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मुद्दा : संविधान की नौवीं अनुसूची और आरक्षण, लेकिन क्या इससे होगा समस्या का समाधान

Thu, 01 Aug 2024 07:25 AM IST
केसी त्यागी और बिशन नेहवाल केसी त्यागी साथ में पंकज चौरसिया
केसी त्यागी साथ में पंकज चौरसिया Published by: केसी त्यागी और बिशन नेहवाल Updated Thu, 01 Aug 2024 07:25 AM IST
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सार
कई दल विवादों को खत्म करने के लिए आरक्षण संबंधी सभी कानूनों को नौवीं अनुसूची में शामिल कराना चाहते हैं, क्या इससे समस्या का हल होगा?
 
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What problem will be solved by including reservation in the Ninth Schedule of the Constitution?
constitution of india भारत का संविधान - फोटो : istock

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण संबंधी मामले में पटना हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया है। बिहार सरकार ने शीर्ष अदालत में दावा किया था कि राज्य द्वारा किए गए जाति सर्वेक्षण ने 1992 के इंद्रा साहनी फैसले में शीर्ष अदालत द्वारा निर्धारित आरक्षण पर 50 फीसदी की सीमा को तोड़ने के लिए आवश्यक सामाजिक परीक्षण मापदंडों को पर्याप्त रूप से संतुष्ट किया है।



पटना हाईकोर्ट ने 20 जून को बिहार पदों और सेवाओं में रिक्तियों के आरक्षण (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए) संशोधन अधिनियम, 2023 और बिहार आरक्षण (शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में) संशोधन अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं को स्वीकार कर लिया था और दोनों कानूनों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव के खिलाफ अधिकार) और 16 (रोजगार में भेदभाव के खिलाफ अधिकार) का उल्लंघन माना था।


संविधान के अनुच्छेद 15(4) में, ‘नागरिकों के किसी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग या अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान’ करने का अधिकार दिया। अनुच्छेद 15 और 16 में महत्वपूर्ण शब्द 'केवल' है-जिसका अर्थ है कि यदि कोई धार्मिक, नस्लीय या जाति समूह अनुच्छेद 46 के तहत ‘कमजोर वर्ग’ का गठन करता है, तो वह अपनी उन्नति के लिए विशेष प्रावधानों का हकदार होगा। इस विशेष प्रावधान का अर्थ मुख्यतः आरक्षण है। देश में आरक्षण को लेकर अक्सर विवाद होता रहा है। इसलिए कई राजनीतिक दल आरक्षण पर बार-बार होने वाले विवाद को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए आरक्षण संबंधी सभी कानूनों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग करते रहे हैं।

बिहार में 65 फीसदी आरक्षण, ऐतिहासिक इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ के फैसले में शीर्ष अदालत द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन करता है। हालांकि, किसी कानून को नौवीं अनुसूची में रखने से उसे न्यायिक जांच से बचाया जा सकता है। तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण और राज्य के अधीन सेवाओं में नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) अधिनियम, 1993, कॉलेजों और राज्य सरकार की नौकरियों में 69 प्रतिशत सीटें आरक्षित करता है। तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है, जहां पर सबसे अधिक 69 प्रतिशत आरक्षण है और यह व्यवस्था संविधान की नौवीं अनुसूची का हिस्सा है। 20वीं सदी की शुरुआत में उभरा द्रविड़ आंदोलन प्रभुतासंपन्न समुदाय के खिलाफ शक्तिशाली भूमिधारक वर्गों का था, जो सत्ता के ज्यादातर पदों पर काबिज थे। पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन को लगा कि आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए, पर तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने विभिन्न दलों के साथ मिलकर तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव से मिलने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया और अंततः आरक्षण प्रावधान को नौवीं अनुसूची में शामिल करवाया। हालांकि वर्ष 2007 में नौवीं अनुसूची को भी चुनौती दी गई (आई आर कोएलो बनाम तमिलनाडु राज्य), लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से नौ न्यायाधीशों के आधार पर फैसला सुनाया कि नौवीं अनुसूची के तहत रखे गए कानूनों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती, लेकिन उन्हें संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करने के आधार पर चुनौती दी जा सकती है। नौवीं अनुसूची में केंद्रीय और राज्य कानूनों की सूची है, जिन्हें अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती। वर्तमान में 284 कानून न्यायिक समीक्षा से सुरक्षित हैं।

वर्ष 2023 में छत्तीसगढ़ सरकार ने 58 प्रतिशत आरक्षण का दायरा बढ़ाते हुए राज्य में 72 प्रतिशत का दायरा बढ़ाया था। इस पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी। इसके बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में उच्च कोटा प्रदान करने वाले दो संशोधन विधेयकों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की है। ऐसे ही झारखंड सरकार ने विधानसभा में एक विधेयक पारित किया  था, जो राज्य में रिक्त सरकारी पदों और सेवाओं में आरक्षण बढ़ाकर 77 प्रतिशत करने से संबंधित था। हालांकि, यह भी विधेयक लागू नहीं हो सका और झारखंड के मुख्यमंत्री ने केंद्र से सिफारिश कि इस विधेयक को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करें।

आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू होने के बाद आरक्षण नीतियों पर एक नई तरह की बहस शुरू हो गई है, जैसे आरक्षण का दायरा खत्म करना और ईडब्ल्यूएस को जाति तटस्थ बनाना तथा सभी जातियों व वर्गों को इसमें शामिल करना आदि। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो देश में कई तरह के सामाजिक व राजनीतिक संघर्ष पैदा हो जाएंगे, इसलिए केंद्र सरकार को इस विषय पर सोचने की जरूरत है। -

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