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ओबामा की जीत से हम सीखें
उदित राज
Updated Sat, 10 Nov 2012 10:13 PM IST
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डेमोक्रेटिक पार्टी के बराक ओबामा दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए हैं। गोरे नस्ल के रिपब्लिकन मिट रोमनी की करारी हार हुई है। यह वही अमेरिका है, जहां 1950 के दशक तक गोरे नस्ल को बस में पहले बैठने का अधिकार था। वर्ष 1955 में जब अश्वेत महिला रोजा पार्क बस की सीट पर से उठने से इनकार कर दिया, तो अमेरिका में भारी बवाल हो गया था। लेकिन अब अमेरिका पूरी तरह बदल गया है। जबकि भारत में लगभग 2500 वर्ष का भेदभाव कमोबेश वैसा ही चला आ रहा है।
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अमेरिका में 70 प्रतिशत से अधिक गोरे नस्ल की आबादी है और अश्वेत की लगभग 10 प्रतिशत है। यदि भारत में सवर्णों की आबादी 70 प्रतिशत और दलित की 10 प्रतिशत होती, तो स्थिति के बदतर होने की कल्पना की जा सकती थी। जब ओबामा पहली बार राष्ट्रपति बने थे, तो अमेरिका की आर्थिक दशा बहुत अच्छी नहीं थी। स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो एक गुणात्मक परिवर्तन करना चाहा था, वह भी नहीं हुआ। विदेश नीति आक्रामक बनी रही।
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अमेरिकियों ने ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में घुस कर मारा और उसका शव भी उठाकर ले गए। लीबिया में अमेरिकी सहयोग से ही तख्ता पलट हुआ और बिना वजह गद्दाफी की हत्या की गई। अमेरिका से जो रोजगार भारत में आउटसोर्स हो रहा था, उसे हमेशा कम करने की कोशिश करते रहे।
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मगर अपने चार साल के शासनकाल में ओबामा कोई विशेष परिवर्तन नहीं कर सके। भाषण या प्रखर वक्तव्य किसी भी व्यक्ति के आधे-अधूरे व्यक्तित्व एवं क्षमता को परिलक्षित करता है। वहां पर डेमोक्रेटिक एवं रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति उम्मीदवारों के बीच आमने-सामने का संवाद होता है। इस संवाद से भी वहां का चुनाव काफी प्रभावित होता है। ऐसा भी नहीं है कि बराक ओबामा के मुकाबले में वहां प्रखर वक्ताओं की कमी हो।
जब पहली बार वह राष्ट्रपति बने, तो एक सहमति बन गई थी कि एक बार एक अश्वेत को राष्ट्रपति बनने का मौका दिया जाना चाहिए। इस तरह की ही पाश्चात्य नीति होती है। ओबामा अच्छे वक्ता हैं। पर इस बार उनकी जीत इसलिए नहीं हुई कि उन्होंने अमेरिका को बदल दिया, बल्कि मिट रोमनी ने जो मुद्दे उठाए, उससे लोग असंतुष्ट हुए। सैंडी भी ओबामा के लिए भाग्यशाली सिद्ध हुआ, क्योंकि राहत कार्य में उनकी सरकार ने बहुत काम किए, जबकि मिट रोमनी नहीं चाहते थे कि सरकार का इतना हस्तक्षेप हो।
इस बार भी अश्वेत, हिस्पैनिक, एशिया मूल के निवासियों ने ओबामा को जमकर वोट दिया। अश्वेतों को कला, फिल्म, नौकरी, पत्रकारिता एवं व्यापार आदि में आरक्षण जैसी सुविधा है, जो गोरों की दरियादिली पर निर्भर करता है। हमारे यहां आरक्षण देने के लिए कानून है और वहां एक साधारण निर्देश है फिर भी सारे बड़े उद्योग घराने उसको लागू करने में गौरव महसूस करते हैं।
वर्ष के अंत में जब लाभांश घोषित करते हैं, तो यह बताना नहीं भूलते हैं कि उन्होंने अश्वेतों, हिस्पैनिक एवं मूल निवासियों को कितनी नौकरी और व्यापार दिया। जबकि भारत के उद्योगपति निजी क्षेत्र में आरक्षण का जबरदस्त विरोध कर रहे हैं। आज सौ से अधिक बड़ी कंपनियों के चीफ एक्जिक्यूटिव ऑफिसर अश्वेत नस्ल के हैं, जबकि भारत में एक भी दलित नहीं हैं।
आईआईएम अहमदाबाद में एक दलित लड़की ने टॉप किया, पर उसका कैंपस सेलेक्शन तीन बार नहीं हुआ, क्योंकि उसने जाति का उल्लेख कर दिया था। चौथी बार उसने जाति का उल्लेख नहीं किया, तो अच्छे पैकेज के साथ चयन हो गया। भारत के पास जितना खनिज, जलवायु का लाभ एवं दिमागदार लोग हैं, उतना शायद अमेरिका और अन्य देशों के पास न हो। यदि जाति के आधार पर यहां का समाज बंटा न होता, तो जिस घमंड में ओबामा बार-बार अमेरिका दुनिया में सुपर है, कह रहे थे, वह भारत का प्रधानमंत्री कहता। यहां के ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोगों को अमेरिका से सीखना चाहिए। जिस दिन यह एहसास भारतीयों को हो जाएगा उस दिन इसे सुपर पावर बनने से दुनिया का कोई भी मुल्क रोक नहीं सकता।