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करीब आती लपटें: तेल की कीमतों की आग में झुलस रही अर्थव्यवस्था, पश्चिम एशिया युद्ध का बाजार पर दिख रहा असर
केंद्र सरकार ने तेल आयात स्रोतों में विविधता लाने, रणनीतिक तेल भंडार (मंगलौर, पदुर, विशाखापत्तनम) का उपयोग करने, होर्मुज मार्ग पर निर्भरता कम करने के लिए अन्य मार्गों की खोज, और आवश्यक वस्तु अधिनियम के माध्यम से घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करने जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन आम नागरिकों को भी घबराने के बजाय ऊर्जा खपत कम से कम करने जैसे कदम उठाने की जरूरत है।
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पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध की लपटों से जहां वैश्विक अनिश्चितता पैदा हो गई है, वहीं तेल की कीमतों में भारी उछाल और दुनिया भर के शेयर बाजारों में गिरावट देखने को मिली है। बृहस्पतिवार को भारतीय शेयर बाजार में भी भारी गिरावट देखने को मिली। बीएसई सेंसेक्स एक समय 2,700 अंक तक फिसल गया था, जबकि निफ्टी भी 23,000 से नीचे आ गया था। इस गिरावट से निवेशकों को करीब 12 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। हालांकि, इस ऐतिहासिक गिरावट की कई वजहें हैं, जिनमें सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में आया उछाल है। ऊर्जा अवसंरचनाओं पर हमले के कारण कच्चे तेल की कीमत करीब 10 फीसदी तेजी के साथ 116 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। दूसरी वजह यह है कि उम्मीद के मुताबिक महंगाई कम न होने के चलते अमेरिका के फेडरल बैंक ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 93 के पार चला गया, जो सर्वकालिक न्यूनतम है। तेल की कीमतों में तेजी से रुपये पर और दबाव बढ़ेगा। इससे भारत का तेल आयात बिल बढ़ जाएगा और चालू खाते पर दबाव बढ़ेगा। गौरतलब है कि इस युद्ध से उपजे संकट और अनिश्चितता के कारण ऊर्जा सुरक्षा संकट में दिख रही है, आपूर्ति शृंखलाओं पर खतरा मंडराने लगा है, महंगाई में बढ़ोतरी की आशंका बढ़ गई है और केंद्रीय बैंक पर भी दबाव बढ़ गया है। विशेष रूप से, एशिया की ऊर्जा-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पश्चिम एशिया के संघर्ष की आग अब भारत के हितों को भी गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा रही है। गैस संकट के चलते औद्योगिक शहरों से प्रवासी मजदूरों का अपने गांव-घर लौटने का सिलसिला शुरू होना एक बड़ी चिंता और अफरा-तफरी का कारण बन सकता है। सरकार को इस पर तुरंत आवश्यक कदम उठाने चाहिए। हालांकि, केंद्र सरकार ने तेल आयात स्रोतों में विविधता लाने, रणनीतिक तेल भंडार (मंगलौर, पदुर, विशाखापत्तनम) का उपयोग करने, होर्मुज मार्ग पर निर्भरता कम करने के लिए अन्य मार्गों की खोज, और आवश्यक वस्तु अधिनियम के माध्यम से घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करने जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन आम नागरिकों को भी घबराने के बजाय ऊर्जा खपत कम से कम करने जैसे कदम उठाने की जरूरत है। पश्चिम एशिया का संकट हमें याद दिलाता है कि शांति केवल नैतिक नहीं, बल्कि आर्थिक आवश्यकता भी है।
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