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हमें कैसा अध्यापक चाहिए?

गोविंद सिंह Updated Tue, 04 Sep 2018 06:41 PM IST
गोविंद सिंह
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इन दिनों शिक्षक और शिक्षा काफी चर्चा में हैं। सरकार शिक्षकों को सुधारने के लिए नित्य नए फरमान जारी कर रही है। और शिक्षक संघ उनका विरोध कर रहे हैं। लेकिन घोर उपभोक्तावाद के जिस दौर में हम रह रहे हैं, उसमें छात्रों की राय जानना बहुत जरूरी हो जाता है कि वे कैसा शिक्षक चाहते हैं। इसी विचार को लेकर जब मैं अपने विद्यार्थियों के पास पहुंचा, तो मुझे अप्रत्याशित परिणाम मिले। मैंने उनसे पूछा कि वे एक अच्छे अध्यापक में कौन से गुण देखना चाहेंगे। विद्यार्थियों ने एक के बजाय दस-दस गुण बताने शुरू कर दिए। उन सबने अपने अब तक के जीवन के सर्वश्रेष्ठ अध्यापकों को याद किया और उनके गुणों को सामने रख दिया। एक छात्रा को समझ में नहीं आया, तो उसने अपनी पहली अध्यापिका का जीवन चरित ही लिख भेजा कि कैसे उसने एकदम भोंदू और संकोची बच्ची को इस लायक बना दिया कि आज वह एक महत्वपूर्ण मुकाम पर पहुंची है।
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फिर भी जो गुण विद्यार्थियों ने बताए, वे इस प्रकार हैं: अध्यापक को अपने काम के प्रति ईमानदार होना चाहिए। उसमें प्रेरणा देने का ऐसा जज्बा हो कि एकदम उदासीन विद्यार्थी भी पढ़ने-लिखने को प्रेरित हो जाए। उसमें सादगी होनी चाहिए, ताकि विद्यार्थी सहजता से उससे घुलमिल सकें। वह विद्यार्थियों के मन को समझे और उनके प्रति हमदर्द हो। वह पेशेवर हो और पेशेवर नैतिकता का पालन करे। बेईमान और झूठा तो कतई नहीं होना चाहिए। वह निष्पक्ष हो। निःस्वार्थ भाव से पढ़ाए। हर बच्चे की जरूरत को समझे। उसमें स्वाभिमान हो, लेकिन वह दूसरों का भी आदर करे। उसे बुद्धिमान तो होना ही चाहिए, साथ ही प्रो-एक्टिव भी होना चाहिए। उसमें इतनी ताकत हो कि राष्ट्र के भविष्य को दिशा दे सके। उसे खुद भी अनुशासित होना चाहिए। वह एक बेहतरीन संप्रेषक हो। उसे अपने विषय का पूरा और अद्यतन ज्ञान हो।

विद्यार्थियों के ऊपर उसकी एक अमिट छाप पड़नी चाहिए। विचारों से उदार हो, कट्टरवादी कतई न हो। उसके भीतर धैर्य और सहनशीलता कूट-कूट कर भरी हो। उसे एक बेहतरीन गाइड होना चाहिए। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की उक्ति यहां बेहद प्रासंगिक है: ‘एक दीपक तब तक बाकी दीपों को नहीं जला सकता, जब तक कि उसके अपने भीतर ज्वाला न हो। ठीक उसी तरह एक अध्यापक भी अपने छात्रों को तब तक नहीं पढ़ा सकता, जब तक कि वह स्वयं सदैव सीखने को उत्सुक न हो’।
 
आपको लगेगा कि ये तो वे ही गुण हैं, जिनके बारे में आप कब से सोचते थे। यानी अध्यापक से हर युग में कमोबेश वही गुण अपेक्षित रहते हैं। कौटिल्य के समय अध्यापक से जिस तरह के गुणों की अपेक्षा थी, आज उससे कम नहीं है। हां, छात्रों में जरूर कुछ तब्दीलियां आती रहती हैं। मसलन आज के छात्र पहले की तुलना में कहीं ज्यादा जानते हैं, क्योंकि उनका एक्सपोजर भी अधिक है। यहां सवाल यह है कि क्या आज शिक्षक को समाज में वह स्थान प्राप्त है, जो प्राचीन काल में था। क्या आज के किसी शिक्षक का स्थान चाणक्य जैसा है? सरकार की प्राथमिकताओं में वह किस क्रम में आता है? क्या समाज और सरकार उसे उतना महत्व देती है, जिसका वह अधिकारी है? शायद नहीं। इसीलिए आज शिक्षा के पेशे में योग्य और होनहार विद्यार्थी नहीं आना चाहते।

यदि आप युवाओं से पूछें कि वे क्या बनना चाहते हैं, तो अध्यापक बनने की लालसा रखने वाले छत्र बहुत कम मिलेंगे। ऐसे बहुत से सर्वेक्षण हुए हैं, जिनमें शीर्ष दस पेशों में अध्यापन आठवें- नौवें क्रम में आता है। शिक्षा में अच्छे और प्रतिबद्ध युवा आएं, इसके लिए सरकारों को अपना नजरिया बदलना होगा। क्योंकि शिक्षा का पेशा एक ऐसा पेशा है, जिस पर अन्य सभी पेशे निर्भर हैं।

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