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इस्राइल-लेबनान टकराव: पेजर हमलों ने बदली दुनिया... शायद दुनिया दूरगामी प्रभाव देखने के इंतजार में है
Sat, 28 Sep 2024 04:28 AM IST
ज्योति भास्कर
ब्रूस श्नेयरसु, रक्षा विशेषज्ञ और हार्वर्ड केनेडी स्कूल में लेक्चरर
ब्रूस श्नेयरसु, रक्षा विशेषज्ञ और हार्वर्ड केनेडी स्कूल में लेक्चरर
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Sat, 28 Sep 2024 04:28 AM IST
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लेबनान में हिज्बुल्ला पर हमला।
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अमर उजाला
विस्तार
पिछले दिनों हिजबुल्ला पर इस्राइल के खुलेआम हमले, जिसमें सैकड़ों पेजर और द्विमार्गी रेडियो फट गए और कम से कम 37 लोग मारे गए, ने उस खतरे को स्पष्ट रूप से दर्शाया है, जिसके बारे में साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ वर्षों से चेतावनी दे रहे हैं। इनसे यह भी जाहिर हुआ कि कंप्यूटरीकृत उपकरणों के लिए हमारी अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं के अपने खतरे होते हैं और इसलिए ये हमें कमजोर बनाती हैं। मुश्किल यह है कि इनसे बचाव का हमारे पास कोई बेहतर साधन भी नहीं है। ये घातक ऑपरेशन बेशक चौंकाने वाले थे, लेकिन इन्हें अंजाम देने के लिए इस्तेमाल में लाया गया कोई भी तत्व नया नहीं था।
इस्राइल ने भले ही इसमें अपनी भूमिका होने से न तो इन्कार किया है, और न ही इसकी पुष्टि की है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला को अपहृत करने और हिजबुल्ला के उपकरणों में प्लास्टिक विस्फोटकों के उपयोग उसकी रणनीति वर्षों से जारी है। नई बात यह है कि इस्राइल ने इसका इतने विनाशकारी और असाधारण सार्वजनिक ढंग से प्रदर्शन किया कि इससे यह स्पष्ट हो गया कि महाशक्तियों के बीच युद्ध, शांति और दोनों के बीच के वक्त में प्रतिस्पर्धा का भविष्य कैसा होगा?
शिकार सिर्फ आतंकवादी ही नहीं होंगे। हमारे कंप्यूटर भी असुरक्षित हैं, और हमारी कारें व रेफ्रिजरेटर भी। शिकार हर जगह हैं। हमारे घर में मौजूद कोई भी चीज शिकार हो सकती है। इस ऑपरेशन का मुख्य घटक पेजर व रेडियो में प्लास्टिक विस्फोटकों को प्रत्यारोपित करना नया नहीं है। 2001 में रिचर्ड रीड नामक आतंकी ने भी अपने जूते में बम रखकर विमान को उड़ाने की नाकाम कोशिश की थी।
हवाई अड्डों में जिन स्कैनरों से आपकी जांच होती है, और बाद में आपके सामान की भी जांच होती है, उसके पीछे धारणा यही होती है कि छोटे से छोटा उपकरण भी भयावह तबाही ला सकता है। पेजर हमलों का अंतिम और तार्किक रूप से अधिक जटिल हिस्सा एक अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला पर हमला करना है, जैसा कि अलग-अलग उद्देश्यों को लेकर अमेरिका करता रहता है। अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी कथित तौर पर पारगमन संचार उपकरणों को रोकती है, उनमें अपने अनुकूल संशोधन करती है। हालांकि उसका उद्देश्य विनाशकारी नहीं है, लेकिन इससे गोपनीयता तो खतरे में आती ही है।
एडवर्ड स्नोडेन के दस्तावेज भी अमेरिका की ऐसी गतिविधियों की तस्दीक करते हैं। मुखौटा कंपनियां बनाकर पीड़ितों को मूर्ख बनाने की यह कोई नई चाल नहीं है। ताजा मामले में कथित तौर पर इस्राइल ने हिजबुल्ला को विस्फोट से भरे उपकरण बनाने और बेचने के लिए एक मुखौटा कंपनी बनाई। वर्ष 2019 में एफबीआई ने ऐसी कंपनी बनाई, जो अपराधियों को कथित रूप से सुरक्षित सेलफोन बेचती थी, जिसका उद्देश्य उनकी हत्या करना नहीं था, बल्कि उनकी गोपनीय बातचीत सुनना और उसके आधार पर उन्हें गिरफ्तार करना था।
अंतिम बात, अगर हमारी आपूर्ति शृंखला असुरक्षित है, तो इसका मतलब है कि हम असुरक्षित हैं। इंटरनेट से जुड़े व्यक्तिगत उपकरण और अमेरिका जैसे देश जहां इनका उपयोग बहुतायत में होता है, खास तौर पर जोखिम में हैं। वर्ष 2007 में इदाहो राष्ट्रीय प्रयोगशाला ने साबित किया कि साइबर हमले के कारण हाई वोल्टेज जेनरेटर में विस्फोट भी हो सकता है। माना जाता है कि वर्ष 2010 में अमेरिका और इस्राइल ने संयुक्त रूप से एक कंप्यूटर वायरस विकसित किया था, और जिससे ईरानी परमाणु संयंत्र को नष्ट कर दिया था। वर्ष 2017 में वििकलीक्स की ओर से सीआईए के गोपनीय दस्तावेजों के आधार पर दावा किया था कि कारों को रिमोट से हैक कर कई अज्ञात हत्याएं की गई थीं।
यह कोई सैद्धांतिक बात नहीं है, वर्ष 2015 में सजीव प्रसारण के दौरान एक रिपोर्टर ने हैकर को अपनी चलती कार को रिमोट से नियंत्रित करने की अनुमति दी थी। रिपोर्टर जब हाईवे पर था, तो हैकर ने उसकी कार के इंजन को निष्क्रिय कर दिया था।
हालांकि, दुनिया ने पहले ही इस खतरे से तालमेल बिठाना शुरू कर दिया है। कई देश संचार उपकरणों को उन देशों से खरीदने में सजगता बरत रहे हैं, जिन पर उन्हें भरोसा नहीं है। अमेरिका समेत अन्य देश चीनी कंपनी हुआवेई के बड़े राउटर्स पर प्रतिबंध लगा रहे हैं, क्योंकि डर है कि इनका इस्तेमाल जासूसी में या फिर दुश्मनी बढ़ने पर इन्हें दूर से ही निष्क्रिय किया जा सकता है।
करीब एक दशक पहले अमेरिकी सेना ने अपने उपकरणों में लगे चीन के उपकरणों की सुरक्षा के जोखिम के मद्देनजर जांच की थी। वर्ष 2018 में आई ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने चीन पर कंप्यूटरी चिपों को परिष्कृत कर जानकारी चुराने का आरोप लगाया था।
दिक्कत यह है किसी को यह नहीं पता कि इस तरह के हमलों से कैसे बचाव किया जाए। हमारी उच्च तकनीकी आपूर्ति शृंखलाएं जटिल और अंतरराष्ट्रीय हैं। इसने हिजबुल्ला को खतरे की चेतावनी नहीं दी थी कि उनके पेजर हंगरी की एक कंपनी से आए थे, जो वहां ताइवान से पहुंचे थे, क्योंकि यह बिल्कुल सामान्य बात थी। अमेरिकियों द्वारा खरीदा जाने वाला ज्यादातर इलेक्ट्रॉनिक सामान विदेश से आता है। यहां तक कि आईफोन के कुछ पुर्जे चीन से आते हैं। हम यह कल्पना नहीं कर सकते कि वाशिंगटन ऐसा कोई कानून लाएगा कि आईफोन पूरी तरह से अमेरिका में ही बनेगा। क्योंकि, इसकी श्रम लागत बहुत ज्यादा है और अमेरिका में ऐसी चीजें बनाने की घरेलू क्षमता भी नहीं है। आपूर्ति शृंखलाओं को बदलने के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को 1980 के दौर में ले जाना पड़ेगा। लेकिन फिलहाल हिजबुल्ला तो लंबे वक्त तक इन उपकरणों पर भरोसा करने से रहा।
दुनिया शायद इन हमलों के दूरगामी प्रभाव देखने के इंतजार में है। संभव है कि दूसरे देश भी इस रणनीति को अपनाएं। अगर ऐसा होता है, तो अमेरिका जैसे विकसित देश ही ज्यादा असुरक्षित होंगे, क्योंकि उनके पास ही दुनिया के सबसे ज्यादा असुरक्षित उपकरण हैं।