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जंक फूड से जंग

Thu, 29 May 2014 07:03 PM IST
मिशेल ओबामा
मिशेल ओबामा Updated Thu, 29 May 2014 07:03 PM IST
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War with junk food

चार साल पहले हमने जब 'आओ, आगे बढ़ें' अभियान शुरू किया था, तब एक सामान्य, लेकिन महत्वाकांक्षी लक्ष्य सामने रखा था-वह बच्चों में व्याप्त मोटापे की महामारी को खत्म करने का उद्देश्य था, ताकि अगली पीढ़ी के बच्चे स्वस्थ हों। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमने वैज्ञानिक तरीका अपनाया, जिसका कि असर हो। शोध बताते हैं कि बच्चों की खुराक में चीनी, नमक और वसा कम होना चाहिए। ऐसे में हमने स्कूलों में भोजन का मैन्यू उसी के अनुरूप बदला। आंकड़े बताते हैं कि आसपास पंसारी की दुकान न होने का लोगों के खाने-पीने की आदतों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। यह देखते हुए अनेक जगहों पर ज्यादा से ज्यादा ऐसी दुकानों की व्यवस्था की गई, जिनमें ताजा खाद्य पदार्थ मिलते हों। बच्चों में स्वस्थ आदत डालने की प्रक्रिया के तहत उनके पालन-पोषण के केंद्रों में स्वास्थ्यवर्धक भोजन के साथ शारीरिक क्रियाकलापों पर जोर दिया गया।

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इन्हीं का नतीजा है कि आज हम आशा की किरणें देख पा रहे हैं। स्कूलों में करोड़ों बच्चे पोषक भोजन पा रहे हैं; परिवार के लोग खाने-पीने की चीजें खरीदने और पकाने में ज्यादा सजगता का परिचय दे रहे हैं; स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों की बढ़ती मांग से निपटने के लिए कंपनियां तत्पर हैं और हमारे छोटे बच्चों में मोटापे की प्रवृत्ति कम होने लगी है। इससे साफ है कि वैज्ञानिक तरीका अपनाकर हम बच्चों में मोटापे की प्रवृत्ति से छुटकारा पा सकते हैं।
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बच्चों के मोटापे के मोर्चे पर हमने जो सफलता हासिल की है, दुर्भाग्य से अब कांग्रेस उस पर पानी फेरने की कोशिश कर रही है। महिलाओं, शिशुओं और बच्चों के पोषण से जुड़े कार्यक्रम, डब्ल्यूआईसी, का ही उदाहरण लीजिए। यह एक संघीय कार्यक्रम है, जिसका लक्ष्य कम आय वाली महिलाओं, उनके शिशुओं और बच्चों को पूरक पोषाहार मुहैया करना है-उन्हें उन ताजा खाद्य पदार्थों की खरीद में मदद करना है, जिन्हें वे अपने पैसे से नहीं खरीद सकतीं। लेकिन अब प्रतिनिधि सभा एक विधेयक लाने के बारे में सोच रही है, जिसमें ऐसी महिलाओं को मदद देने वाले खाद्य पदार्थों में आलू को शामिल करने की योजना है। नहीं, आलू में कोई खराबी नहीं है। समस्या यह है कि अनेक कम आय वर्ग के बच्चे और औरतें आलू का पर्याप्त सेवन करती हैं, पर पोषण से भरपूर फल और सब्जियां नहीं खरीद पातीं। डब्ल्यूआईसी का मानक तय करने वाले इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन ने इसी वजह से साफ कहा है कि आलू को डब्ल्यूआईसी के कार्यक्रम में कतई शामिल नहीं करना चाहिए।
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दुर्भाग्य से, यह ऐसा अकेला मामला नहीं है। हमारे स्कूल लंच प्रोग्राम के साथ भी यही हो रहा है। वर्ष 2010 में कांग्रेस ने हेल्दी-हंगर फ्री किड्स ऐक्ट पारित किया, जिसके तहत स्कूली भोजन में पर्याप्त पोषक तत्वों का प्रावधान है। इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन ने इसकी सिफारिश की थी। आज नब्बे फीसदी स्कूलों की रिपोर्ट बताती है कि वे इस मानक का पालन कर रहे हैं। नतीजतन अब बच्चों को ज्यादा फल-सब्जियां, साबुत अनाज और वे दूसरे खाद्य पदार्थ मिल रहे हैं, जो स्वस्थ रहने के लिए जरूरी हैं। यह उन अभिभावकों के लिए बहुत बड़ी राहत की तरह है, जो घर में तो बच्चों को स्वस्थ भोजन देते हैं और चाहते हैं कि स्कूलों में उन्हें जंक फूड खाने को न मिलें। और यह हम सबके लिए बड़ी जीत है, क्योंकि हम स्कूल लंच में सालाना 10 अरब डॉलर से भी अधिक खर्च करते हैं। ऐसे में, बच्चों को जंक फूड देने का मतलब करदाताओं की गाढ़ी कमाई को यों ही जाया करना होगा।

लेकिन प्रतिनिधि सभा के कुछ सदस्य अब इस कानून को वापस लेने और स्कूली भोजन का स्तर घटाने की धमकी दे रहे हैं। वे चाहते हैं कि स्कूलों में बच्चों के भोजन में फल और सब्जियां देने के प्रावधान को अनिवार्य के बजाय ऐच्छिक बना दिया जाए। वे यह भी चाहते हैं कि बच्चों के स्कूली भोजन में सोडियम का हिस्सा ज्यादा और साबुत अनाज का भाग कम किया जाए। संसद की कार्य विनियोजन समिति जल्दी ही इस पर विचार करेगी।

क्या आपको याद है कि कुछ साल पहले कांग्रेस ने कहा था कि स्कूल लंच में पिज्जा के एक टुकड़े पर लगे सॉस को सब्जी माना जाएगा? यह बताने के लिए आपको पोषाहार विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं है कि ऐसे कदम बेमतलब हैं। इसके बावजूद स्कूली भोजन में पोषाहार का मानक घटाने की कवायद चल रही है।

हमारे बच्चे इससे बेहतर के हकदार हैं। हकीकत यह है कि इतनी तरक्की कर चुकने के बावजूद हमारे देश में हर तीन में से एक बच्चा मोटा है। हर तीन में से एक बच्चे को भविष्य में डायबिटीज होने की आशंका है। यह केवल हमारे बच्चों के स्वास्थ्य की ही बात नहीं है, हमारी अर्थव्यवस्था के सेहत की भी हकीकत है। हम पहले ही मधुमेह से जुड़ी स्थितियों के इलाज में सालाना 190 अरब डॉलर खर्च कर चुके हैं। अगर हमने अभी इस समस्या के समाधान के बारे में नहीं सोचा, तो भविष्य की भयावह स्थिति की कल्पना ही की जा सकती है।


जाहिर है, अभिभावक के तौर पर हमें अपने बच्चों के हितों को सबसे ऊपर रखना होगा। सुबह उठने के बाद और रात को सोने जाने से पहले हम अपने बच्चों की बेहतरी के बारे में ही सोचते हैं। और अपने बच्चों की सेहत के बारे में फैसला लेते हुए हम उन डॉक्टरों और विशेषज्ञों पर भरोसा करते हैं, जो हमें वैज्ञानिक आधार पर सटीक सलाह देते हैं। वाशिंगटन स्थित हमारे नेताओं को भी बच्चों के स्वास्थ्य के बारे में इसी तरह सोचना चाहिए।

(लेखिका अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी हैं)

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