क्या चाहते हैं ट्रंप

Shashank Shashankशशांक पूर्व विदेश सचिव Updated Wed, 03 Jun 2020 07:54 AM IST
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : PTI

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अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से रिश्ता तोड़ लिया है और उस पर यह आरोप लगाया है कि वह चीन द्वारा नियंत्रित है। ट्रंप ने आरोप लगाया कि डब्ल्यूएचओ उन सुधारों को आगे नहीं बढ़ा पाया, जिनकी बेहद जरूरत थी। अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को शुरू से ही देखें, तो इसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं लगता है।
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राष्ट्रपति बनने के बाद से ही वह 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति को आगे बढ़ा रहे हैं। आम तौर पर वह द्विपक्षीय संबंधों को ज्यादा तरजीह देते हैं, जिसमें परस्पर लेन-देन की बात हो। चूंकि वह व्यावसायिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति रहे हैं, इसलिए परस्पर लेन-देन पर उनका ज्यादा ध्यान रहता है और उसमें भी वह अमेरिकी हित को ज्यादा तवज्जो देते हैं।
चाहे वह जलवायु परिवर्तन का मसला हो, या डब्ल्यूटीओ का मसला हो या अमेरिका की पहल पर शुरू किए गए क्षेत्रीय व्यापार का मसला हो, उस सबसे भी उन्होंने हाथ खींच लिया। नाफ्टा (द नार्थ अमेरिकन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) से भी उन्होंने हाथ खींच लिया और उनमें शामिल देशों से अलग-अलग बातचीत करके उन्होंने व्यापारिक संबंध स्थापित किए। तो एक तरह से देखा जाए, तो उनकी पृष्ठभूमि यही है। इसी तरह से उन्होंने सैन्य गठबंधनों में भी किया, चाहे नाटो हो, जापान, कोरिया के साथ सैन्य गठजोड़ हो, हरेक में उन्होंने कहा कि आप अमेरिका को क्या दे रहे हो।
जबकि पहले का इतिहास देखें, तो वैश्विक संगठन की जितनी भी संस्थाएं बनी हैं, उसमें अमेरिका  ने बढ़-चढ़कर योगदान किया है और अग्रणी भूमिका निभाई है। चाहे वह संयुक्त राष्ट्र हो या उससे पहले बनी संस्था लीग ऑफ नेशंस हो। वैश्वीकरण का जब दौर चला, वह भी अमेरिका की पहल पर ही हुआ। उस समय अमेरिका को लगा था कि सिर्फ सरकारों को ही नहीं, निजी  संगठनों को इन सब पहलों में साथ लेकर चलना चाहिए।

लेकिन ट्रंप इन सब को परे रखकर अमेरिका फर्स्ट की नीति पर चलते हैं और उसी के अनुरूप सौदा करते हैं। उसी नीति पर चलते हुए वह चाहते हैं कि उनके जो मतदाता हैं, वे मजबूती के साथ उनके साथ बने रहें। वह खुद को सबसे बेहतर सौदेबाज साबित करना चाहते हैं। अब चूंकि नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं, इसलिए वह दूसरी बार भी व्हाइट हाउस में बने रहने के लिए प्रयत्नशील हैं। तो मुझे लगता है कि डब्ल्यूएचओ से रिश्ता तोड़ने का फैसला उसी की कड़ी है।

कोरोना वायरस को वह चीनी वायरस या वुहान वायरस कहते हैं। वर्ल्ड हेल्थ एसेंबली में उन्होंने चीन के खिलाफ बहुत जोर लगाया, लेकिन उनको वैसी सफलता नहीं मिली। चीन ने यह बात मान ली है कि कोरोना वायरस के प्रसार की जांच हो, लेकिन उस जांच की जिम्मेदारी भी एक तरह से डब्ल्यूएचओ को ही मिली है।

भले ही उसमें और देश भी शामिल रहेंगे, लेकिन अमेरिका जिस तरह से चाहता था कि चीन पर भारी दबाव पड़े, जरूरी नहीं है कि वैसा ही हो। दरअसल खुद ट्रंप के सामने भी काफी दबाव हैं। अमेरिका में कोरोना के चलते एक लाख से ऊपर लोग मरे हैं। इसके अलावा ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिसमें अश्वेतों के खिलाफ पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग किया है।

इसके खिलाफ भी वहां प्रदर्शन हो रहे हैं। ट्रंप ने कहा है कि जरूरत पड़ी, तो स्थिति को संभालने के लिए वह सेना बुलाएंगे। इस तरह से अमेरिका में अराजकता की स्थिति पैदा हो गई है। घरेलू राजनीति के कारण उनके लिए चीन को दबाव में लाना आवश्यक है।

इसी के संदर्भ में मुझे लगता है कि उन्होंने नए संगठन की बात की है। जैसे जी-7 के लिए उन्होंने कहा कि यह संगठन अब अनुपयोगी हो चुका है। आपको याद होगा कि जी-7 देशों की जो बैठकें हुई हैं अब तक, उनकी जो तस्वीरें आई हैं, वे मित्रता दर्शाने वाली तस्वीरें नहीं हैं। इसलिए वह भारत समेत अन्य देशों को इसमें शामिल करने की बात कर रहे हैं।

चीन को अलग-थलग करना उनके लिए बहुत आवश्यक हो गया है। उन्होंने अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाने का वादा किया है, वह भी बहुत संवेदनशील मामला है उनकी घरेलू राजनीति के लिए। इसके लिए उन्होंने अफगानिस्तान की सरकार को छोड़कर पाकिस्तान और तालिबान से हाथ मिलाया है। चूंकि चीन को दबाव में रखने के लिए भारत का साथ जरूरी है, इसलिए संबंधों में संतुलन और भारत को अपने पाले में लाने के लिए वह जी-7 को जी-10 या जी-11 बनाने की बात कह रहे हैं।

जहां तक डब्लूएचओ की बात है, अमेरिका के रिश्ता तोड़ लेने से उसे थोड़ी आर्थिक कठिनाइयां जरूर आएंगी, लेकिन वह अपना काम करता रहेगा। दूसरी बात यह है कि इसमें अमेरिकी फर्मास्यूटिकल लॉबी का काफी वर्चस्व है। मुझे लगता है कि यह लॉबी अमेरिकी सरकार पर दबाव बनाएगी कि डब्ल्यूएचओ से रिश्ता फिर से कायम किया जाए, अन्यथा दूसरे देशों की फर्मास्यूटिकल या वैक्सीन लॉबी उसमें हावी हो जाएंगी, जो अमेरिका के हित में नहीं होगा। इस बीच, डब्ल्यूएचओ की अध्यक्षता एक साल के लिए भारत को मिली है, इसलिए भी वह भारत को अपने पाले में रखना चाहते हैं, ताकि डब्ल्यूएचओ के भीतर चीन पर दबाव बनाने के लिए भारत की मदद लें और खुद बाहर रहकर डब्ल्यूएचओ और चीन पर दबाव बनाएं।

इस तरह से नई विश्व व्यवस्था जो बन रही है, उसमें भारत को सावधानी पूर्वक अपने हितों को देखते हुए कदम उठाना पड़ेगा। चूंकि भारत की यह नीति रही है कि वह किसी देश का पिछलग्गू नहीं बन सकता, इसलिए भारत को देखना होगा कि उसके आर्थिक और रणनीतिक हित किसमें है। कई देशों में कोविड-19 का दूसरा दौर शुरू हो चुका है। हमारे यहां भी मामले बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन अन्य देशों के मुकाबले हमारी स्थिति बेहतर रही है।

वैसे तो कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन नई विश्व व्यवस्था में भारत के लिए बेहतर संभावनाएं हो सकती हैं। हमारे सांस्कृतिक मूल्य ऐसे रहे हैं, जिसमें प्रकृति का ख्याल रखा जाता है। आयुर्वेद, योग, और अन्य चिकित्सा पद्धतियों के जरिये भी रोग प्रतिरक्षा शक्ति को बढ़ाया जाता है। कोरोना का संकट खत्म होने के बाद अपनी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में हम इनका इस्तेमाल कर सकते हैं।
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