लक्ष्य करे सवाल तो क्या जवाब दें : भारत की कहानी सवालों और जवाबों में उलझकर रह गई है
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
भारत की कहानी सवालों और जवाबों में उलझकर रह गई है। धारणा को मंदी के जोखिम से चुनौती मिल रही है। पिछले हफ्तों के दौरान 2019-20 में जीडीपी की विकास दर को कम कर सात फीसदी रहने का अनुमान व्यक्त किए जाने के बीच दीर्घकाल में विकास दर के सात फीसदी से अधिक रहने का वादा कायम है।
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
भारत की कहानी सवालों और जवाबों में उलझकर रह गई है। धारणा को मंदी के जोखिम से चुनौती मिल रही है। पिछले हफ्तों के दौरान 2019-20 में जीडीपी की विकास दर को कम कर सात फीसदी रहने का अनुमान व्यक्त किए जाने के बीच दीर्घकाल में विकास दर के सात फीसदी से अधिक रहने का वादा कायम है।
राजनीतिक नेतृत्व वह सब कह रहा है, जो आकांक्षी भारत उससे सुनना चाहता है। लेकिन क्या नीति तंत्र वह सब कर रहा है, जिसकी जरूरत है? तथ्य यह है कि अर्थव्यवस्था आवश्यकता और अनुकूल परिस्थितियों के संधि स्थल पर खड़ी है। जनसांख्यिकी में अंतर्निहित विकास के अवसर- और कच्चे तेल की कम कीमत या फिर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों की मेहरबानी से आसान रिटर्न जैसे अवसर का लाभ उठाने के लिए अनुकूल परिस्थितियों की जरूरत है।
पिछले हफ्ते भारत ने 2024 तक जीडीपी के पचास खरब डॉलर हो जाने का लक्ष्य रखा है, यह 28 खरब डॉलर की अर्थव्यस्था के लिए वाकई बहुत बड़ा कदम होगा। क्या इसे हासिल किया जा सकता है? इसका जवाब नजरिये पर निर्भर करता है। सभी विकास अनिवार्य रूप से भिन्न तरह की कहानियों का योग होते हैं— भारत की जीडीपी राज्यों के उत्पादन का योग है। अमेरिकी राज्य कैलिफोर्निया की जीडीपी 27 खरब डॉलर की है, जबकि टेक्सास की 17 खरब डॉलर।
भारतीय राज्यों में देखें, तो मुश्किल से पांच राज्य ही 200 अरब डॉलर को पार कर सके हैं, जिनमें चार सौ अरब डॉलर के साथ महाराष्ट्र शीर्ष पर है। विकास में तेजी और अर्थव्यवस्था के विस्तार में स्थानीय नीतिगत सुधार उत्प्रेरक बनते हैं। क्या राज्य राजनीतिक बयानों के अनुरूप नीतिगत कार्रवाई कर रहे हैं? विकास के लिए जरूरी हर बड़ा सुधार अब राज्यों की दहलीज पर है।
बेशक, सार्वजनिक वित्त पोषित स्वास्थ्य बीमा योजना आयुष्मान भारत मौजूद है, लेकिन इसकी भूमिका सीमित है, क्योंकि यह बीमार होने की स्थिति में ही काम करता है। एहतियाती और निवारक स्वास्थ्य सुरक्षा का क्या होगा? बिहार में 150 से अधिक बच्चों की मौतों ने स्मरण कराया है कि जन स्वास्थ्य सुरक्षा प्रणाली में निवेश की जरूरत है। आंकड़े उपेक्षा की कहानी बताते हैं। नीति आयोग का अध्ययन दिखाता है कि 2017-18 में केरल ने स्वास्थ्य के लिए 6,882 करोड़ रुपये आवंटित किए थे, वहीं उससे तीन गुना अधिक आबादी वाले बिहार ने सिर्फ 6,668 करोड़ रुपये का बजटीय आवंटन रखा।
जन स्वास्थ्य सुरक्षा प्रणाली की खराब स्थिति कचरा प्रबंधन पर जन नीति की आपराधिक उपेक्षा के कारण और बदतर हुई है, जिससे गरीबों और मध्य वर्ग की अरक्षितता और बढ़ रही है। खराब नीति का मुजाहिरा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के पूर्वी हिस्से में स्थित गाजीपुर में किया जा सकता है, जहां कूड़े का सबसे बड़ा ढेर जमा है, जिसकी ऊंचाई करीब 65 मीटर है और इसने फुटबॉल के चार सौ मैदान जितनी जगह घेर रखी है। वहां रोजाना दो हजार टन कचरा उड़ेला जा रहा है और इसकी ऊंचाई 75 मीटर को छू सकती है, यानी ताजमहल से भी ऊंचा जिसकी ऊंचाई 73 मीटर है।
हां और नहीं दोनों। पूरे देश में राज्य सरकारों ने पिछले पांच वर्षों से 22 लाख से अधिक सरकारी नौकरियों को खाली छोड़ रखा है। यह सुनने में भले अच्छा न लगे, लेकिन राजनीति में लोकलुभावन घोषणाओं का चुनावी लाभांश स्थायी समाधान पर भारी पड़ रहा है। क्या जो लोग पास हुए हैं उनमें रोजगार हासिल करने लायक कौशल है? कड़वा सच यह है कि उन लोगों के कौशल और शिक्षा का कोई मानचित्रण नहीं है, जो स्कूलों और कॉलेजों से बाहर निकलकर नौकरी के बाजार में प्रवेश करते हैं। यहां तक कि केंद्रीय स्तर पर भी डाटा सिर्फ पंजीयन को दर्शाता है मायने यह रखता है कि किस विषय में कितने स्नातक हैं।
मैकेंजी का अध्ययन बताता है कि 1.2 करोड़ महिलाएं और 4.4 करोड़ पुरुष स्वचालन के कारण नौकरियां खो सकते हैं। क्या राज्यों के पास इससे निपटने की कोई योजना है? उत्पादकता, जमीन, श्रम और पूंजी जैसे कारकों पर गौर कीजिए। जमीन और श्रम सुधार राज्यों पर निर्भर हैं। कृषि जगत की हताशा न सिर्फ केंद्रीकृत नारों की मांग करती है, बल्कि राज्य सरकारों को सुव्यवस्थित समाधान तलाशकर उन पर अमल करना चाहिए। श्रम कानून संहिता का मसौदा 2016 से राज्यों के पास लंबित पड़ा है। इसी तरह से कांट्रेक्ट फार्मिंग से संबंधित आदर्श कानून राज्यों की राजधानियों में धूल खा रहा है।
हां, पूंजी की कमी है और वित्तीय बाजार के संकट ने विकास और निवेश को गति देने वाली वित्तीय गतिविधियों और खपत को अवरुद्ध कर रखा है। कम ब्याज वाली व्यवस्था आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। रिजर्व बैंक और सरकार के फिल्मी अंदाज में मैं हूं न कहने से काम नहीं चलेगा। पचास खरब डॉलर की आकांक्षा के लिए जरूरी होगा कि सत्तारूढ़ दल अपने शब्दों का मुद्रीकरण करे औऱ चुनावी नारों पर अमल करे।