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चेहरा बदलने भर से क्या होगा

Tue, 17 Mar 2015 06:44 PM IST
कल्लोल चक्रवर्ती
कल्लोल चक्रवर्ती Updated Tue, 17 Mar 2015 06:44 PM IST
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What happen if only face change

विशाखापट्टनम में अगले महीने होने वाली 21वीं पार्टी कांग्रेस में माकपा के नए महासचिव के बारे में ऐलान हो सकता है। पर उससे पहले पश्चिम बंगाल में राज्य माकपा का नेतृत्व इतने खामोश ढंग से बदल गया कि उस पर ध्यान भी नहीं गया! ऐसा क्या इसलिए है कि इसमें बहुत विलंब हो चुका है? 2011 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद से ही नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठ रही थी। पर अब जाकर प्रांतीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी विमान बसु से सूर्यकांत मिश्र के पास गई है। अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, जबकि अगले कुछ दिनों में कई जगहों पर स्थानीय निकायों के चुनाव भी हैं।

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वर्ष 2010 में ज्योति बसु की मृत्यु हुई थी, और उसके एक साल बाद वाम मोर्चा राज्य की सत्ता से बाहर हुआ था। पर राज्य कमेटी में हुआ बदलाव इसलिए अर्थपूर्ण है कि विमान बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य की आजमाई जोड़ी के नेपथ्य में जाने को पीढ़ीगत बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। छियासठ साल के सूर्यकांत मिश्र प्रांतीय अध्यक्ष और विधानसभा में नेता विपक्ष, दोनों की जिम्मेदारी एक साथ निभाएंगे। राज्य में इससे पहले यह दोहरी जिम्मेदारी सिर्फ ज्योति बसु ने निभाई थी, पर वह भी तब, जब वाम पार्टी का विभाजन नहीं हुआ था।
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माकपा की प्रांतीय कमेटी की नई सूची देखें, तो उसमें अनेक युवा चेहरे दिखते हैं। बुजुर्गों को बाहर करने की ऐसी होड़ है कि कभी ताकतवर उद्योग मंत्री रहे निरुपम सेन तक की भूमिका विशेष आमंत्रित तक सीमित हो गई है। सूर्यकांत मिश्र को मेदिनीपुर जैसे दुर्गम इलाके में शिक्षा के प्रसार में बड़ी भूमिका निभाने का श्रेय जाता है। विमान बसु की तुलना में वह मितभाषी हैं, और फैसलों को लागू करने में ज्यादा तत्पर भी। माकपा को पहली बार ऐसा मुखिया मिला है, जो मोबाइल पर उपलब्ध है, और जो मैसेज और मेल कर पाने में भी सक्षम है! पर सूर्यकांत पहले प्रांतीय अध्यक्ष हैं, जिनकी पत्नी के एनजीओ पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। लेकिन जब ग्रामीण बंगाल में तृणमूल ने माकपा का किला ढहा दिया है, और अब तृणमूल के समानांतर भाजपा की लहर चलने लगी है, तब नेतृत्व बदलने भर से माकपा क्या वाकई कुछ हासिल कर पाएगी? वह भी तब, जब यह कहा जाए कि राज्य में भाजपा का उभार माकपा की कीमत पर हो रहा है? पिछले कुछ समय में बुद्धदेव भट्टाचार्य सिंगुर-नंदीग्राम, शिक्षा के राजनीतिकरण और प्राथमिक विद्यालयों से अंग्रेजी हटाने सहित अपनी सरकार के कई फैसलों की आलोचना कर चुके हैं। इस आत्मालोचन को किस तरह देखा जाए?
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बंगाल माकपा में हुए इस परिवर्तन को देखें, तो यह बदलाव की इच्छा से उठाया गया कदम कम और विवशता का नतीजा ज्यादा लगता है। पचहत्तर के विमान और इकहत्तर के बुद्ध, दोनों वर्षों से जिम्मेदारी छोड़ने की इच्छा जताते आए हैं। जिन्होंने कुछ दिनों पहले बुद्धदेव भट्टाचार्य की बूढ़ी और विवश तस्वीर देखी होगी, वे तस्दीक करेंगे कि नेतृत्व को बहुत पहले ही उनकी इच्छा मान लेनी चाहिए थी। इसके बावजूद इन दोनों को कमेटी में रखा गया है, बल्कि विमान बसु से तो वाम मोर्चे के चेयरमैन की जिम्मेदारी भी नहीं ली जा रही। श्यामल चक्रवर्ती और दीपक सरकार जैसे बुजुर्गों को भी उनके इन्कार के बावजूद राज्य कमेटी में रखा गया है। यानी युवाओं को मौका देने के बावजूद माकपा के पास बहुत विकल्प नहीं हैं। ऐसे में, सूर्यकांत मिश्र का नारा-तृणमूल भगाओ बंगाल बचाओ, भाजपा भगाओ देश बचाओ-बड़बोलापन ही ज्यादा लगता है।

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