जनतंत्र बेचारा क्या करे!
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देश की जनता अच्छे मानसून से आमतौर पर खुश है। फसल, कारोबार और पर्यावरण के लिए अच्छा संकेत है। पर संसद के मानसून सत्र से जनता में मायूसी नजर आती है। लोगों को आए दिन संसद में हंगामे, वॉकआउट, काम रोकने वाली नारेबाजी और शोर-शराबे की खबर मिलती है। ज्यादा कुछ किए बगैर संसद की बैठकें स्थगित हो जाती हैं। नेताओं के मुकाबले आम लोगों को इस बात का ज्यादा एहसास है कि देश आज किस तरह के गंभीर संकट से गुजर रहा है! बढ़ती महंगाई, अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपये की घटती ताकत और तेजी से बढ़ती विषमता के मौजूदा दौर में अच्छे मानसून के बावजूद भविष्य बहुत सुहाना नहीं नजर आता। शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में लोगों के सामने समस्याओं की बड़ी और जटिल तस्वीर उभरती है। क्या हमारी सरकार और हमारी संसद इस तस्वीर से रूबरू है?
सरकार और संसदीय राजनीति के शीर्ष नेता मौजूदा हालात से अनजान नहीं हैं। सरकार के अपने आंकड़े कई मामलों में भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं। आर्थिक विकास की मौजूदा रणनीति, उसके फलितार्थ, समस्याओं और समाधान की संभावनाओं पर केंद्रित नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज की नई किताब एन अनसर्टेन ग्लोरीः इंडिया ऐंड इट्स कंट्राडिक्शंस से भी आर्थिक विकास की मौजूदा रणनीति और हमारी समूची राजनीतिक-आर्थिकी (पोलिटिकल-इकोनामी) के अंतर्विरोधों की एक तस्वीर उभरकर आती है। सेन और द्रेज ने हमारे विकास मॉडल की तुलना ‘सब-सहारा अफ्रीकी समंदर में झिलमिलाते कैलिफोर्निया के कुछ द्वीपों’ से की है। यानी बीते कुछ वर्षों में विकास सिर्फ चंद क्षेत्रों या लोगों का हुआ है, आम भारतीय के जीवन में विकास की रोशनी नहीं पहुंच पा रही है या पहुंच रही है, तो बहुत धीरे-धीरे। कुल मिलाकर, इस बेडौल राजनीतिक-आर्थिकी की तस्वीर का सबसे बुनियादी पहलू है, हमारा असंतुलित और विषमतामूलक विकास। यह देश को किसी खतरनाक मुकाम की तरफ भी ले जा सकता है। अगर बड़ी संभावनाएं हैं, तो खौफनाक आशंकाएं भी हैं।
आखिर इसके लिए कौन दोषी है? लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था को दुनिया के बड़े राजनीतिक-चिंतकों और दार्शनिकों ने हर दृष्टि से शासन का बेहतर विकल्प माना है। फिर कहां चूक हो रही है? अगर बीते दो दशकों का एक लेखा-जोखा लें, तो पाएंगे कि हमारी संसदीय व्यवस्था की कामकाजी खामियां लगातार बढ़ रही हैं। लेकिन सरकार और दल इसे मानने को तैयार नहीं हैं, निहित स्वार्थों में वे इस कदर लिप्त हैं कि तनिक-सी आलोचना भी उन्हें बर्दाश्त नहीं। संसदीय कामकाज में निरंतर गिरावट ही नहीं आई है, बल्कि जो कामकाज हो रहा है, उसका कार्यपालिका के स्तर पर सही फॉलोअप या ठोस क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। सरकार और राजनीतिक दलों ने अपने संसदीय कामकाज को स्वयं गंभीरता से लिया होता, तो लोकपाल, कश्मीर, महिला आरक्षण, भूमि अधिग्रहण कानून, तेलंगाना, गहराते जल-संकट, मंदिर-मस्जिद विवाद या केंद्र-राज्य संबंधों के कई अनुत्तरित मामलों को लेकर इतना लंबा गतिरोध नहीं पैदा हुआ होता।
मौजूदा संसदीय राजनीति और शासन के स्तर पर बढ़ती नकारात्मकता पर जब कभी जनता या जनसंगठनों की तरफ से सवाल उठते हैं, तो सत्ता या विपक्ष से जुड़े शीर्ष राजनेता लगभग एक स्वर में बोलने लगते हैं। उनका एक ही तर्क होता है, ‘संसद की सर्वोच्चता को चुनौती नहीं दी जा सकती। जो लोग संसदीय राजनीति पर सवाल उठा रहे हैं, वे संसद की सर्वोच्चता को चुनौती देते हुए देश में अराजकता पैदा करना चाहते हैं।’
याद कीजिए, अब से दो-ढाई साल पहले ‘लोकपाल-जनलोकपाल’ की बहस और अन्ना-केजरीवाल की अगुवाई में चले जबर्दस्त अभियान के दौरान सत्ता पक्ष और कुछ विपक्षी दलों की तरफ से बार-बार कहा गया, ‘जंतर-मंतर और रामलीला मैदान की गोलबंदी देश की संसदीय राजनीति और संसदीय संस्थाओं की अवमानना पर उतारू है। अन्ना-केजरीवाल-प्रशांत की तिकड़ी संसद की सर्वोच्चता को चुनौती दे रही है।’ एक हद तक सही भी था कि अन्ना अभियान के दौरान सड़कों पर उतरे मध्यवर्गीय सैलाब के एक हिस्से में संसदीय व्यवस्था के प्रति आक्रोश ही नहीं, नफरत का भाव नजर आता था। लेकिन अभियान में शामिल संजीदा और सुचिंतित लोगों का कहना था कि सन 68 से जिस लोकपाल के गठन का वायदा किया जा रहा है, आखिर हमारी संसद ने उसे आज तक विधेयक के रूप में क्यों नहीं पारित किया! सवाल उठता है, क्या संसदीय सर्वोच्चता की दुहाई देने वाले हमारे संसदीय दलों और उनके संचालकों को शासन की संसदीय परंपरा और उसके बुनियादी उसूलों में भरोसा है?
सच तो यह है कि संसदीय मूल्यों को वे स्वयं कमजोर करते नजर आ रहे हैं और इसका सीधा संबंध राजनीतिक दलों के अंदर विलुप्त होते आंतरिक लोकतंत्र से है। जाति-संप्रदाय के वर्चस्व के अलावा राजनीति के कॉरपोरेटीकरण ने इस समस्या को बीते दो दशकों के दौरान विकराल बना दिया है। जनप्रतिनिधि सीधे जनता के प्रति नहीं, अपने संसदीय दल या संगठन के नेता के प्रति जवाबदेह होने में ही भलाई समझते हैं। उसके बाद उनकी जवाबदेही उन लोगों के प्रति होती है, जो महंगे चुनावों के इस दौर में उन्हें हर तरह की मदद पहुंचाते हैं। तीसरे नंबर पर आती है, जनता! ऐसे में ‘जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए’ जैसे खूबसूरत लफ्जों में परिभाषित जनतंत्र बेचारा क्या करे!