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सेहत का पाठ कब पढ़ाया जाएगा स्कूलों में

Sun, 23 Aug 2015 06:40 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Sun, 23 Aug 2015 06:40 PM IST
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When health education in school

प्राइम टाइम टेलीविजन के शोरगुल और अखबारों के मुखपृष्ठ की सुर्खियों से दूर एक हत्यारा लुक-छिपकर शिकार कर रहा है। यह खून नहीं बहाता। यह छुप-छुपकर रेंगते हुए आता है। यह हत्यारा दरअसल जीवन शैली से जुड़ा हुआ रोग है, जिसे डॉक्टर असंचारी रोग कहते हैं।

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हर चार में से एक भारतीय का डायबिटीज, हृदय संबंधी बीमारियों या कैंसर के कारण सत्तर वर्ष से कम उम्र में मरने का खतरा है। ये बीमारियां न सिर्फ व्यक्तियों और परिवारों पर कहर ढा रही हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ रहा है, क्योंकि ये तेजी से पेशेवरों और छात्रों को निशाना बना रही हैं। डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक इंटरप्राइजेज और भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) द्वारा कराए गए एक सर्वे के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र के 17 प्रतिशत कर्मचारी और उनके परिवार के सदस्य डाइबिटीज के शिकार हैं। डाइबिटीज और हृदय रोग से पीड़ित व्यक्तियों को न सिर्फ जीवन भर सावधानी बरतनी पड़ती है, बल्कि महंगी दवाइयों का भी सेवन करना पड़ता है। जाहिर है, समाज और देश को इसका भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। जीवन शैली से होने वाली बीमारियों का इलाज बेहद खर्चीला होता है। और भारत जैसे देशों में, जहां लोगों को अपने इलाज का खर्च खुद वहन करना पड़ता है, महंगी चिकित्सा परिवार पर बड़ा आर्थिक बोझ डालती है। यह आर्थिक बोझ कई बार राष्ट्रीय उम्मीदों और आकांक्षाओं को भी ध्वस्त कर देता है। अगर देश के युवा बीमार होंगे, तो भारत अपनी युवा जनसंख्या का लाभ कतई नहीं उठा पाएगा। लेकिन भारत में जो स्थिति है, वही हालत कमोबेश पूरी दुनिया में है। आज दुनिया भर में होने वाली मौतों और अपंगता का एक बड़ा कारण जीवन शैली से होने वाली बीमारियां हैं। हृदय रोग, डायबिटीज, दिल के दौरे, सांस की बीमारियों और कैंसर से पूरे विश्व में सालाना करीब 3.6 करोड़ लोगों की मौत होती है।
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ऐसे में भारत क्या करे? वस्तुतः कई किफायती तरीके हैं, जिन्हें अपनाकर इन बीमारियों के खतरों को कम किया या रोका जा सकता है तथा जीवन और संसाधनों की बचत की जा सकती है। इन सबमें सबसे जरूरी यह है कि वे आदतें छोड़ी जाएं, जिनसे खतरा बढ़ता है, जैसे अस्वास्थ्य खाद्य पदार्थ और तंबाकू का सेवन करने की आदत छोड़ना और शारीरिक परिश्रम करने पर जोर देना। जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों की रोकथाम के अभियान से स्कूलों को जोड़ना भी एक सार्थक कदम हो सकता है। भारत में युवाओं की एक बड़ी आबादी रहती है। यह भी समझने की जरूरत है कि शिक्षा और स्वास्थ्य एक दूसरे से जुड़े हैं-स्वस्थ बच्चे बेहतर ढंग से सीख सकते हैं, और बच्चों में स्वस्थ आदतें डाली जाएं, तो वे स्वस्थ युवा बनते हैं। बच्चों को भविष्य का स्वस्थ नागरिक बनाने की दिशा में स्कूल बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
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स्कूली जीवन किसी के जीवन का सर्वोत्तम समय होता है। स्कूल बच्चों को सीखने और फलने-फूलने का अनेक अवसर प्रदान करते हैं। लेकिन अस्वास्थ्यकर भोजन, शारीरिक परिश्रम के अभाव, तंबाकू और यहां तक कि शराब का सेवन करने के कारण स्कूली बच्चे भी आज स्वास्थ्य से जुड़े अनेक खतरों का सामना कर रहे हैं। इससे उनमें स्वास्थ्य संबंधी गड़बड़ियां पैदा होती हैं, वे कई तरह की बीमारियों की चपेट में आते हैं, और कई बार उनकी मौत हो जाती है।

बच्चे अपने समय का एक बहुत बड़ा हिस्सा स्कूलों में बिताते हैं। ऐसे में स्कूल शिक्षक अभिभावकों के साथ मिलकर बच्चों में छोटी उम्र में ही अच्छी आदत डाल सकते हैं। सच्चाई यह है कि जीवन शैली से जुड़ी जो बीमारियां वयस्कों में सामने आती हैं, उनकी जड़ें बचपन में ही खान-पान से जुड़ी अस्वास्थ्यकर आदतों में होती हैं।

अस्वास्थ्यकर भोजन और शारीरिक परिश्रम का अभाव-ये दो बुरी आदतें हैं, जिनकी वजह से खासकर शहरी इलाकों में बच्चों में मोटापा बढ़ रहा है। इसलिए स्कूलों में ही अच्छी आदतें डालना बहुत जरूरी है। लेकिन स्कूल बच्चों में अच्छी आदतें भला कैसे डालें?


अब खान-पान की अस्वास्थ्यकर आदत को ही लें। यह वैसा खान-पान है, जिसमें ताजा फल और सब्जियों का उपभोग नगण्य होता है, और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल अत्यधिक होता है, जिनमें बहुत अधिक नमक और चीनी, सैचुरेटेड वसा और ट्रांस फैट होता है। इस तरह का खान-पान कई वजहों से घातक होता है। मसलन, चीनी और चीनी डालकर तैयार किए गए शीतलपेयों के अधिक इस्तेमाल से दांत सड़ने लगते हैं। इन सब पर अंकुश लगाने के लिए जरूरी है कि स्कूल प्रबंधन स्वस्थ खान-पान को तरजीह दें और यह तय करें कि हर बच्चा स्कूल में कुछ न कुछ शारीरिक परिश्रम करेगा। पांच से सत्तरह वर्ष तक के छात्रों को दिन में कम से कम एक घंटा शारीरिक परिश्रम करना चाहिए। योग का निरंतर अभ्यास इस दिशा में फायदेमंद हो सकता है। इसी तरह तंबाकू का इस्तेमाल रोकने के लिए भी अविलंब सक्रियता जरूरी है-तंबाकू के धुएं में चार सौ से अधिक रसायन और रासायनिक घटक होते हैं, जो विषैले हैं। स्कूल प्रबंधन और अभिभावकों की कोशिशों से बच्चों और किशोरों में तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध लगना चाहिए। ये सभी उपाय तत्काल लागू किए जाने चाहिए, क्योंकि समय गंवाने का वक्त नहीं है।

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