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कमजोर बुनियादी ढांचे पर रेल
जयंतीलाल भंडारी
Updated Wed, 27 Feb 2013 09:54 PM IST
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पवन कुमार बंसल ने रेल बजट में यात्री किराये में प्रत्यक्ष रूप से हालांकि कोई वृद्धि नहीं की है, लेकिन तत्काल टिकट, रिजर्वेशन, कैंसलेशन, सुपर फास्ट ट्रेन में अतिरिक्त चार्ज के कारण यात्री किराया अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ जाएगा। इसी तरह माल भाड़ा भी ईंधन सरचार्ज के कारण बढ़ जाएगा। ऐसे में रेल का सफर पहले से महंगा तो हो ही गया है।
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यह जरूर है कि रेल मंत्री एक ओर सभी वर्गों, मसलन महिला सशक्तिकरण, खिलाड़ियों को रियायतें, युवाओं को नौकरी, वरिष्ठ नागरिकों के लिए प्लेटफॉर्म पर लिफ्ट, वैष्णो देवी जाने वाले तीर्थयात्रियों आदि के लिए सुविधाओं का प्रावधान करते दिखाई पड़े, वहीं भारतीय रेल को 23 घंटे इंटरनेट बुकिंग, रेलवे आरक्षण, वेबसाइट की क्षमता वृद्धि, ई-टिकट प्रणाली तथा आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कदम उठाते हुए भी दिखाई दे रहे हैं।
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उन्होंने नए रेल बजट में सैम पित्रोदा द्वारा दिए गए रेल आधुनिकीकरण के सुझावों पर ध्यान दिया है। सीमित संसाधनों के बावजूद जहां उन्होंने देश के विभिन्न क्षेत्रों के लिए 67 नई एक्सप्रेस, 27 पैसेंजर ट्रेनों सहित कई रेलगाड़ियों के फेरे बढ़ाने के प्रावधान किए, वहीं अरुणाचल प्रदेश जैसे सीमांत राज्यों को भी नए रेल मार्ग की सुविधा दी है। इसी तरह मणिपुर की चिंता भी रेल बजट में स्पष्ट दिखाई पड़ी है।
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सच्चाई दरअसल यह है कि देश की जरूरत के लिहाज से रेल मार्ग भी कम पड़ रहे हैं। इतना ही नहीं, रेलों की संख्या कम पड़ रही है। रेल में सुविधाओं का भारी अभाव तो खैर है ही। लोकलुभावन राजनीति का परिचय देने के कारण वर्ष 2003 से 2012 तक के रेल बजटों में यात्री किराये में कोई वृद्धि नहीं की गई थी। लालू प्रसाद तथा ममता बनर्जी ने केवल वाहवाही हासिल करने के लिए भारतीय रेलवे को बहुत पीछे छोड़ दिया।
देश के विकास में रेलवे का योगदान चूंकि अहम है, अतएव रेलवे के संसाधन बढ़ाने बहुत जरूरी हैं। लेकिन यात्री किराये और माल भाड़े में वृद्धि आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर कहीं कड़वाहट देने वाली न बन जाए। इसी मुश्किल के कारण रेल मंत्री खुले रूप से संसाधन नहीं जुटा पाए। संसाधन जुटाने के लिए यात्री किराये और माल भाड़े में बढ़ोतरी की राह निस्संदेह मुश्किल थी।
बजट से पहले यात्री किराये में कुछ वृद्धि करते हुए रेल मंत्री नए बजट में यात्री किराया न बढ़ाने का संकेत दे चुके थे। लेकिन डीजल के दाम में वृद्धि ने उन्हें माल भाड़े पर फ्यूल सरचार्ज लगाने के लिए बाध्य किया। अलबत्ता माल भाड़े में अब तक इतनी अधिक वृद्धि हो चुकी है कि भविष्य में इस बढ़ोतरी का प्रतिरोध देखने को मिलेगा और सड़क के मुकाबले रेल की लगातार घटती हुई हिस्सेदारी में और कमी आएगी।
स्थिति यह है कि संसाधनों के अभाव में विकास की ओर आगे बढ़ने के बजाय भारतीय रेल पिछड़ गई है। पिछले एक दशक में रेलयात्री तो दोगुने हो गए, लेकिन रेलवे कर्मचारियों की संख्या बढ़ने के बजाय करीब ढाई लाख घट गई। यह भी एक वजह है कि पटरियों पर दौड़ती ट्रेन असुविधा और असुरक्षा का पर्याय बन गई है।
बढ़ती रेल दुर्घटनाओं की पड़ताल करें, तो ये हादसे मानवीय भूल, रेलवे संसाधनों पर जरूरत से ज्यादा बोझ और नीतिगत खामियों का नतीजा दिखाई देते हैं। समुचित सुरक्षा मानकों की अनुपस्थिति के कारण पिछले कुछ वर्षों में रेल दुर्घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। रेल इंजन, डिब्बों, ट्रैक और सिग्नलिंग सिस्टम की मेंटनेंस और ओवरहॉलिंग का काम पिछड़ता गया है। रेलवे में ओवरलोडिंग बढ़ा दी गई है, लेकिन ट्रैक, पुल और पटरी की मरम्मत पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
भारतीय रेल को विकास की मंजिल पर पहुंचाने के लिए पवन कुमार बंसल हालांकि भारी-भरकम धनराशि का इंतजाम नहीं कर पाए हैं। लेकिन अपने सीमित संसाधनों द्वारा रेलयात्रियों की सुविधा और रेलवे के बुनियादी ढांचे की व्यवस्थाओं के बीच संतुलन बनाने में कामयाब रहे हैं। यहां यह भी कहना उपयुक्त होगा कि यदि रेल मंत्री कुछ और कदम आगे बढ़ाकर यात्री सुविधा, सुरक्षा व्यवस्था और रेल के बुनियादी ढांचे के लिए कुछ और कारगर व्यवस्था करते, तो रेल बजट और बेहतर बन सकता था।