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पश्चिम एशिया: टैंक नहीं, स्कूलों की जरूरत

Wed, 23 Jan 2019 07:04 PM IST
Raman Singh थॉमस एल फ्रीडमैन
थॉमस एल फ्रीडमैन Published by: Raman Singh Updated Wed, 23 Jan 2019 07:04 PM IST
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West Asia: No Tanks, Schools Needed
ट्यूनीशिया की महिलाएं

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सीरिया से अमेरिकी सैनिकों को बाहर निकालने और अफगानिस्तान में उनकी संख्या कम करने की अचानक घोषणा ने पश्चिम एशिया में अमेरिकी थल सेना के बारे में एक नई बहस छेड़ दी है कि उन्हें वहां रखना महत्वपूर्ण है या नहीं। मैं खुद से भी वही सवाल पूछ रहा हूं। हालांकि उस सवाल का जवाब देने के लिए मुझे एक और सवाल से शुरुआत करनी होगी- ऐसा क्यों है कि एक अरब क्रांति वाला देश, जो तानाशाही से एक सांविधानिक लोकतंत्र में अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण बदलाव लाने में कामयाब रहा और वह भी अपनी महिलाओं के पूर्ण सशक्तीकरण के साथ, जिसके साथ हमने कम से कम संपर्क रखा है और जहां हमने अपने सैनिकों को लड़ने और मरने के लिए कभी नहीं भेजा? वह देश है, ट्यूनीशिया।


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ट्यूनीशिया पश्चिम एशिया का एकमात्र ऐसा देश है, जिसने वह लक्ष्य हासिल किया है, जो हम इराक, सीरिया, मिस्र, लीबिया, यमन और अफगानिस्तान में बेहद शिद्दत से चाहते हैं। उसने अमेरिकी सैन्य सलाहकारों की तुलना में पिछले 50 वर्षों में अमेरिकी शांति वाहिनी के कहीं अधिक कार्यकर्ताओं की मेजबानी के बाद ऐसा किया है और 2010-11 की लोकतंत्र की बहाली से संबंधित अपनी क्रांति के बाद उसने मात्र एक अरब डॉलर की सहायता (और तीन ऋण गारंटी) प्राप्त की है। तुलनात्मक रूप से अमेरिका अफगानिस्तान को एक बहुलतावादी लोकतंत्र में बदलने की कोशिश के 17 वर्ष बाद अब वहां एक वर्ष में 45 अरब डॉलर खर्च कर रहा है। यह एक उन्मादी विरोधाभास है, खासकर तब जब आप समझते हैं कि ट्यूनीशिया का स्व-संचालित लोकतंत्र उस क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण मॉडल है, लेकिन तेजी से आर्थिक रूप से कमजोर होता जा रहा है।

ट्यूनीशिया खुद को लोकतंत्र में क्यों बदल सका, जबकि अन्य देश ऐसा नहीं कर सके? इसकी शुरुआत 1956 में ट्यूनीशिया को स्वतंत्रता मिलने के बाद से 1987 तक उसके नेता और संस्थापक रहे हबीब बोरगुइबा से होती है। हालांकि वह भी अन्य अरब तानाशाहों की तरह जीवन भर के लिए राष्ट्रपति थे, लेकिन वह कुछ मामलों में अनूठे थे। उन्होंने अपनी सेना का आकार छोटा रखा और इस्राइल को खत्म करने की कोशिश में चार दशक खत्म नहीं किए। वह सहअस्तित्व की बात करने वाले अकेली आवाज थे।

उन्होंने ट्यूनीशियाई महिलाओं को शिक्षित और सशक्त बनाया और अपेक्षाकृत मजबूत नागरिक समाज समूहों को उभरने दिया-ट्रेड यूनियन, वकीलों का सिंडिकेट, महिला समूह, जो बोरगुइबा के अत्याचारी उत्तराधिकारी को परास्त करने और ट्यूनीशिया के इस्लामी आंदोलन के साथ एक नया संविधान बनाने के लिए महत्वपूर्ण थे। ट्यूनीशिया के पास भी थोड़ा तेल था, जिसकी कमाई को उसने अपने नागरिकों को शिक्षित करने में निवेश किया।

संक्षेप में, ट्यूनीशिया के पास लोकतांत्रिक क्रांति को बनाए रखने के लिए सांस्कृतिक आधार था। लेकिन राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलाव विभिन्न गतियों से होते हैं। अमेरिका (जिसमें मैं भी शामिल हूं) अफगानिस्तान और इराक में तेजी से आवश्यक सांस्कृतिक बदलाव चाहता है, लेकिन जैसा कि एक बार पीटर ड्रकर ने कहा था- 'संस्कृति नाश्ते में रणनीति को खा जाती है।' इस तथ्य और हमारी खुद की अक्षमता और उनके भ्रष्टाचार ने इराक और अफगानिस्तान में लोकतंत्र के लिए अमेरिकी प्रयासों को खा लिया है।

यह सब यह बताने के लिए है कि ट्रंप के सीरिया से अचानक हटने और अफगानिस्तान से बाहर निकलने के बारे में मैं कैसे सोचता हूं। मुझे लगता है कि अफगानिस्तान के मामले में वह सही हैं। हमने वहां अल-कायदा को पराजित किया है; चरणबद्ध वापसी के लिए तालिबान और पाकिस्तान के साथ बातचीत करने का यह अच्छा अवसर है और जितने लोग हमारे लिए काम कर सकते हैं, उन्हें साथ लेने का समय है। अफगानिस्तान के चारों और रूस, पाकिस्तान, भारत, चीन और इरान जैसे देश हैं, जो वहां की अव्यवस्था को नियंत्रित एवं प्रबंधित करने की क्षमता रखते हैं। हम उसमें हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
 
हालांकि मैं सीरिया में अपना विशेष बल रखूंगा, लेकिन इसलिए नहीं कि आईएसआईएस को अभी हराना बाकी है। आईएसआईएस तो सऊदी अरब और इरान के नेतृत्व में चलने वाले शिया-सुन्नी के  क्षेत्रीय संघर्ष का प्रत्यक्ष उत्पाद है। आईएसआईएस ईरान और इराक में समर्थक ईरानी शिया आतंकियों के चरमपंथ के खिलाफ एक सुन्नी प्रतिक्रिया के रूप में पैदा हुआ था। जब तक ईरान उस रणनीति का अनुसरण करता है, तब तक किसी न किसी रूप में आईएसआईएस रहेगा।
 
अंत में मैं अफगानिस्तान से बाहर निकलने के बाद हमारे पास बचने वाले 45 अरब डॉलर में से दो अरब डॉलर लूंगा और संपूर्ण अरब दुनिया में उन सांस्कृतिक बदलावों में निवेश करूंगा, जिन्होंने ट्यूनीशिया को अनूठा बनाया है। मैं काहिरा में अमेरिकी विश्वविद्यालय, बेरूत में अमेरिकी विश्वविद्यालय, इराक में अमेरिकी विश्वविद्यालय, सुलेमानी और अफगानिस्तान में अमेरिकी विश्वविद्यालय को बड़ी सहायता दूंगा।

और मैं व्यापक स्तर पर छात्रवृत्ति कार्यक्रम का विस्तार करूंगा। मैं अमेरिका में अध्ययन के लिए छात्र वीजा और छात्रवृत्ति का भी विस्तार करूंगा, खासकर अरब महिलाओं के लिए। और मैं दुबई में वीजा उपलब्ध करवाकर ईरानियों को अमेरिका आकर विज्ञान, इंजीनियरिंग या चिकित्सा में ग्रेजुएट की पढ़ाई के लिए 5000 छात्रवृत्ति का प्रस्ताव दूंगा। वहां लाइन इतनी लंबी होगी कि इससे ज्यादा और कुछ भी ईरानी शासन को शर्मिंदा नहीं करेगा।
 
और मैं ट्यूनीशिया को एक अरब डॉलर का ब्याज मुक्त कर्ज दूंगा और ट्यूनीशियाई अमेरिकी उद्यम का आकार चौगुना कर दूंगा, जो वहां स्टार्ट अप को प्रोत्साहित करेगा। बाकी के 43 अरब डॉलर मैं अमेरिका में नई बुनियादी संरचनाओं के विकास पर खर्च करूंगा। 9/11 के बाद से हम पूरी तरह हार्ड पावर पर निर्भर हो गए हैं। कुछ की जरूरत थी, कुछ की जरूरत अब भी है, लेकिन इनमें से ज्यादातर विफल रहे। अब यह सॉफ्ट पावर को आजमाने का समय है। हां, इसमें लंबा समय लगेगा, लेकिन इसका कोई शाॅर्टकट नहीं है। और हम जिस पेंटागन के नेतृत्व में प्रयास कर रहे थे, उसने कई अंधी खाई की तरफ हमें धकेला है।

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