वेज टू लिव फॉर एवर
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मेरा नाम सैम है। मैं 11 साल का हूं। मैं कहानियां और मजेदार आंकड़े जमा करता हूं। मुझे ल्यूकीमिया बीमारी है। जब यह किताब तुम्हारे हाथ लगे, मैं शायद इस दुनिया में न रहूं। यहां से यह किताब शुरू होती है- 'वेज टू लिव फॉर एवर'। इसे सली निकोलस ने लिखा है। उनके जीवन का प्रेरक तत्व है कि हर क्षण महत्वपूर्ण है। यह पुस्तक ऐसे लोगों की जिंदगी में उम्मीद की रोशनी जगाती है, जिन्हें सब लोग हाशिए पर खड़ा कर चुके हैं। इस जबरदस्त कृति की युवा लेखिका ने दर्शन और साहित्य की डिग्री लेने के बाद बच्चों के लिए क्या और कैसे लिखा जाए को अपने अध्ययन का केंद्र बनाया। यह रचना उन्होंने 23 बरस की उम्र में लिख डाली। इस संघर्षगाथा का अंत भी उतना ही मार्मिक है।
'मेरा अंतिम संस्कार मजेदार होना चाहए। कृपया इस मौके पर काले कपड़े पहनकर मत आएं और मेरे बारे में हंसी मजाक वाले किस्से ही सुनाएं। करुण कथाएं नहीं।'
'हर कोई यह किताब पढ़ सकता है। यह कोई रहस्य नहीं है। मेरे बाद मेरी चीजें बांट देना। चाहो तो कुछ तुम रख सकते हो, पर सारी मत ले लेना। ऐला से कहना वो मेरा बेडरूम ले सकती है। वह उसके कमरे से बड़ा है। वो मेरी साइकिल और कंप्यूटर पर खेलने वाला प्ले-स्टेशन भी ले सकती है। आप को मेरे बारे में ज्यादा उदास होने की जरूरत नहीं है। हां थोड़ी-बहुत उदासी चलेगी। अगर आप मुझे लेकर हमेशा दुखी रहेंगे, तो मुझे याद कैसे रखेंगे?'
इस किताब को पहली बार ‘आर्थर ए लिविन बुक्स’ ने छापा था।
इसकी सबसे बड़ी खासियत कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब किसी के पास नहीं है। मसलन क्या मृत्यु एक दुखदायी अनुभव है। इसका जवाब जानने वाला तो जीवित होता नहीं है। ईश्वर बच्चों को बीमार क्यों करता है? मृत्यु इस पुस्तक के केंद्र में है। लोग अक्सर इसके बारे में बात करने से कतराते हैं। आखिर मृत्यु है क्या? हिंदू धर्म में तो इसे लेकर अच्छा खासा दर्शन है। आदमी नहीं मरता। उसका शरीर मर जाता है, पर आत्मा जीवित रहती है। वह पुनः किसी अन्य शरीर में प्रवेश कर जाती है। इस बारे में 'डाबाई पापादातोस' और 'कोस्तास पापादातोस' ने 'बच्चे और मृत्यु' में लिखा है-जब कोई मरता है तो उसका मतलब होता है कि उसके शरीर ने काम करना बंद कर दिया। दिल धड़कना बंद हो गया है। अब उन्हें खाने और सोने की जरूरत नहीं होती। उन्हें कोई दर्द भी नहीं सताता। उन्हें शरीर की भी जरूरत नहीं पड़ती। एक तरह से अच्छा ही है, क्योंकि अब उन्हें कोई काम नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि मर जाने के बाद शरीर नहीं रहता। वे दिखाई भी नहीं देते, जैसे कि पहले चलते-फिरते नजर आते थे।
हालांकि यह उपन्यास मृत्यु के इर्द-गिर्द बुना गया है, पर इसमें हास्य का पुट भी है। जैसे कि 18वीं और 19वीं शताब्दी में लोगों को यह डर अक्सर सताता था कि कहीं उन्हें गलती से जिंदा न दफना दिया जाए। इस गुत्थी को सुलझाने के लिए वैज्ञानिकों ने ऐसे ताबूतों की खोज कर डाली, जिनमें हवा जाने की गुंजाइश थी। और इसमें लिटाई गई जिंदा लाश चीख-पुकार कर लोगों को बुला सकती थी। 1822 में डॉ. एडोल्फ गुटस्मुथ ने हवा के लिए छेदों और खाने के लिए एक ट्यूब का प्रावधान कर दिया। इसके बाद वे खुद इसमें लेट गए। वहां उन्होंने लेटे-लेटे सूप पिया, बीयर गटकी और खाना खाया। बाद में उनके सहायकों ने उन्हें बाहर निकाला। इस कथानक को पढ़ते समय लगा कि यह बाल साहित्य है। पर खत्म होते-होते एहसास होता है कि इसमें गहरा दर्शन है। देखिए आप मरने के बाद कहां जाते हैं?
-शायद आप भूत बन जाएं। वैसे भूत का अर्थ होता है जो बीत गया। जैसे भूतकाल माने, गुजरा जमाना। इतिहास भी भूतकाल की घटनाओं और चरित्रों का वर्णन करता है। हम भूत को आत्मा के संदर्भ से भी जोड़ते हैं। कहा जाता है कि भूत जिंदा लोगों को सताता है, वह सपनों में आता है। लेकिन केवल अंधेरे में। पता नहीं उजाले से क्यों डरता है?
आपका मरने के बाद पुनर्जन्म भी हो सकता है। अनेक बच्चों को अपना पिछला जन्म याद आ गया और वह अपने मां-बाप को वहां ले गए। ऐसे कहा-सुना जाता है। इस नायक की इच्छा है कि वह अगले जन्म में भेड़िया या फिर किसी दूसरे लोक का वासी हो।
कुल मिलाकर यह कथा मृत्यु की ओर बढ़ रहे बालक की जीने की बलवती इच्छा को व्यक्त करती है। ऐसी इच्छा सामान्य लोगों में अक्सर सुप्त रहती है। वह जीवन की आपाधापी में ऐसे सवालों से उलझ नहीं पाते।
वेज टू लिव फॉर एवर
सली निकोलस
प्रकाशक-आर्थर ए लिविन बुक्स
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, मीडिया विश्लेषक और संस्कृतिकर्मी हैं।)