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ऐसी सिद्धियां किस काम की
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 03 May 2013 09:23 PM IST
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भारतीय धर्मग्रंथों में कहा गया है कि सेवा-सहायता को तत्पर रहने वाला मानव मोक्ष को प्राप्त होता है। अगर किसी के पास कोई विद्या है और उसका वह दूसरों की सेवा में सदुपयोग नहीं कर रहा, तो उस विद्या का कोई महत्व नहीं।
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इसी से संबंधित एक प्रसंग स्वामी रामकृष्ण परमहंस का है। यह घटना उन दिनों की है, जब वह कैंसर से पीड़ित थे। नरेंद्र उनकी सेवा में हर समय तत्पर रहते थे। एक दिन परमहंस जी ने नरेंद्र को कहा, बेटा, योग साधना के माध्यम से मैंने अष्ट सिद्धियां प्राप्त की हैं। मैंने तो उनका उपयोग किया नहीं, अंतिम समय में मैं उन सिद्धियों में तुम्हें पारंगत करना चाहता हूं।
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नरेंद्र ने पूछा, क्या उन अष्ट सिद्धियों से ईश्वर का साक्षात्कार कराने की सामर्थ्य प्राप्त हो सकेगी? रामकृष्ण ने जवाब दिया, नहीं, ईश्वर साक्षात्कार तो नहीं कराया जा सकेगा, किंतु सांसारिक सुख-सुविधाएं, वह भी एक सीमा के अंदर, अवश्य प्राप्त हो सकेंगी।
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तो गुरुदेव, ऐसी सांसारिक सिद्धियों मेरे लिए निरर्थक हैं। मेरा लक्ष्य मात्र आत्म-साक्षात्कार है। गरीबों की सेवा जीवन का दूसरा प्रमुख लक्ष्य है। आप सिद्धियों की जगह मुझे इन दोनों लक्ष्यों में सफल होने का आशीर्वाद दें..., ये शब्द कहते-कहते स्वामी विवेकानंद (नरेंद्र) गुरुदेव के चरणों में झुक गए। रामकृष्णदेव अपने अलौकिक शिष्य की दिव्य भावना से अभिभूत हो उठे।