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जब महाशक्तियां ही मनमानी पर तुली हों: ब्रिक्स में सटीक रहा भारत का पक्ष, कटघरे में नियमों का उल्लंघन करने वाले

Mon, 18 May 2026 07:26 AM IST
Jyoti Bhaskar सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत।
सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत। Published by: Jyoti Bhaskar Updated Mon, 18 May 2026 07:26 AM IST
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सार
ब्रिक्स सम्मेलन में विदेश मंत्री ने भारत का पक्ष बेशक सटीकता से रखा, पर जब महाशक्तियां मनमानी करेंगी, तो ऐसे सम्मेलनों के नेक इरादे कौन सुनेगा!
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When Superpowers Bent on Arbitrariness Stance of India at BRICS Proves Spot-On Rule-Violators Put in Dock
विदेश मंत्री एस जयशंकर (फाइल) - फोटो : एक्स/डॉ. एस जयशंकर

विस्तार

वर्तमान में, 10 सदस्यों और दस साझेदार देशों वाला ब्रिक्स दुनिया की लगभग 49 फीसदी आबादी, 39 फीसदी वैश्विक जीडीपी और 25 फीसदी वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है। विगत 14 मई को, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अध्यक्ष के तौर पर, दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में भारत का पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने आज की जटिल और अनिश्चित दुनिया में विचारों के आदान-प्रदान और आपसी सहमति बनाने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि उभरते बाजारों और विकासशील देशों की ब्रिक्स से यह अपेक्षा है कि वह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उथल-पुथल, अभी चल रहे संघर्षों, आर्थिक अनिश्चितताओं तथा व्यापार, प्रौद्योगिकी और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के इस दौर में एक स्थिर और रचनात्मक भूमिका निभाए।



उन्होंने ऊर्जा, भोजन, उर्वरक, वित्त तक पहुंच, स्वास्थ्य सुरक्षा और बाधित आपूर्ति शृंखलाओं के संबंध में कई देशों की कठिनाइयों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने आर्थिक सुदृढ़ता, विश्वसनीय आपूर्ति शृंखलाओं, विविध बाजारों, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास से जुड़े मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने का समर्थन किया।


जयशंकर ने एक अधिक स्थिर, न्यायसंगत और समावेशी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए जोरदार अपील की, और एकतरफा तथा जबर्दस्ती वाले उपायों व प्रतिबंधों की बढ़ती घटनाओं का कड़ा विरोध किया। ये उपाय अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुरूप नहीं थे। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने, नागरिकों की सुरक्षा करने और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को निशाना न बनाने की उनकी अपील नेक इरादों वाली है, पर यूक्रेन, गाजा और लेबनान में जो कुछ हो रहा है (और ईरान में जो हुआ) वह इन भावनाओं के बिल्कुल विपरीत है। इसी तरह, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों की आवश्यकता स्पष्ट है, पर असल सुधार अब भी दूर की कौड़ी बने हुए हैं। उन्होंने वैश्विक व्यवस्था के लिए संवाद और कूटनीति के महत्व, तथा शांति और सुरक्षा की अहमियत पर उचित ही जोर दिया; लेकिन क्या इस बात को मानने वाले ज्यादा लोग हैं?

विदेश मंत्री जयशंकर ने दृढ़ता से कहा कि 'होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर सहित अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों के जरिये सुरक्षित समुद्री आवाजाही वैश्विक आर्थिक कल्याण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।' होर्मुज खोलने की मांग को दुनिया भर से समर्थन मिला है, लेकिन अगर ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिका की नाकेबंदी जारी रहती है, तो किसी भी तरह की सफलता की उम्मीद नहीं है। यह एक ऐसे देश को सजा देने जैसा है, जिस पर संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए हमला किया गया है।

भारत द्वारा 'जन-केंद्रित और समग्र स्वास्थ्य सेवा' की वकालत (जिसमें संक्रामक और गैर-संक्रामक बीमारियों जैसी गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों के मद्देनजर सहयोग पर जोर दिया गया है) सौ से अधिक देशों को कोविड वैक्सीन और स्वास्थ्य देखभाल उपकरण उपलब्ध कराने का उसका रिकॉर्ड, और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर तथा डिजिटल भुगतान प्रणाली में अपनी विशेषज्ञता साझा करने की उसकी तत्परता, 'ग्लोबल साउथ' के एक अग्रणी देश के लिए सर्वथा उपयुक्त है। हालांकि भारतीय थीम के व्यापक उद्देश्य सराहनीय और आगे बढ़ाने लायक हैं, लेकिन ईरानी विदेश मंत्री अराघाची की मांग और यूएई की मांग में तालमेल बिठाना मुश्किल है। गौरतलब है कि अराघाची ने इस्राइल और अमेरिका द्वारा अपने देश के खिलाफ की गई खुली आक्रामकता की स्पष्ट निंदा करने की मांग की है, जबकि यूएई ने अपने देश पर ईरान के हमलों की निंदा करने की मांग की है।

जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि सीमा पार आतंकवाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। हमारे लिए, पाकिस्तान आतंकवाद का केंद्र बना हुआ है; जो लोग उसके साथ नजदीकी बढ़ाते हैं, वे आतंकवाद से लड़ने के अपने संकल्प की कमी को ही दर्शाते हैं। गाजा में मानवीय संकट और 'शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में एक विश्वसनीय मार्ग' की आवश्यकता की ओर ध्यान दिलाते हुए, जयशंकर ने 'दो-राष्ट्र समाधान' के प्रति भारत के समर्थन को दोहराया। ब्रिक्स की स्थिर करने वाली भूमिका, सुधारित बहुपक्षवाद, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन, आर्थिक लचीलापन, नए सदस्यों पर आम सहमति, नए सदस्यों का एकीकरण और आतंकवाद के प्रति 'शून्य सहनशीलता' पर जयशंकर का जोर बिल्कुल सही है। लेकिन तब क्या हो, जब इन नियमों का उल्लंघन करने वाली खुद महाशक्तियां हों?

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