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हम साथ-साथ हैं, विरोधाभास में

शंकर अय्यर Updated Tue, 17 Apr 2018 06:44 PM IST
तीसरा मोर्चा
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मई, 2019 के लोकसभा चुनाव से बहुत पहले राजनीतिक विमर्श में काफी शोर-शराबा हो रहा है। पार्टियों ने खुद के अस्तित्व के लिए अपनी पहचान दांव पर लगा दी है, जैसा कि समाजवादी पार्टी (अखिलेश यादव) और बहुजन समाज पार्टी (मायावती) के नए सहयोग से परिलक्षित होता है। संसद के धुल गए सत्र ने दिखाया कि विपक्ष के बड़े धड़े ने चिंतन सत्र का आयोजन किया। सोनिया गांधी की डिनर डिप्लोमेसी के तहत तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी के साथ बैठकें हुईं, नायडू ने नेटवर्किंग की और के चंद्रशेखर राव ने संघीय मोर्चे का प्रस्ताव रखा।
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छह से बढ़कर बीस राज्यों में अपने दम पर और सहयोगी दलों के साथ सरकार बनाने वाली भाजपा के उदय ने राजनीतिक पुनर्गठन शुरू किया है। हाल ही में मुंबई में आयोजित भाजपा की स्थापना की 38वीं वर्षगांठ पर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने विपक्षी दलों के एकजुट होने का वर्णन करते हुए कुछ रूपकों का प्रयोग किया था, जब भीषण बाढ़ आती है, तो हर प्रकार के जीव-सांप, नेवला, कुत्ते और बिल्ली सभी एक बड़े पेड़ की तलाश करते हैं, ताकि उस पर चढ़ सकें। शाह का ऐसे कठोर शब्दों का प्रयोग असामान्य नहीं है, लेकिन यह दूसरे दलों से नेताओं को पार्टी में लाने की नीतियों के बारे में कुछ सवाल खड़े करता है। यहां सुखराम और तिवारी हैं और हाल ही में नरेश अग्रवाल को पार्टी में शामिल किया गया है और नारायण राणे के लिए भी जगह बनाई गई है। शिवसेना के साथ भाजपा के संबंधों और पीडीपी के साथ गंठबंधन पर भी सवाल उठे थे, जो बगैर अंतर्विरोध के नहीं है।

पक्षपाती राजनीति नए सहयोगी मोर्चे के भीतर प्रतिस्पर्धात्मक विरोधाभासों के बड़े मुद्दे को किनारे कर देती है। भाजपा या विशेष रूप से नरेंद्र मोदी को हराने की इच्छा से परे विपक्ष को एकजुट रखने वाले गीत का आधार आखिर कौन-सा राग है? साझा विरोध के एजेंडे से अलग सपा-बसपा के समझौते की मुख्य वजह क्या है? पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की भूमिका क्या होगी-क्या वह वाम दल के साथ जाएगी या ममता बनर्जी के साथ? क्या तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) ऐसे गठबंधन में रह सकती है, जिसमें कांग्रेस और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस), दोनों हों? क्या कांग्रेस ने महाराष्ट्र में राकांपा के साथ तालमेल बिठा लिया है? और उस शिवसेना का क्या, जो ममता की बैठकों में शामिल थे।
 
ऐसी असमान ताकतों के एकसाथ आने का यह पहला उदाहरण नहीं है। ऐसा 1970 के दशक में आपातकाल के दौरान भी हुआ था, जब इंदिरा गांधी की निरंकुशता बढ़ गई थी; अस्सी के दशक में राजीव गांधी के ऐतिहासिक 400 से ज्यादा सीटें जीतने के बाद भी ऐसा हुआ और 1996 में कांग्रेस के दमन के बाद भी। कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार भाजपा विरोधी भावनाओं का परिणाम थी, तो राजग-दो की जीत विरोधाभासों के अंतःविस्फोट तथा यूपीए के सहयोगी दलों के गलत तरीके से लाभ उठाने के कारण हुई थी। इन दोनों में एक चीज समान थी-अहंकार।
 
लिहाजा ऐसे किसी मोर्चे के वास्तुकारों को यह परिभाषित करना चाहिए कि वे किस चीज के लिए मोर्चा खड़ा कर रहे हैं। इतिहास के पास कुछ मूल्यवान सबक हैं। 1977 में जनसंघ, भारतीय लोक दल, सोशलिस्ट पार्टी और कांग्रेस (ओ) ने एकजुट होकर जनता पार्टी बनाई थी। उसने 345 सीटें जीतीं और इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर कर दिया, लेकिन 1979 के बाद वह सत्ता में नहीं रह सकी, क्योंकि उसके पास कोई नियमन नहीं था। 1989 में वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता दल ने 143 सीटें जीतीं और वाम दल तथा भाजपा की बैशाखी पर सत्ता में पहुंचा। लेकिन किसी एजेंडे (थीम सॉन्ग) के बिना साल भर के भीतर ही सरकार गिर गई। 1996 में क्षेत्रीय दलों ने संयुक्त मोर्चा बनाया, लेकिन दो साल के भीतर सरकार गिर गई और उसने भाजपा के लिए रास्ता बनाया।

भाजपा को हराने के लिए एक योजना की जरूरत है, जो सिर्फ एजेंडा पर भाजपा को हराने से कहीं ज्यादा है। 2004 में कांग्रेस ने मात्र 145 सीटें जीतने के बावजूद न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर एक गठबंधन सरकार बनाई थी और समावेशन तथा सबसे कमजोर के लिए एक नए सौदे का वायदा किया था। 2014 में नरेंद्र मोदी ने लोगों के सामने भविष्य के मार्ग के रूप में गुजरात मॉडल पेश किया था।

इतिहास हमें बताता है कि राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है, न दुश्मन, स्थायी केवल हित होता है। अन्नाद्रमुक, द्रमुक, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, तृणमूल कांग्रेस, बीजद, जद(यू), जद(एस)-ये सभी क्षेत्रीय दल समय-समय पर केंद्र में, कभी-कभी राज्य स्तर पर भी कांग्रेस और भाजपा के साथ रहे हैं और कभी-कभी सपा-बसपा की तरह पारस्परिक व्यवस्था की तरह भी। और ये सभी दल विरोधाभासों के साथ जीते हैं। शुरुआती खुशमिजाजी का कोई मतलब नहीं होता, गठबंधन में सारी व्यवस्था बिच्छु और मेढ़क की कल्पित कहानी की तरह होती है-जब बिच्छु नदी पार करने के लिए मेढ़क की सवारी करता है, तो मेढ़क को डंक मारता है। राजनीति में कौन किसको डंक मारेगा, निपुणता और संदर्भ पर निर्भर करता है। देर करने के बजाय पहले ही विरोधाभासों को सुलझा लेना चाहिए। अब तक इन दलों ने सिर्फ अपनी नाराजगी और आबादी के एक हिस्से के गुस्से को व्यक्त किया है। रोजगार सृजन, कृषि संकट, दलित एवं आदिवासियों के अधिकार, संघवाद, और उत्तर-दक्षिण विवाद का भूत-ये सभी मुद्दे वास्तविक हैं। समाधानों का ढांचा प्रदान किए बिना सिर्फ समस्याएं गिनाना ही पर्याप्त नहीं है।

प्रतिस्पर्धी राजनीति बयानबाजी से ज्यादा की मांग करती है, राजनीतिक दलों को विकास की वैकल्पिक कहानी पेश करनी चाहिए। देश की आबादी की औसत उम्र 29 वर्ष है और दस करोड़ नए वोटर मतदाता सूची में जुड़ेंगे। वे समाधान के लिए अधीर हैं। बिना एजेंडे के (जो मतदाताओं को बताता है कि इसमें उनके लिए क्या है) विरोधी मोर्चा विफल हो जाएगा। 

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