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संकट: दर्द का दरिया न बन जाए डल झील, बीमारियों से जूझ रही स्थानीय आबादी; राजस्व से भी जुड़ा है यह सवाल

Sat, 25 May 2024 04:54 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Sat, 25 May 2024 04:54 AM IST
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सार
श्रीनगर की कुल आय का 16 प्रतिशत इसी झील से आता है और यहां के 46 फीसदी लोगों के घर का चूल्हा इसी झील से हुई कमाई से जलता है।
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Water Crisis Dal Lake Pollution Alarming Disease Serious concern in Jammu Kashmir
डल झील (फाइल) - फोटो : एएनआई

विस्तार

हाल में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कश्मीर में डल झील की ‘बिगड़ती स्थिति' पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जम्मू-कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण समिति सहित कई प्राधिकारों से जवाब मांगा है। एनजीटी ने कहा कि एक समय लोग इस झील का पानी पीते थे, लेकिन आज इसका उपयोग मुंह धोने के लिए भी नहीं कर सकते। इसरो द्वारा खींचे गए सैटेलाइट चित्रों के सहयोग से अमेरिकी संस्था 'अर्थ ऑब्जर्वेटरी इमेज' भी कह चुकी है कि वर्ष 1980 से 2018 के बीच श्रीनगर का ‘अस्तित्व’ कही जाने वाली डल झील का आकार 25 फीसदी घट गया। अदालती दखल, सरकारी कोशिशों व स्थानीय दबाव के बावजूद डल झील मजबूर है मौन अतिक्रमण सहने और घरेलू गंदगी को खपाने के लिए।



श्रीनगर की कुल आय का 16 प्रतिशत इसी झील से आता है। यहां के 46 फीसदी लोगों के घर का चूल्हा इसी झील से हुई कमाई से जलता है। तैरते हुए बगीचे झील के मुख्य आकर्षण हैं। कमल और कुमुदनी के फूल नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत करते हैं। यह झील लाखों जलचरों, परिंदों का भी घरोंदा हुआ करती थी। अपने जीवन की थकान, हताशा और एकाकीपन को दूर करने के लिए देश-दुनिया के लाखों पर्यटक इसका दीदार करने आते थे। अब यह बदबूदार नाबदान व शहर के लिए मौत के जीवाणु पैदा करने का जरिया बन गई है।


पिछले महीने ही जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका के दबाव में सरकार ने एक हजार पन्ने के दस्तावेज में एक योजना पेश की। बीते अनुभव बताते हैं कि अदालत में पेश योजना जब महकमों के पास साकार होने आती है, तो कागजों के अलावा कहीं सुधार नहीं होता। एक अनुमान के अनुसार, अब तक इस झील को बचाने के नाम पर एक हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। असल में इसे बचाने की ज्यादातर योजनाएं दिखावटी होती हैं, जैसे एलईडी लाइट लगाना, रैलिंग लगाना, फुटपाथ को नया बनाना आदि। इन सबसे इस अनूठी जलनिधि के नैसर्गिक स्वरूप को बनाए रखने की दिशा में कोई लाभ नहीं होता, बल्कि ऐसे निर्माणों का मलबा झील को नुकसान ही पहुंचाता है।

वर्ष 1976 में सरकार ने पहली बार झील की स्थिति  पर विचार किया। 1978 में झील व उसके आसपास किसी भी तरह के निर्माण पर रोक लगाई गई, लेकिन बीते 45 वर्षों में इस पर कभी अमल होता नहीं दिखा है। आज एक लाख से ज्यादा झोपड़ी झील क्षेत्र में बसी हैं। जब भी कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने, हाउस बोट को दूसरी जगह ले जाने के आदेश दिए, तो सियासी दबाव में उन पर अमल नहीं हुआ। जब तक स्थानीय लोगों की भागीदारी और सहमति नहीं होगी, डल झील को दर्द का दरिया बनने से नहीं रोका जा सकता।

झील का सबसे बड़ा दुश्मन अतिक्रमण है। आसपास की बस्तियों और शिकारों से निकलने वाला मल-मूत्र सीधे इसमें गिरने से इसके पानी की गुणवत्ता खराब हुई है। लोग चोरी-छिपे इसमें कूड़ा भी फेंकते हैं। तीन तरफ पहाड़ियों से घिरी डल झील में चार जलाशयों का पानी आकर मिलता है। झील में सफाई होती भी है, तो इन चार जलाशयों का प्रदूषित पानी इसे और गंदा कर देता है। डल झील के बड़े हिस्से में वनस्पतियां उग आई हैं, जिससे सूर्य की किरणें गहराई तक नहीं जा पातीं। इससे पानी में ऑक्सीजन की कमी होती और बदबू आने लगती है। ज्यादा कमाई के लोभ में होती निरंकुश खेती के चलते रासायनिक खाद व कीटनाशकों ने पानी को जहरीला बना दिया है।

सरकारी रिकॉर्ड गवाह है कि सन 1200 में इस झील का फैलाव 75 वर्ग किलोमीटर में था। लेकिन अब इसमें जल का फैलाव मुश्किल से आठ वर्ग किलोमीटर में सिमट गया है। झील गाद से पटी हुई है। पानी का रंग लाल-गंदला है और काई की परतें हैं। इसका पानी मनुष्यों के इस्तेमाल के लिए खतरनाक घोषित हो चुका है। बढ़ते वैश्विक तापमान से भी डल झील अछूती नहीं है। डल का सिकुड़ना ऐसे ही जारी रहा, तो इसका अस्तित्व बमुश्किल 350 साल बचा है। यह बात रुड़की यूनिवर्सिटी के वैकल्पिक जल-ऊर्जा केंद्र द्वारा तैयार प्रोजेक्ट रिपोर्ट में कही गई है। श्रीनगर शहर के पास न तो क्षमताओं के अनुरूप सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट है, न ही शहर के बड़े होटल इस बारे में कोई कदम उठाते हैं। इसका खामियाजा वहीं के लोग भुगत रहे हैं। झील के पास की बस्तियों में शायद ही ऐसा कोई घर हो, जहां गेस्ट्रोइंटाटीस, पेचिस, पीलिया जैसे रोगों से पीड़ित न हो।

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