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मौसम का मिजाज: बदल रहे पुराने मौसमी पैटर्न, हमें इससे तालमेल बिठाना सीखना होगा

Tue, 03 Feb 2026 06:31 AM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नितिन गौतम Updated Tue, 03 Feb 2026 06:31 AM IST
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सार
माघ-फागुन के महीने में आमतौर पर ठंड धीरे-धीरे विदा होने लगती है, लेकिन इस बार बारिश, ठंड और कोहरे का तिहरा असर चुनौती बना हुआ है। फरवरी की शुरुआत में मौसम का बदलता मिजाज संकेत देता है कि पुराने मौसमी पैटर्न बदल रहे हैं।
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weather pattern changing rapidly impact on daily life
बरसात - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

फरवरी की शुरुआत उत्तर भारत के लिए बदलते मौसम की एक नई चुनौती लेकर आई है, जिसने जनजीवन को एक बार फिर असहज कर दिया है। माघ-फागुन के महीने में जहां आमतौर पर ठंड धीरे-धीरे विदा लेने लगती है, वहीं इस बार बारिश, तेज ठंड और घने कोहरे का तिहरा असर आम लोगों से लेकर प्रशासन तक के लिए चुनौती बन गया है। दिल्ली-एनसीआर, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कई हिस्सों में एक से तीन फरवरी तक हल्की से मध्यम बारिश की संभावना जताई गई है, जबकि हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में बर्फबारी का सिलसिला जारी है।


कोहरे का कहर भी कम नहीं है। घना कोहरा अब केवल सुबह और रात तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि कई इलाकों में दिन के वक्त भी दृश्यता बेहद कम बनी रहती है। उत्तर भारत का मौसम हमेशा से परिवर्तनशील रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी तीव्रता और अनियमितता बढ़ी ही है। इस बार पश्चिमी विक्षोभों की सक्रियता और ला-नीना के कमजोर पड़ते प्रभाव ने मिलकर फरवरी के पहले सप्ताह को असामान्य बना दिया है। पश्चिमी विक्षोभ दरअसल भूमध्यसागर से आने वाली हवाओं का तंत्र है, जो ठंड के मौसम के दौरान उत्तर भारत में बारिश और पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फबारी कराता है।


ऐसे लगातार दो विक्षोभों की वजह से, मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, तीन फरवरी तक हिमालयी राज्यों में बारिश व बर्फबारी और मैदानी राज्यों में हल्की बारिश की संभावना है। यही नहीं, अगले कुछ दिनों तक मौसम की मार से बचने की उम्मीद नहीं है, क्योंकि मौसम विभाग के मुताबिक आगामी पांच से सात फरवरी के बीच तीसरा पश्चिमी विक्षोभ हिमालयी राज्यों में फिर मौसम बदलेगा। उत्तर भारत में गेहूं, सरसों, चना और अन्य रबी फसलों के लिए यह निर्णायक चरण है। ऐसे में, ज्यादा बारिश और ओलावृष्टि फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है, क्योंकि अत्यधिक नमी से फफूंद और रोगों का खतरा बढ़ जाता है।

मैदानी इलाकों में यह अतिरिक्त नमी कोहरे को और घना बना रही है। हाल ही में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी अपनी रिपोर्ट में ठंड में कोहरे को वायु प्रदूषण बढ़ने का प्रमुख कारण बताया था। लिहाजा कोहरे की समस्या से सड़क, रेल और हवाई यातायात पर तो असर पड़ ही रहा है, यह सांसों के लिए भी भीषण संकट बन गई है। पश्चिमी विक्षोभों की बढ़ती सक्रियता, तापमान में उतार-चढ़ाव और कोहरे की तीव्रता, ये सब संकेत हैं कि पुराने मौसमी पैटर्न अब बदल रहे हैं। लिहाजा, हमें सतर्क रहना होगा, तैयारी करनी होगी और प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाना सीखना होगा। अन्यथा, हर सर्दी एक नई चुनौती लेकर आएगी।
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