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चुनौती : राजनीतिक विमर्श से बाहर है जल संकट, कागज पर बनी योजनाएं 'बह' जाती हैं जमीन पर
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जल संकट (सांकेतिक तस्वीर)।
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अमर उजाला
विस्तार
भारत में उच्च स्वरों में बयानबाजी राजनीतिक विमर्श को परिभाषित करती है। इस हफ्ते मुकाबला इस बात को लेकर था कि देश में लोकतंत्र जिंदा है या मर गया है, जिसको लेकर दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात समझाने-बुझाने में लगे रहे। वजह विपक्षी सांसदों के माइक को म्यूट करना है। संसदीय सत्र को दलगत चुनावी राजनीति ने अपहृत कर लिया है। त्रासद विडंबना यह है कि राजनीति ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को उन मुद्दों से भटका दिया है, जो भारत के लोगों के लिए मायने रखते हैं।
तथ्य यह है कि भारत भीषण जल संकट का सामना कर रहा है। इस वर्ष मानसून को अल नीनो चक्र प्रभावित करने वाला है। पानी की जरूरत और उपलब्धता के बीच अंतर निरंतर बढ़ता जा रहा है। चिंता की बात यह है कि विशेषज्ञ भविष्यवाणी कर रहे हैं कि जल संकट और गंभीर होगा। पिछले हफ्ते जारी विश्व जल विकास रिपोर्ट, 2023 बताती है कि दुनिया भर के शहरों में रहने वाले 2.4 अरब लोगों को भारी जल संकट का सामना करना पड़ रहा है और वर्ष 2050 तक 'भारत सबसे गंभीर रूप से प्रभावित देश होगा।'
खतरे की घंटी बज चुकी है। पिछले महीने विश्व बैंक ने बताया कि 'गर्मी के आते ही पानी भारत में सोने की तरह कीमती वस्तु बन जाता है।' दुनिया की 18 फीसदी आबादी और मात्र चार फीसदी जल संसाधनों के साथ भारत दुनिया में सबसे अधिक जल संकट वाले देशों में से एक है। इस हफ्ते संसद को सूचित किया गया कि प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 2031 तक 1,486 क्यूबिक मीटर से घटकर 1,367 क्यूबिक मीटर रह जाएगी।
हालांकि सरकार की 'हर घर जल' योजना से प्रगति हुई है-अगस्त, 2019 से 8.2 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल से जल प्रदान किए गए हैं, लेकिन यह अंतर इतना बड़ा है कि दस में से चार घरों में अभी तक नल के कनेक्शन नहीं जुड़े हैं। मार्च, 2023 तक के संसद के रिकॉर्ड बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में 69 फीसदी, झारखंड में 67 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 66 फीसदी, छत्तीसगढ़ में 60 फीसदी और राजस्थान में 63 फीसदी घरों में नल के कनेक्शन नहीं हैं।
मेरी पुस्तक द गेटेड रिपब्लिक में वर्णित संकटों की सूची में जल संकट सबसे ऊपर है। लगभग हर बड़े शहर और कस्बे में जल संकट का नजारा देखा जा सकता है। हर महानगर पानी के लिए लंबी दूरी के समाधान पर निर्भर है—मुंबई तानसा और वैतरणा बांधों के पानी पर निर्भर है, दिल्ली उत्तर प्रदेश, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के पानी पर निर्भर है।
शहरी भारत पेयजल के लिए डिब्बाबंद पानी और टैंकरों पर निर्भर है। पिछले महीने, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पास एक अनूठा काम था : 2,000 टैंकरों के माध्यम से मुंबई में पानी की आपूर्ति करने वाले निजी संचालकों की हड़ताल समाप्त करना। पानी के टैंकरों की हड़तालें मुंबई के लिए अद्वितीय नहीं हैं और ऐसी घटनाएं नियमित रूप से चेन्नई, बंगलूरू, दिल्ली और अन्य जगहों पर देखी गई हैं।
टैंकर से पानी की आपूर्ति भू-जल पर निर्भर है। जल संसाधनों पर संसद की स्थायी समिति ने अपनी तजा रिपोर्ट में खुलासा किया है कि 'भू-जल भारत के ग्रामीण पेयजल का 80 प्रतिशत, शहरी पेयजल का 50 प्रतिशत और सिंचाई की जरूरतों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा प्रदान करता है। पिछले चार दशकों में, सिंचाई में कुल वृद्धि का लगभग 84 प्रतिशत भू-जल से आया है।' यह रिपोर्ट रेखांकित करती है कि 'भावी पीढ़ियों के भोजन और पानी की सुरक्षा के लिए भू-जल की उपलब्धता महत्वपूर्ण है।'
केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक, भू-जल दोहन का 89 प्रतिशत सिंचाई के लिए और शेष घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग के लिए होता है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में भू-जल दोहन 100 प्रतिशत से अधिक हो गया है। पानी के अधिक दोहन को रोकने के लिए भारत को अपने फसल मानचित्र में सुधार की आवश्यकता है-यानी धान और गन्ने जैसी फसलों की खेती पानी की कमी वाले क्षेत्रों से बाहर होनी चाहिए।
सरकार ने कई योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर सरकारी मंशा आवंटन से मेल नहीं खाती और इससे भी बदतर है उनका कार्यान्वयन। प्रति बूंद अधिक फसल योजना वर्ष 2015-16 में आई थी। कृषि संबंधी स्थायी समिति ने खुलासा किया कि अब तक केवल 69.55 लाख हेक्टेयर भूमि को सूक्ष्म सिंचाई के तहत कवर किया गया है। जल संरक्षण के विचारों और कार्यक्रमों के प्रचार की आवश्यकता है।
प्रौद्योगिकी का उपयोग करने पर स्मार्ट कृषि में पानी की कमी को घटाया और जलवायु लचीलापन बढ़ाया जा सकता है, लेकिन अनुसंधान के लिए बजट कृषि-जीडीपी का मात्र 0.49 फीसदी है, जो दक्षिण अफ्रीकी के 2.8 फीसदी और ब्राजील के 1.8 फीसदी की तुलना में काफी कम है। उम्मीद है कि कृषि-स्टार्ट-अप इस खाई को पाट देंगे। इसके अलावा, पानी राज्य का विषय है और नीति का निष्पादन छह विभागों और विभिन्न समितियों से होकर गुजरता है। योजनाओं की सफलता सक्रिय केंद्र-राज्य सहयोग पर टिकी हुई है। जुलाई, 2015 में सरकार ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) के तहत 'हर खेत को पानी' योजना शुरू की। ग्रामीण विकास पर स्थायी समिति की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2022–23 में पीएमकेएसवाई का आवंटन 1,697 करोड़ रुपये से घटाकर 869 करोड़ रुपये कर दिया गया, जिनमें से जनवरी, 2023 तक केवल 414 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए। इसका कारण यही है कि 'अधिकांश राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में परियोजनाएं प्रारंभिक चरणों में हैं।'
मुद्दा सिर्फ खेती में पानी के उपयोग का नहीं है, बल्कि यह भी है कि भारत पानी के उपयोग को कैसे सुधारता है। भारत मुश्किल से एक तिहाई वर्षा के पानी का उपयोग कर पाता है। वर्षा पूरे देश में मात्र चार-पांच महीनों के लिए होती है, जबकि पानी की जरूरत बारहों महीने होती है। नदियों को आपस में जोड़ने का भव्य विचार अभी तक राजनीति और अर्थशास्त्र की चुनौतियों में फंसा है।
वैश्विक स्तर पर पानी के मोर्चे पर सफलता की कहानियां भरी पड़ी हैं। कई देश जल पुनर्नवीनीकरण के लिए प्रौद्योगिकियों का लाभ उठा रहे हैं। सिंगापुर की जरूरतों का 40 फीसदी से अधिक पुनर्नवीकृत पानी से पूरा होता है। भारत पानी की कमी और बर्बादी को बर्दाश्त नहीं कर सकता। पानी की सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।