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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   When PM Modi paid tribute to Dr Hedgewar and Golwalkar at RSS headquarters, it completed a circle of history

मंथन : एक विचार चक्र का पूरा होना, जिसके सेतु बने प्रधानमंत्री मोदी

Thu, 03 Apr 2025 07:00 AM IST
Balbir Punj बलबीर पुंज
Updated Thu, 03 Apr 2025 07:00 AM IST
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सार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास का यह बड़ा क्षण था, जब पहली बार कोई प्रधानमंत्री उसके मुख्यालय में संस्थापकों को श्रद्धांजलि देने पहुंचा। सत्ता प्रतिष्ठान से लगातार तिरस्कार झेलते हुए भी वह कौन-सी वजह है, जिसने इस संगठन को यहां तक पहुंचाया?
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When PM Modi paid tribute to Dr Hedgewar and Golwalkar at RSS headquarters, it completed a circle of history
पीएम मोदी की नागपुर दौरे की तस्वीरें - फोटो : PTI

विस्तार

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) मुख्यालय का दौरा करके इसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर को श्रद्धांजलि दी, तो इससे इतिहास का एक चक्र पूरा हो गया। एक शताब्दी पहले जिस विचारबीज को डॉ. हेडगेवार ने रोपित किया, वह अपनी सहस्र भुजाओं के विराट स्वरूप के साथ देश-विदेश में जनमानस को प्रभावित कर रहा है। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 1925 में अपने जन्म से लेकर आजतक संघ को क्रमिक सत्ता-अधिष्ठान के पूर्वाग्रह, उपेक्षा, तिरस्कार और विरोध का सामना करना पड़ा है। आज उसी शासनतंत्र के शिखर पुरुष ने न केवल संघ के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट की, बल्कि राष्ट्र निर्माण में उसके योगदान की प्रशंसा भी की है।



भारत में एक संगठन के रूप में आरएसएस और वामपंथी दल का उद्गम लगभग एक ही कालखंड में हुआ। वर्ष 1925 में संघ विजयादशमी के दिन (27 सितंबर) नागपुर, तो सीपीआई उसी वर्ष क्रिसमस सप्ताह (26-28 दिसंबर) के दौरान कानपुर में स्थापित हुए। उस समय भले ही वामपंथ को राजनीतिक स्वरूप भारत में मिला, किंतु इसका वैचारिक सूत्रपात 1920 में तत्कालीन सोवियत संघ में हो चुका था। संघ की स्थापना से पहले डॉ. हेडगेवार स्वयं कांग्रेस की विदर्भ इकाई के संयुक्त सचिव थे और स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के कारण उन्हें 1921-22 में कारावास का दंड मिला था। वामपंथी दल के तत्कालीन शीर्ष नेताओं में से एक और स्वतंत्र भारत के पहले निर्वाचित वामपंथी मुख्यमंत्री ईएमएस नंबूदरीपाद का भी नाता पहले कांग्रेस से रहा था।


भारत में वामपंथ की विचारयात्रा मुख्य रूप से कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ-साथ व्लादिमीर लेनिन, जोसेफ स्टालिन और माओत्से-तुंग से प्रेरित रही है। यही कारण है कि वे आज भी भारत की प्रत्येक समस्या को बाहरी दृष्टिकोण से ही देखते और उसे सुलझाने का प्रयास करते हैं। 25 जून, 1853 को न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून में कार्ल मार्क्स ने लिखा था, ‘हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये छोटे समुदाय जातिगत भेदभाव और दासता जैसी कुरीतियों से ग्रस्त थे। उन्होंने मनुष्य को परिस्थितियों का स्वामी बनाने के बजाय उसे बाहरी परिस्थितियों के अधीन बना दिया...इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह था कि प्रकृति का स्वामी होने के बावजूद मनुष्य ने हनुमान (वानर) और सबला (गाय) के समक्ष श्रद्धा में नतमस्तक होना शुरू कर दिया।’ यह दिलचस्प है कि कार्ल मार्क्स ने भारत की मूल सनातन संस्कृति पर यह विचार तब प्रकट किया था, जब वह व्यक्तिशः कभी भी भारत नहीं आए थे। इन विचारों को मार्क्स के असंख्य बीज स्वतंत्र भारत में आज भी आगे बढ़ाते हैं, जबकि भारतीय चिंतन इससे बिल्कुल अलग रहा है। सनातन संस्कृति की अवधारणा है कि मनुष्य प्रकृति और ब्रह्मांड का स्वामी नहीं, बल्कि उसका हिस्सा है।

संगठनों के विचार रूप को देखा जाए, तो भारत की आध्यात्मिक अवधारणा को संघ ‘भारत माता’ के रूप में देखता है, जबकि वामपंथ के लिए भारत ऐसा भूखंड है, जिसे भाषा, मजहब, क्षेत्रीय आधार पर विभाजित किया जा सकता है। जहां संघ और अन्य ने भी गांधी जी के साथ देश की अखंडता के लिए विभाजन का विरोध किया, वहीं साम्यवादियों ने ब्रितानियों और मुस्लिम लीग के साथ मिलकर पाकिस्तान के निर्माण को वाजिब बताते हुए मूर्त रूप दिया। स्वाभाविक रूप से संघ और अंग्रेजों के संबंधों में खटास थी। यह 1930 और 1932 में अंग्रेज अधीन कर्मचारियों के संघ से जुड़ने पर प्रतिबंध लगाने से स्पष्ट भी है।

वर्ष 1947 में अंग्रेजों के जाने के बाद यह मानस नहीं बदला, क्योंकि स्वतंत्र भारत की प्रारंभिक बागडोर वैचारिक रूप से औपनिवेशिक थी। जनवरी 1948 में गांधी जी की नृशंस हत्या के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। 1962 के भारत-चीन युद्ध में संघ की निस्वार्थ और समर्पित राष्ट्रसेवा देखने के बाद पंडित नेहरू को अपनी गलती का बोध हुआ और उन्होंने 1963 में गणतंत्र दिवस की परेड में आरएसएस को आमंत्रित किया। इसके बाद राजनीतिक कारणों से संघ पर आपातकाल (1975-77) में प्रतिबंध लगा दिया गया। फिर जो चक्र चला, उसमें 1992-93 का ढांचा-ध्वंस वाला अयोध्या दौर भी शामिल है। कांग्रेसनीत संप्रगकाल (2004-14) में राजनीतिक चाल के तहत संघ-भाजपा के दानवीकरण हेतु फर्जी तर्क मिलाकर ‘भगवा आतंकवाद’ का उपक्रम खड़ा किया गया, जो कालांतर में तथ्यहीन ही साबित हुआ।

प्रत्येक संगठन का जन्म तात्कालिक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ‘इको-सिस्टम’ से प्रभावित होता है। संघ इसका अपवाद नहीं है, परंतु उसकी कार्यपद्धति और उद्देश्य तत्कालीन संदर्भ तक सीमित नहीं रहे। सनातन वैदिक सिद्धांतों-‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदंति’, ‘वसुधैव कुटुंबकम’, और ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ आदि शाश्वत मूल्यों पर बात कर संघ बीते 100 वर्षों से अपने प्रयासों में लगा है। वह स्वयं सत्ता-राजनीति से दूर रहता है, परंतु इसके द्वारा प्रदत्त कार्यक्रम से प्रशिक्षित और प्रेरित कार्यकर्ता सत्ता-अधिष्ठान के संचालन तक पहुंचे हैं।

इस अद्वितीय संबंध को चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य के सहयोग के प्रकाश में समझाया जाता है। बीते माह एक अमेरिकी पॉडकास्टर को दिए एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, ‘संघ को समझना इतना सरल नहीं है।’ वास्तव में, संघ एक संगठन की तरह नहीं, अपितु एक विचारधारा, एक चेतना और सतत प्रवाहमान राष्ट्रवादी आंदोलन की तरह सक्रिय रहता है। निश्चय ही संघ की कार्यपद्धति का आधार अध्यात्म है। परंतु इसमें नास्तिक, अज्ञेयवादी या किसी भी पूजा-पद्धति का अनुसरण करने वाले शामिल हो सकते हैं। इसके बावजूद संघ की वास्तविकता और प्रचलित छवि में अंतर क्यों है? क्योंकि प्रारंभ से ही संघ ने धरातल पर उतरकर काम तो किया ही, लेकिन सेवा-कार्यों के प्रचार-प्रसार की सदैव उपेक्षा की है। संभवतः इसी खाई को अक्सर संघ-विरोधी अपने विचार से पाटने में सफल हो जाते हैं। क्या जन्मशताब्दी वर्ष में संघ इस ओर ध्यान देगा?

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