इस चुप्पी को क्या समझें
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जब भी महिलाओं के खिलाफ कोई घटना सामने आती है, तो महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाले तमाम महिला संगठन अपना आक्रोश व्यक्त करने और न्याय की मांग उठाने का कोई तरीका ढूंढते हैं। लेकिन दुर्गा वाहिनी नामक महिला संगठन ऐसा नहीं करता। यह विश्व हिंदू परिषद का महिला संगठन है। इसके नेता और सदस्य यह दावा करते हैं कि हिंदू महिलाओं का सच्चा प्रतिनिधित्व वही करते हैं। इन दावों के बावजूद किसी हिंदू महिला (यहां यह कहना आवश्यक है कि बाकी तमाम महिला संगठन धर्म के आधार पर महिलाओं का विभाजन करने में विश्वास नहीं रखते हैं) के साथ अत्याचार की कोई घटना उजागर होती है, तो इस संगठन की तरफ से किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं आती।
पिछले एक सप्ताह में दिल को दहला देने वाली कम से कम दो घटनाएं घटीं। एक महिला सरपंच की इसलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि उसने अपनी मां का दाह-संस्कार किया। जबकि उस बूढ़ी मां को उसके भाई ने घर से निकाल दिया था। मगर जब उसे मां के दाह-संस्कार की खबर मिली, तो वह अपने बेटे के साथ वहां पहुंचा और दोनों ने कुल्हाड़ी से वार करके महिला सरपंच की हत्या कर दी। इसी तरह पिछले दिनों हरियाणा में दो बक्सों में एक महिला और एक पुरुष के शव मिले। जांच में पता चला कि औरत 'ऊंची जाति' की और पुरुष दलित जाति का था। अनुमान लगाया जा रहा है कि दोनों की हत्या लड़की के परिवार वालों ने अपनी 'इज्जत' बचाने के लिए की होगी। इन घटनाओं पर दुर्गा वाहिनी चुप रही।
ऐसा भी नहीं है कि दुर्गा वाहिनी के नेता किसी मुद्दे पर नहीं बोलते हैं। दीपिका पादुकोण के वीडियो 'मेरी मर्जी' (माई चॉइस) के खिलाफ तो उनकी तरफ से अंगारे बरस रहे हैं। उन्होंने दीपिका के विचारों को भारतीय संस्कृति की परंपराओं के खिलाफ ठहराया है। आखिर दीपिका की मर्जी है क्या? उनका कहना है कि वह अपनी मर्जी से तय करेंगी कि उन्हें क्या पहनना है; उन्हें कितने बजे घर वापस आना है; उन्हें किससे प्यार करना है; उन्हें कब और किससे संबंध बनाने हैं। अगर कोई पुरुष यह बोलता, तो शायद ही कोई चर्चा होती, क्योंकि पुरुष तो सदियों से अपनी मर्जी से अपने सारे फैसले लेते आए हैं। मगर एक महिला ऐसी बात करे, तो लगता है कि पुरुषप्रधानता का ढांचा कुछ हिल गया है।
शायद इस तरह की बातें उस ढांचे की नींव को थोड़ा कमजोर करती हैं, क्योंकि ऐसी बातें सुनना कई सारी नवयुवतियों और महिलाओं को अच्छा लगता है, जिनके कान यह सुन-सुनकर पक गए हैं कि उनके पहनावे, उनके घर से निकलने और उनके अपने चाल-चलन की वजह से ही उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ता है। इसी तरह, समलैंगिक संबंधों की वकालत केवल कुछ व्यक्तियों द्वारा ही नहीं, बल्कि कुछ न्यायाधीशों, कई सामाजिक संस्थाओं, तमाम बुद्धिजीवियों और कुछ प्रमुख राजनीतिक दलों की ओर से भी की जा रही है। अगर दीपिका इन तमाम लोगों के विचारों से अपनी सहमति अपनी भाषा में जताती है, तो ऐसा करने का उसे पूरा अधिकार है। मगर दुर्गा वाहिनी को महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित रखने की चिंता के बजाय उन प्रतिक्रियावादी विचारों और परंपराओं को सुरक्षित रखने की चिंता अधिक है, जो पुरुषप्रधानता और असमानता को जिंदा रखती हैं।
-लेखिका माकपा की पूर्व सांसद हैं