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विज्ञापन में क्या रखा है

Mon, 10 Jun 2013 09:15 PM IST
अरविंद तिवारी
अरविंद तिवारी Updated Mon, 10 Jun 2013 09:15 PM IST
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what is in ad

भाई साहब! आपका नजरिया ‘बायस्ड’ ही कहा जाएगा। आपको केंद्र सरकार और उसकी पार्टी के विज्ञापनों में खोट दिखाई दे रही है।

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आप यह मांग कर रहे हैं कि उनके विज्ञापन- मीलों हम आ गए, मीलों हमें जाना है, में संशोधन किया जाए। विज्ञापन की ‘पंच लाइन’ को आपने क्या स्कूली पाठ्यक्रम समझ रखा है, जिसे पार्टी के हिसाब से बदल दिया जाए!

आप कहते हैं कि हम कहीं न आए, न गए, जहां थे, वहीं खड़े हैं, इसलिए मीलों आ गए वाला अंश तत्काल हटाया जाए।

आपके विचार से विज्ञापन की पंच लाइन में सिर्फ ‘मीलों हमें जाना है’ वाक्य ही रखा जाए। भाई साहब, अपने सीने पर हाथ रखकर सोचें, क्या यह वाक्य यूपीए-दो के लिए उचित होगा।
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क्या यह वाक्य आजादी प्राप्ति के तुरंत बाद वाला विज्ञापन नहीं लगेगा? उस समय हमें सचमुच मीलों जाना था, जो आपके हिसाब से अब भी हमारे पास उतने ही मीलों का टार्गेट है।
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भाई साहब, आपके हिसाब से मीलों चलने के बाद भी हमारे पास उपलब्धि के नाम पर सिफर ही है! आप तो देश की प्रगति पर प्रश्नचिह्न लगाने पर आमादा हैं।

जरा पीछे मुड़कर देखिए, क्या सचमुच हम मीलों तक नहीं चले। यह भी हो सकता है कि हम चलते तो रहे, मगर गलत दिशा में चले।

जब सही दिशा के बारे में पता चला, तो फिर लौट पड़े। हमने फिर से शुरुआत  की, मगर दोबारा गलत दिशा में मुड़ गए। आपका यह कहना कि हमने सफर ही नहीं किया, गलतबयानी के सिवाय कुछ नहीं है।


गली में चक्कर काटने की तरह हमारा देश भी लगातार चलता रहा है। यह बात दीगर है कि इतना चलने के बाद भी हम वहां नहीं पहुंचे, जहां पहुंचना था!

हमने भटकते हुए जितना रास्ता तय किया, वह मीलों चलने में शुमार किया जाएगा। हमने परिस्थितियां देखकर रास्ता बदला। हमारे काफिले पर भ्रष्टाचार नाम के हिंस्र प्राणी ने हमला किया।

हम पीछे नहीं लौटते, तो क्या करते! भ्रष्टाचार ने ‘2जी’ और ‘मनरेगा’ का वह हाल किया कि वे अभी तक आईसीयू में हैं। हम लौटते नहीं, तो क्या कोयला लुटवाते!

आपने तो हद कर दी, लौटने वाले ‘मील’ काउंट ही नहीं कर रहे! इसलिए इस तथ्य को मानो कि हम मीलों आ गए, भले ही घूम-फिरकर अपने घर ही आ गए हों!

हां, आगे से ध्यान रखेंगे कि मीलों का बाकी सफर सही दिशा में तय करें। इसलिए विज्ञापन के शब्दों को छोड़ो, उसकी मूल भावना देखो।

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