फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Way of power comes from student union

छात्रसंघों से निकलता है सत्ता का रास्ता

Fri, 09 Sep 2016 08:12 PM IST
प्रदीप सरदाना
प्रदीप सरदाना Updated Fri, 09 Sep 2016 08:12 PM IST
विज्ञापन
Way of power comes from student union
प्रदीप सरदाना

कहने को तो छात्रसंघ चुनाव किसी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय का एक छोटा-सा चुनाव है। पर इन्हीं छात्रसंघों से निकलने वाले नेता देश के सर्वोच्च पद तक पहुंच चुके हैं। जब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष रहे डॉ. जाकिर हुसैन 1962 में उपराष्ट्रपति और 1967 में राष्ट्रपति बने, तभी पहली बार छात्रसंघों की अहमियत का अंदाज राजनीतिक दलों को हो गया था। तभी राजनीतिक दलों ने अपने छात्र संगठनों को अलग स्वरूप देने का सिलसिला और तेज कर दिया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र नेता रहे हेमवती नंदन बहुगुणा ने जून, 1970 में भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन का विधिवत गठन कर दिया और विभिन्न छात्र संघों से निकले नेताओं की 11 सदस्यीय समिति बनाकर इसे अखिल भारतीय स्वरूप दिया। उस समिति में हेमवती नंदन बहुगुणा के अतिरिक्त प्रियरंजन दासमुंशी, हरचरण सिंह जोश, केजी विश्वनाथन, सुब्रत मुखर्जी और अशोक निगम जैसे व्यक्ति शामिल थे। अप्रैल,1971 से एनएसयूआई पूरी तरह अस्तित्व में आई।

विज्ञापन


इलाहाबाद छात्रसंघ से निकले बहुगुणा कुछ समय बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। जबकि वहीं से अपना राजनीतिक जीवन शुरू करने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। नरसिंह राव भी नागपुर विश्वविद्यालय की देन हैं। अलीगढ़ ने भारत को ही नहीं, पाकिस्तान को भी कई शीर्ष नेता दिए हैं, जिनमें मौलाना आजाद, शेख अब्दुल्ला, मोहसिना किदवई, बेगम आबिदा, खुर्शीद आलम खान और आरिफ मोहम्मद खान के साथ पाकिस्तान के राष्ट्रपति रह चुके अयूब खान तक हैं।
विज्ञापन


विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्रसंघों से निकलकर राजनीति में अहम पद पाने वालों में नुरूल हसन, वसंत साठे, विद्याचरण शुक्ल, नारायण दत्त तिवारी, जनेश्वर मिश्र, प्रफुल कुमार महंत, लालू यादव, सुशील कुमार मोदी, नितिन गडकरी, रविशंकर प्रसाद, सीताराम येचुरी, प्रकाश करात और मुकुल वासनिक तक नामों की एक लंबी सूची है। वित्त मंत्री अरुण जेटली दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे थे, तो विदेश मंत्री सुषमा स्वराज अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की नेता थीं। मौजूदा खेल मंत्री विजय गोयल सहित अजय माकन, अरविंदर लवली, वीरेश प्रताप चौधरी, अलका लांबा, रागिनी नायक, विजय जॉली, सुधांशु मित्तल, सुभाष चोपड़ा, नूपुर शर्मा और नकुल भारद्वाज जैसे लोग छात्रसंघ से होकर ही राजनीतिक मंजिल तक पहुंचे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


छात्रसंघों की लगातार बढ़ रही शक्ति के बावजूद कुछ सवाल तभी से उठते रहे हैं, जब पहली बार 1904 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में छात्रसंघ की स्थापना हुई थी। ये सवाल हैं-क्या छात्रों को अध्ययनकाल में राजनीति में उतरना चाहिए? क्या छात्रसंघों को राजनीतिक दलों की ऐसी कर्मशाला बनने देना चाहिए, जहां वे अपने राजनीतिक मंसूबा पूरा करने की खातिर छात्रों को राजनीति के दलदल में उतार दें! यही सवाल मैंने वर्षों पहले हेमवती नंदन बहुगुणा से पूछे थे, तो उनका जवाब था, 'छात्रसंघ राजनीति की नर्सरी हैं, इसलिए छात्रों का पढ़ाई के दौरान राजनीति में आना गलत नहीं। पर जब छात्रसंघ इतने सशक्त होकर उभर रहे हैं, तो इसमें भी तीन ‘एम’ मशीनरी, माफिया और मनी आ गए हैं, जिससे आम चुनावों की कुरूपता छात्रसंघ चुनावों में भी आ गई है। यह तभी दूर हो सकती है, जब देश की राजनीति सही, स्वच्छ और स्पष्ट हो।' पर क्या ऐसा हो पाएगा!

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed