि उस दिन दिल्ली का कुल एक्यूआई 444 था। 

इस लक्जरी होटल का कहना है कि इसमें अत्याधुनिक केंद्रीकृत वायु शोधन प्रणाली है, जो ग्राहकों के होटल के कमरे में आने और होटल के अन्य हिस्सों में सांस लेने पर हवा को मौलिक रूप से साफ करती है। ओबेरॉय के एक वेटर ने मुझे बताया कि वह केवल स्वच्छ हवा के लाभ के कारण होटल के अंदर लंबे समय तक रहने से खुश है और जब उसने होटल से बाहर कदम रखा, तो उसने मास्क पहना था। अति समृद्ध भारतीय अब एयर प्यूरिफायर लगाकर, घर के अंदर अधिक 'संरक्षित हवा' में खुद को बचाना चाहते हैं और बाहर निकलते समय मास्क लगाते हैं। 

यह मदद तो करता है, लेकिन केवल आंशिक रूप से, क्योंकि एयर प्यूरीफायर पर काफी पैसे खर्च होते हैं और प्रत्येक कमरे को शुद्ध करने में बहुत खर्च आता है। इसके अलावा, हममें से बहुत कम लोग ही हमेशा स्वच्छ हवा वाले परिसरों में कैद होकर रह सकते हैं। दिल्ली की प्रसिद्ध सुंदर नर्सरी ने एक आउटडोर एयर प्यूरीफायर भी लगाया है, लेकिन इसका प्रभाव इसके आसपास तक ही सीमित है। बाकी लोग क्या करें? विशेष रूप से बच्चे और बुजुर्ग वायु प्रदूषण को लेकर ज्यादा संवेदनशील होते हैं। 

भारत में शहरी वायु प्रदूषण से मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की जांच करने वाले 2011 के एक शोध पत्र ने निष्कर्ष निकाला कि ऐसा प्रदूषण विशेष रूप से गरीब लोगों के लिए हानिकारक है। उस शोध पत्र में बताया गया कि 'कम आय वाले लगभग 74 फीसदी लोग सालाना चौबीसों घंटे के औसत 150 माइक्रोग्राम/घन मीटर से अधिक पीएम 10 सांद्रता स्तर में रहते हैं, जबकि मध्यम या उच्च आय वाले लोगों का यह आंकड़ा लगभग 58 फीसदी है। आवासीय क्षेत्रों के लिए सुरक्षित स्तर का मानक 60 माइक्रोग्राम/घन मीटर तक है।' 

ये मुद्दे समानता से संबंधित हैं; उन्हें जहरीली हवा और इसके कारण होने वाली उच्च मृत्यु दर और बीमारी के बोझ के बारे में चर्चा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। हाल ही में, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा कि यह सभी चार राज्य सरकारों की विफलता के कारण है कि दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पराली जलाई जा रही है, जिससे हवा में भारी प्रदूषण हो रहा है। आयोग ने कहा कि किसान 'मजबूरी में' पराली जला रहे हैं और यह चार राज्य सरकारों की 'विफलता' के कारण हो रहा है। 

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा कि 'राज्य सरकारों को उन पराली से छुटकारा पाने के लिए हार्वेस्ट मशीनें उपलब्ध करानी चाहिए, लेकिन वे पर्याप्त संख्या में आवश्यक मशीनें और अन्य उपाय उपलब्ध कराने में विफल रही हैं; नतीजतन, किसान पराली जलाने को मजबूर हैं, जिससे प्रदूषण होता है। इसलिए, कोई भी राज्य पराली जलाने के लिए किसानों को दोष नहींदे सकता है।' ऐसे में उम्मीद करनी चाहिए कि राज्य सरकारें और केंद्र सरकार इस पर और वायु प्रदूषण में योगदान देने वाले अन्य कारकों पर एकमत हों और समस्याओं को सुलझाएं। जहरीली हवा हमें मार रही है; वायु प्रदूषण के चलते हमारे बच्चों का जीवन और भविष्य दांव पर है।

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