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बातें हैं बातों का क्या

Mon, 20 May 2013 09:46 PM IST
विजय क्रांति
विजय क्रांति Updated Mon, 20 May 2013 09:46 PM IST
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what mean of talking

चीन के प्रधानमंत्री ली केचियांग ने अपनी भारत यात्रा के दौरान यहां की महानता के बारे में काफी कुछ कहा है, जो कूटनीति में स्वाभाविक है। पर, उनकी बातों से यह अर्थ निकाल लेना कि भारत के प्रति चीन के रुख में कोई तब्दीली आ रही है, निहायत ही बचकाना होगा।

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हम यह कैसे भूल सकते हैं कि द्विपक्षीय रिश्तों के मामले में हर देश अपने राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रखता है। चीन के प्रधानमंत्री की तरफ से भारत की तारीफ में कहे गए शब्दों से गदगद होने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि चंद दिनों पहले ही चीनी सेना हमारी सीमा में घुस आई थी और 19 दिनों तक जमी रही।
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ली के समर्थन में कहा जा रहा है कि उन्होंने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुना। लेकिन क्या हम इसे झुठला सकेंगे कि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद चीनी सेना का पहला आक्रामक अभियान भारत के खिलाफ ही हुआ।
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दरअसल, चीन में आंतरिक कलह चरम पर है, लेकिन मीडिया पर नियंत्रण के चलते वहां की घटनाओं से हम बहुत कम रूबरू हो पाते हैं। चीन में सत्तारूढ़ दल के भीतर भी कई धड़े हैं। सेना के विभिन्न अंग भी आपसी धड़ेबंदी का शिकार हैं। वहां के विकास मॉडल के कारण बढ़ रही असमानता के चलते उभर रहा असंतोष पिछले कुछ वर्षों के दौरान नजर आने लगा है।

व्यावसायिक उद्देश्यों के कारण लोगों से जबरन जमीनें छीनी गई हैं और मानवाधिकार हनन भी आम बात है। ऐसे में जनता की नाराजगी का ज्वार लगातार उमड़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों से वहां लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इन्हीं के चलते चीन लगातार अपने पड़ोसियों के साथ बेवजह विवाद पैदा करता रहता है, ताकि जनता का ध्यान आंतरिक मुद्दों से भटकाया जा सके। जापान, दक्षिण कोरिया, कंबोडिया, वियतनाम, रूस और भारत के साथ उसके विवाद इसका उदाहरण हैं।

गौरतलब है कि मौजूदा वक्त में विदेश नीति को प्रभावित करने में सबसे ज्यादा योगदान आर्थिक नीतियों का होता है। पिछले साल दोनों देशों के बीच 66 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार रहा है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि भारत से किए जाने वाले आयात के मुकाबले चीन हमें 29 अरब डॉलर का ज्यादा निर्यात करता है। द्विपक्षीय व्यापार को 2015 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन इस असंतुलन को ठीक करने के कोई संकेत नहीं हैं।

व्यापार असंतुलन के अलावा चीन को लेकर हमारी आर्थिक नीति में भी भारी कमियां हैं। हमारे यहां से चीन को सबसे ज्यादा लौह अयस्क का निर्यात होता है। भारत का लौह अयस्क दुनिया में सबसे बेहतरीन माना जाता है, क्योंकि इसमें 64 फीसदी लौह होता है। चीन इससे स्टील बनाकर न सिर्फ हमें निर्यात करता है, बल्कि विश्व बाजार में भी वह भारतीय इस्पात कंपनियों को नहीं टिकने दे रहा है। इस तरह कच्चे माल के रूप में हमारी ओर से होने वाले निर्यात का भी चीन भारत के विरुद्ध इस्तेमाल कर रहा है।

दूसरे, तैयार माल का हाल यह है कि हमारे यहां की कई कंपनियां उत्पादन बंद करके चीनी उत्पादों का आयात कर रही हैं और फिर अपनी मुहर लगाकर बाजार में उतार देती हैं। चीन के उत्पादों ने हमारे खिलौना उद्योग को नष्ट कर दिया। रेशम उद्योग भी आखिरी सांसें गिन रहा है और यही हालत इस्पात उद्योग की है। कुछ महीने पहले अफ्रीका के कुछ देशों में चीन से आई ऐसी घटियां दवाएं पकड़ी गईं, जिन पर चीनी कंपनियों ने ‘मेड इन इंडिया’ की मुहरें लगा रखी थीं।

इसका इरादा भारत की आर्थिक साख गिराना था। ऐसे में अब जरूरी है कि हम अपनी विदेश नीति से जुड़ी आर्थिक नीतियों को भी व्यावहारिक बनाएं। व्यावहारिक का मतलब द्विपक्षीय व्यापार में कमी करना नहीं है, बल्कि हमें चीन पर इस बात के लिए दबाव बनाना चाहिए कि वह अपने यहां भारतीय उत्पादों को प्रतिस्पर्धा का मौका दे। इसके अलावा हमें तैयार उत्पाद के निर्यात की तरफ ध्यान देना चाहिए।

रही बात सीमा विवाद की, तो इसका कोई समाधान रातोंरात नहीं निकल सकता। इस मुद्दे पर अब तक हमने दब्बूपन ही दिखाया है। जब चीन ने 1951 में तिब्बत पर कब्जा किया, तो हम न केवल आंख मूंदे रहे, बल्कि उसके झूठे दावों का समर्थन करते रहे। यही वजह है कि चीन तिब्बत का इस्तेमाल भारत विरोधी आतंकवादी और विभाजनकारी संगठनों को प्रशिक्षण देने, शरण देने और हथियार आपूर्ति करने के लिए इस्तेमाल कर रहा है।

आज वह हमें पाकिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर, नेपाल, म्यांमार, और बांग्लादेश के जरिये घेरने में लगा हुआ है। तिब्बत को फौजी छावनी में बदलने के अलावा वह हमारी सीमा के साथ-साथ सड़कों का एक लंबा जाल बिछा चुका है। नेपाल में सड़कें बनाकर उसने पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तराखंड तक सीधी पहुंच बना ली है।

तिब्बत पर कब्जे का ही नतीजा है कि चीन अरुणाचल प्रदेश को ‘दक्षिणी तिब्बत’ बताकर उस पर दावा जताने लगा है। हमारे नीति नियंताओं को समझना चाहिए तिब्बत सिर्फ दलाई लामा, मानवाधिकार और सांस्कृतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि वह हमारी सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा है।


अरुणाचल, असम, उत्तराखंड, हिमाचल और लद्दाख में उसके जमीनी दावों का सबसे कारगर जवाब यह है कि उसे बता दिया जाए कि तिब्बत पर उसका कब्जा अवैध है, इसलिए तिब्बत से जुड़े इन भारतीय इलाकों पर उसके सभी दावे झूठे हैं। जो आर्थिक रिश्तों का हवाला देकर चीन के प्रति सख्त विदेश नीति की मुखालफत करते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि व्यापार के नाम पर देश की सुरक्षा और संप्रभुता का सौदा नहीं किया जा सकता।

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