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जो सूरत कर सकता है, वह हम क्यों नहीं
पत्रलेखा चटर्जी
Updated Sun, 03 May 2015 03:56 PM IST
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भूकंप जर्जर नेपाल से डरावनी कहानियां निरंतर आ रही हैं। इस आपदा में वहां छह हजार से अधिक लोग मारे गए हैं। नेपाल के दुर्गम इलाकों के हजारों लोगों के बारे में कुछ पता नहीं है। खुद नेपाल की सरकार ने यह आशंका जताई है कि मरने वालों की संख्या दस हजार से अधिक हो सकती है। भूस्खलन और प्रतिकूल मौसम के कारण अलग-थलग पड़े इलाकों में राहत अभियान बाधित हुआ है।
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भारत हालांकि इस भूकंप की भयावहता से बच गया, लेकिन रिक्टर स्केल पर 7.9 की क्षमता का होने, और पश्चिम नेपाल में इसका केंद्र होने के कारण देश के कुछ हिस्से में नुकसान होने के अतिरिक्त भूटान, चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी इसका कमोबेश असर दिखा है। भारत में इस भूकंप से लगभग सत्तर लोगों की जान गई और सैकड़ों घायल हुए।
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भूकंप के तत्काल बाद मानवीय सहायता का जैसा परिचय दिया गया, वह वाकई स्वागतयोग्य है, लेकिन इसका ध्यान रखना होगा कि पुनर्निर्माण की जल्दी में योजनाबद्ध निर्माण से समझौता कतई न हो। आंकड़े बताते हैं कि भूकंप रोधी निर्माण पर जितना खर्च आता है, भूकंप की राहत में उससे पांच गुना अधिक राशि खर्च होती है। प्राकृतिक आपदा के असर को कम करने के लिए हम क्या कर सकते हैं? आपदा की हमेशा पूर्वसूचना नहीं होती, और न ही उनसे बचा जा सकता है, लेकिन उसके असर को कम जरूर किया जा सकता है। नेपाल का यह भयावह भूकंप हमारे लिए सिर्फ एक चेतावनी नहीं है, बल्कि योजनाबद्ध निर्माण के लिए हमें आगाह करने का एक अवसर भी है।
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उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लीजिए। यह लेख लिखते समय राज्य में भूकंप से चौदह लोगों के मारे जाने का आंकड़ा है। सूबे के पचहत्तर में से करीब पचास जिले ऐसे हैं, जहां भूकंप की स्थिति में बड़ा नुकसान हो सकता है। भूकंप रोधी निर्माण पर ध्यान दिए बगैर बढ़ते शहरीकरण से प्राकृतिक आपदा की स्थिति में जानमाल की भारी तबाही हो सकती है। एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि राज्य के 25,000 से अधिक भवनों की शिनाख्त कमजोर और खतरनाक इमारतों के रूप में हुई है। या तो इन भवनों की मजबूती पर काम करना चाहिए, या इन्हें गिरा देना चाहिए। उत्तर प्रदेश अकेला राज्य नहीं है, जहां इस तरह की स्थिति है। देश भर में खतरनाक इमारतों के असंख्य उदाहरण मिलेंगे-कहीं समुचित बिल्डिंग कोड का पालन किए बगैर निर्माण हुए हैं, तो कहीं बाढ़ संभावित इलाकों में पुनर्निर्माण कार्य हुआ है आदि। सेंटर फॉर साइंस ऐंड इन्वायर्नमेंट (सीएसई) ने हाल ही में कहा है कि भारत में भूकंप के बगैर भी इमारतों के ध्वस्त होने के मामले सामने आते हैं। उसके मुताबिक, अकेले दिल्ली में सत्तर से अस्सी फीसदी भवन नियम-कानूनों का उल्लंघन कर बने हैं।
दरअसल झुग्गी बस्तियों का विस्तार होने और पारिस्थितिकी के बिगड़ने के कारण ग्रामीण जीविका के खतरे में पड़ने की वजह से दुनिया भर में प्राकृतिक आपदाओं की आशंका बढ़ी है। जलवायु परिवर्तन के कारण, जिससे जलापूर्ति, कृषि और जैव विविधता पर प्रतिकूल असर पड़ा है, यह खतरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। खासकर जलवायु परिवर्तन की वजह से इस तरह के खतरों को टाला नहीं जा सकता, लेकिन वे आपदा का रूप तब लेते हैं, जब हमारा तंत्र उन खतरों के असर को कम करने में सक्षम नहीं हो पाता।
आपदा अकारण नहीं आती। आपदा और विकास एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। आपदा अगर विकास की पहल को खत्म करती है, तो विकास के नए अवसर भी पैदा करती है। आपदा सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर लोगों और परिवारों का विनाश नहीं करती, गरीब समुदाय के विकास पर भी इसका भीषण असर पड़ता है। आपदा विकास को बाधित करती है, और यह अवरोध लोगों के जीवन यापन, स्वास्थ्य, शिक्षा, लैंगिक स्तर और दूसरे क्षेत्रों पर भी असर डालता है। लेकिन आपदाएं योजनाबद्ध पुनर्निर्माण और चीजों को सही करने का मौका भी देती हैं। उदाहरण के लिए, भूकंप से ध्वस्त इलाकों में निर्माण योजनाएं न सिर्फ नई हुनर सिखा देती हैं, बल्कि ऐसा अवसर समुदायों को एकजुटता के लिए भी प्रेरित करता है।
सूरत के हालिया दौरे ने मुझे बताया कि एक शहर किस तरह संकट से सीखता है। सूरत 1994 में प्लेग से प्रभावित हुआ था और 2006 में भीषण बाढ़ से। लेकिन स्थानीय प्रशासन और नागरिकों ने उन आपदाओं से सबक सीखे। और आज सूरत न सिर्फ देश के साफ-सुथरे शहरों में से एक है, बल्कि उसके पास बीमारियों की निगरानी का एक शानदार तंत्र भी है। तापी नदी के किनारे बसे सूरत को बाढ़ का खतरा रहता है। लेकिन 2006 में बेहतर जल प्रबंधन, बांध-जल भंडार तथा बाढ़ की पूर्वसूचना की व्यवस्था कर उसने इससे निपटने का तरीका ढूंढ लिया है। सूरत ने कोई अनोखा काम नहीं किया है। उसने सुरक्षित भविष्य के लिए निवेश किया है-यह एक ऐसा सबक है, जिसे दूसरे राज्यों और शहरों को भी सीखना चाहिए।