जब केंद्र कमजोर होता है
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आज देश अनिश्चय के अजीब दौर से गुजर रहा है। लोकसभा चुनाव नजदीक हैं, सरकार और विपक्ष दोनों ने कमर कस ली है। लेकिन खासतौर से यूपीए सरकार ने हाल के दिनों में जिस तरह की सक्रियता दिखाई है, उसके कई आयाम हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की महत्वकांक्षी योजना खाद्य सुरक्षा विधेयक और भूमि अधिग्रहण विधेयक को संसद से पारित कराने के लिए अभी तत्परता दिखाई गई है, जबकि ये कदम तो कम से कम दो वर्ष पहले उठा लेने चाहिए थे। आखिर संसदीय कार्यों का निष्पादन, अहम विधेयकों को पारित करने की याद सरकार को अभी क्यों आई?
केंद्र सरकार के रणनीतिकार यूपीए-2 के कार्यकाल की 'निष्क्रियता' का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ते हैं। उनका कहना है कि संसद में अवरोध उत्पन्न करने में विपक्ष का पूरा हाथ रहा। लेकिन यह आधी सच्चाई है। पिछले दो वर्षों के दौरान देखा गया कि संसद को ठप करने में सड़क पर हो रहे आंदोलनों के साथ ही सरकार के सहयोगी दलों का भी कम योगदान नहीं था। अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के जनलोकपाल आंदोलन की गूंज जहां संसद में सुनाई दी, वहीं रेल किराया बढ़ाने के मामले में तृणमूल कांग्रेस की सरकार से तकरार ने भी संसद की कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न किया। इतना ही नहीं, खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) जैसी नीतियों पर आम राय न बनाने की सरकार की नाकामयाबी ने भी संसद में काम नहीं होने दिया। नतीजतन, चुनाव सिर पर देखते हुए सामान्य समय में किया जाने वाला काम भी अभी तेज गति से हो रहा है। यह दुर्भाग्य है कि सरकार की यह सक्रियता ऐसे वक्त में दिख रही है, जब देश आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ा है।
बेशक रघुराम राजन की रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में नियुक्ति कर सरकार ने एक सकारात्मक कदम उठाया है, जिसका बाजार पर असर भी दिख रहा है, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि बाजार में ये सुधार मात्र शुरुआती हैं। इसे सेंटीमेंटल रिस्पांस (भावनात्मक प्रभाव) कहना ज्यादा उचित होगा। बाजार में थोड़ी-बहुत सुधार की यही वजह है कि रघुराम राजन ने न सिर्फ बैंकिंग सेक्टर में विस्तार की बात की है, बल्कि इसे उन लोगों तक भी पहुंचाने का 'भरोसा' दिया है, जो हाशिये पर हैं। हालांकि उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ है, और देश में मुद्रा की आवाजाही बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें अमेरिकी फेडरल बैंक के भारतीय अर्थव्यवस्था संबंधी विश्लेषण से भी जूझना होगा। ऐसे में बेहतर यही होगा कि सरकार स्वावलंबन की दिशा में कदम उठाए। पर दिक्कत यही है कि जिस तरह यूपीए-2 के कार्यकाल में आंतरिक सुधार, खासकर विनिर्माण क्षेत्र में सुधार कमोबेश निष्क्रिय रहा, उसे देखते हुए अभी वित्तीय सुधार का ख्वाब देखना दिवास्वप्न-सा होगा। कुल मिलाकर मनमोहन सिंह का यह कार्यकाल विफलता भरा शासन ही है।
हालांकि यूपीए सरकार की विफलता के बावजूद विपक्ष की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है। आम लोगों में सरकार के खिलाफ दिख रहे गुस्से से भले ही विपक्षी दलों, खासकर भाजपा खुश हो, लेकिन वहां भी नेतृत्व का संकट साफ देखा जा सकता है। भाजपा में नरेंद्र मोदी ही नहीं, कई अन्य नेता प्रधानमंत्री पद की दौड़ में हैं। लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह जैसे नेताओं को छोड़ दें, तब भी रमन सिंह, शिवराज सिंह चौहान, मनोहर पर्रिकर जैसे नेता दबी जुबान ही सही, गुजरात के बरक्स अपने राज्यों में हो रहे कामों का हवाला देते हैं। हालांकि ऐसी स्थिति कांग्रेस में भी है। वहां भी आंतरिक संघर्ष काफी ज्यादा है। अलबत्ता यदि सोनिया गांधी खुद सरकार की कमान अपने हाथ में ली होती, तब भी कमोबेश यही स्थिति होती। शायद इसलिए उन्होंने 2004 में प्रणब मुखर्जी, चिदंबरम जैसे दिग्गजों को दरकिनार कर मनमोहन सिंह को आगे किया। लेकिन यूपीए-एक के बनिस्बत यूपीए-दो का कार्यकाल काफी कमजोर रहा और मनमोहन सिंह विफल नेतृत्व के रूप में शासन करते दिखाई दिए।
इस चुनावी वर्ष में उत्तर प्रदेश की स्थिति भी विश्लेषकों का ध्यान खींच रही है। साफ दिख रहा है कि देश के इस सबसे बड़े सूबे में सांप्रदायिक दंगों की आड़ में समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी चुनावी घड़ी को पीछे मोड़ने को तत्पर हैं और मृतप्रायः रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद मामले को हवा देकर लाभ लेने की जुगत कर रहे हैं। लेकिन विडंबना है कि केंद्र भी राजनीति में पीछे नहीं दिख रहा। वह सपा से राजनीतिक सहयोग तो ले रहा है, लेकिन दंगों पर समुचित कार्रवाई से बचना चाह रहा है। स्थिति यह है कि जी-20 की बैठक से वापस लौटते समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी छवि को लेकर बार-बार दोहराते हैं कि वह 'चोर' नहीं हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश की बदहाल तस्वीर पर मुंह नहीं खोलते। जबकि जिस ब्रिक्स की अगुवाई का वह दावा करते हैं, वहां भी चीन के अलावा अब ब्राजील से भी भारत पीछे हो गया है।
लिहाजा इस पूरे सियासी परिदृश्य में यह सवाल समीचीन होगा कि 2014 के लोकसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा। बेशक नई राजनीति का चित्र फिलहाल स्पष्ट नहीं है, लेकिन सच यह भी है कि आगामी लोकसभा चुनाव संकट के समय की एक संगीन लड़ाई होगी। इसमें कोई एक मुद्दा हावी नहीं होगा। बातें सिर्फ नरेद्र मोदी बनाम राहुल, या मोदी बनाम सोनिया की नहीं होगी, बल्कि इसमें विकास, अर्थनीति, सांप्रदायिक सद्भाव, नक्सली, जेहादी जैसे मुद्दे भी सुर्खियों में होंगे। विकास और अर्थनीति को भले ही हम सकारात्मक मुद्दा मानें, लेकिन कई नकारात्मक मुद्दे भी चुनाव में हावी रहेंगे। और संघ की शक्ति को कमजोर करने की यही नकारात्मकता चुनाव को संगीन बनाएगी।