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नदियों को बचाकर ही बचेंगे हम, वरना भुगतने होंगे दुष्परिणाम

Subhash Chandra Kushwaha सुभाष चंद्र कुशवाहा
Updated Wed, 16 Oct 2019 08:17 AM IST
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We will save only by saving rivers
प्रतीकात्मक तस्वीर

हाल ही में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने देश की 351 नदियों में बढ़ते प्रदूषण पर चिंता व्यक्त की है और नदियों में बढ़ते प्रदूषण की गंभीरता को देखते हुए उसने निगरानी के लिए सेंट्रल मानिटरिंग कमेटी का गठन किया है। हम जानते हैं कि मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ है, फिर भी हम नदियों को तबाह करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। नदियां हमारी संपदा हैं। उन्हें साफ और सुरक्षित रखा जाना चाहिए। अगर हम उसे प्रदूषित करते रहेंगे, तो वह दिन दूर नहीं, जब नदियां सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाएंगी। यह आशंका निर्मूल नहीं है। नदियों में गिर रहे सीवर, गंदे नाले और उनमें घुले रसायन, उनके प्रवाह और जल संरक्षिता को लगातार समेट रहे हैं। मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के अवशिष्ट बिना शोधन के नदियों के बहा दिए जाते हैं। यहां तक कि सल्फ्यूरिक एसिड जैसे खतरनाक रसायन भी बहाए जाते हैं। प्रदूषण नियंत्रणकारी संस्थाएं निष्प्रभावी रही हैं।


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दुनिया भर के देश अपनी नदियों और उनके तटों को साफ-सुथरा रखने, उनके उद्गम को सदानीरा बनाए रखने में जी-जान से लगे हुए हैं। उनमें सीवर या नालों का कचरा नहीं गिराया जाता। वहां नदियों में धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर फूल-माला, राख, लाश, लकड़ी बहाने की संस्कृति नहीं है। एक स्वस्थ नदी का पानी, न केवल जलीय जीवों को स्वस्थ रखता है, अपितु उससे सिंचित फल और सब्जियां विषाक्त नहीं होतीं। उन नदियों से प्राप्त होने वाली मछलियों में हानिकारक तत्व नहीं पाए जाते, जबकि हमारी नदियों की मछलियों में शीशे की मात्रा खतरनाक स्तर तक पाई जा रही है। गर्मी के मौसम में कई नदियों में डाले जा रहे कचरे की वजह से ऑक्सीजन की इतनी कमी हो जाती है कि मछलियों का दम घुटने लगता है। गोमती, यमुना और घाघरा जैसी नदियों में मछलियों को दम तोड़ते देखा गया है।

नदियों को कचरा निस्तारण का जरिया समझने का दुष्परिणाम यह हुआ है कि आज हमारी तमाम नदियां गर्मी के मौसम में सूखने लगी हैं। कई नदियों का अस्तित्व तो अब कागजों में सिमटकर रह गया है। कई सहायक नदियां सदा-सदा के लिए सूख चुकी हैं। गुजरात तथा राजस्थान की लगभग अधिकांश नदियां नाम मात्र को बहती हैं। उत्तराखंड और हिमाचल की तमाम नदियों के उद्गम सिमट गए हैं। इसका प्रभाव गंगा और यमुना जैसी महत्वपूर्ण नदियों पर भी पड़ा है। ऐसा क्यों है कि जिन नदियों को हम मां मानते हैं, उन्हीं का गला घोंट रहे हैं?

सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार नदियों में मूर्ति विसर्जन को रोका है। प्रशासन को मूर्ति विसर्जन की वैकल्पिक व्यवस्था करने का निर्देश दिया है, मगर हुआ क्या? इस बार भी दुर्गा पूजा के बाद नदियों में मूर्तियां विसर्जित की गईं। हमारे तमाम मेलों और धार्मिक स्नान के समय अशिक्षित जनता द्वारा नदियों में कचरा डाला जाता है। नदियों को संवारने के बजाय उन्हें कूड़ा फेंकने की जगह समझा जाता है।
नदियों की साफ-सफाई की चिंता करते दशकों बीत गए। गंगा को साफ करने के नाम पर अरबों फूंक दिए गए, मगर गंगा आचमन योग्य न रही। दूसरी नदियों का तो कोई पुरसाहाल नहीं है। मेरठ जिले में एक नदी है हिंडन। विकास का अभिशाप झेलती इस नदी को गंदे नाले में तब्दील कर दिया गया है। आज यह नदी कैंसर, बुखार, खुजली, और मच्छरों से होने वाली बीमारियों को जन्म दे रही है। विगत वर्षों में इसके पानी के विषाक्त होने के कारण करीब 300 मौतें हो चुकी हैं। ऐसी भयावह स्थिति अन्य नदियों की न हो, इसके लिए नदियों को बचाने के दिशा में सबको आगे आना होगा। यह काम सिर्फ सरकार, एक व्यक्ति या किसी एक संस्था से संभव भी नहीं है।

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