ट्रंप की धमकी से क्या बदलेगा?
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भारत के नजरिये से 2018 की शुरुआत अच्छी रही। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति ने ट्वीट करके यह घोषित किया कि पाकिस्तान को दशकों से जो आर्थिक सहायता अमेरिका देता आया है, वह बंद कर दी जाएगी, क्योंकि आतंकवाद के उन्मूलन के नाम पर इस्लामाबाद ने अब तक वाशिंगटन को बेवकूफ ही बनाया है। भारतीय राजनीतिक पंडितों और रक्षा विशेषज्ञों ने इसका स्वागत किया। लेकिन क्या अमेरिका के ऐसा करने से पाकिस्तान अपनी आतंकवादी गतिविधियां बंद कर देगा? क्या ऐसा करना पाकिस्तान के सैनिक शासकों के लिए संभव भी है? मैं विनम्रता से अर्ज करना चाहूंगी कि डोनाल्ड ट्रंप की इस धमकी से पाकिस्तान पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। ऐसा इसलिए कि पाक सत्ता प्रतिष्ठान की दृष्टि में आतंकवादी पूरी तरह निर्दोष हैं और अगर कोई खलनायक है, तो वह अमेरिका है।
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इमरान खान ने पिछले सप्ताह अमेरिकी टीवी पत्रकारों को इंटरव्यू में कहा कि अमेरिका अपनी गलतियों का दोष पाकिस्तान के सिर थोप रहा है। इमरान खान की बातें इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उस देश के ताकतवर सैन्य प्रतिष्ठान ने तकरीबन तय कर लिया है कि इमरान खान कुछ महीनों में होने वाले आम चुनाव के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनेंगे। सो जब इमरान कहते हैं कि अमेरिका को पाकिस्तान को बदनाम करने के बदले अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए, तो उनकी बातों को गंभीरता से लेना चाहिए। उनका कहना है कि सारा दोष अमेरिका का है, क्योंकि उसने ड्रोन विमानों के जरिये ऐसा युद्ध लड़ा है, जिसमें एक डरावने विडियो गेम द्वारा इंसान मारे जा रहे हैं। वह कहते हैं, ‘जब किसी गांव में बम फटता है, तो क्या उसके सारे टुकड़े तय करके सिर्फ आतंकवादियों को ही मारते हैं? क्या सच यह नहीं है कि इन ड्रोनों की वजहों से हजारों बेगुनाह औरतें और बच्चे मारे गए हैं?’
पाक सेना के प्रवक्ताओं ने भी बार-बार बिल्कुल यही बात कही है। सो जब पाकिस्तान अपनी नजरों में निर्दोष है, तब वह उन जेहादी संस्थाओं को कैसे त्याग सकता है, जिन्हें सेना ने कश्मीर और अफगानिस्तान में जेहाद करने के लिए खुद प्रशिक्षित किया है? परवेज मुशर्रफ खुलकर कहते हैं कि हाफिज सईद उनके लिए हीरो हैं। याद रखना चाहिए कि मुशर्रफ के कार्यकाल में न सिर्फ कारगिल का युद्ध हुआ था, बल्कि उन्होंने ओसामा बिन लादेन को तब शरण दी थी, जब उसे अफगानिस्तान से भागना पड़ा था।
पाकिस्तानी सेना अपनी बदमाशियां छिपाने में माहिर है, सो ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद आज तक वहां के किसी सेनाध्यक्ष ने स्वीकार नहीं किया है कि उनको इसकी जानकारी थी कि बिन लादेन अपने परिवार के साथ कहां छिपकर बैठा था। न ही कभी किसी पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष ने स्वीकार किया है कि भारत की जमीन पर जेहादी आतंकवाद फैलाने में उनका हाथ है। जब सुबूत पर सुबूत देने के बाद भी पाकिस्तान का एक भी नेता यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि मुंबई पर हमले की साजिश उनके देश में बैठे सरगनाओं ने रची थी, तो यह उम्मीद पालकर हम बेवकूफी ही करेंगे कि डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम के बाद पाकिस्तान में परिवर्तन देखने को मिलेगा। भारत की पाकिस्तान नीति इस आधार पर बनाई जानी चाहिए कि पाकिस्तान अपनी जेहादी विदेश नीति तभी बदलेगा, जब हम अपनी शक्ति से उसको बदलने पर मजबूर करने लायक होंगे। अफसोस कि ऐसा अभी तक भारत के किसी भी प्रधानमंत्री ने करके नहीं दिखाया है।