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2025 में उथल-पुथल: थमते-चलते युद्ध, सवाल और यह गुजरता साल

Fri, 19 Dec 2025 07:27 AM IST
SPrasannarajan प्रसन्नराजन एस प्रसन्नराजन
Updated Fri, 19 Dec 2025 07:27 AM IST
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सार
जबरन खत्म किए गए गाजा युद्ध और निर्बाध यूक्रेन युद्ध के बीच फंसा 2025 का अंत बताता है कि विचारधाराओं की लड़ाई में नैतिक सहमति पाना कितना मुश्किल है। जाते हुए साल में दिल्ली व बीजिंग के राष्ट्रीय संकल्प की सच्चाई ने टैरिफ योद्धा ट्रंप को उनकी ताकत की सीमाएं भी दिखाईं।
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War, questions, and this passing year
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

शायद सिर्फ पत्रकार ही नए साल में कदम रखने से पहले पीछे मुड़कर देखते हैं, जैसे कि बीते हुए मुश्किल दिनों का निचोड़ भविष्य के लिए उन्हें कोई दिशा-निर्देश देता हो। अगर हम उम्मीद के साथ अतीत से मिला कोई नैतिक सबक जोड़ दें, तो वह ज्यादा ठोस लगती है। तो अब, जबकि हम नए वर्ष की दहलीज पर खड़े हैं, तो पीछे मुड़कर क्या देखते हैं?


युद्ध व जर्जर दुनिया के लिए, सबसे सुकून देने वाली तस्वीर गाजा की हो सकती है, जहां भूखे और बेसहारा लोग कैमरे की तरफ न देख रहे हों, एक ऐसा बचपन, जो नफरत से बर्बाद न हुआ हो, और जो यह याद दिलाए कि आखिर में दूसरों की नफरत की सबसे बड़ी कीमत कौन चुकाता है। इस जंग की शुरुआत सात अक्तूबर, 2023 के नरसंहार से हुई, जब हमास के आतंकियों ने इस्राइल पर हमला किया। युद्ध और प्रतिरोध की पौराणिक कहानियों में, असली पीड़ित वे गुमनाम लोग होते हैं, जिन्होंने कभी शहादत नहीं मांगी या जो कभी विवादित इतिहास के नजरिये से न्याय को परिभाषित नहीं कर पाए।


गाजा ने स्थायी युद्ध की नियति इसलिए नहीं खोई, क्योंकि लंदन की सड़कों से लेकर अमेरिका के शैक्षणिक परिसरों तक गूंजने वाले ‘नदी से लेकर समुद्र तक, फलस्तीन आजाद होगा’ जैसे नारों ने इस्राइल के जमीर को झकझोरा। इसका एक प्रमुख पात्र एक ऐसा अमेरिकी राष्ट्रपति भी रहा, जो अपने पूर्ववर्ती वुडरो विल्सन द्वारा सम्मानित नैतिक साम्राज्य के आदर्श में नहीं, बल्कि सौदेबाजी की कला में विश्वास करता है। हमास के नेतृत्व के सुनियोजित खात्मे और उसके समर्थकों को बेअसर करने के बाद उसके पास कुछ नहीं बचा था। उसके पास सिर्फ जिंदा बचे इस्राइली बंधक और मरे हुए लोगों को संभालने की चुनौती थी-और कमान में बचे आखिरी आदमी को खोने का डर था। इसके बावजूद अपनी पराजय में भी हमास को जीत की उम्मीद दिख रही थी। यह निश्चित रूप से एक इस्लामिक साम्राज्य के लिए दूर की कौड़ी नहीं थी, बल्कि एक ऐसा प्रोजेक्ट था, जिसे 9/11 और लेवांत में खून-खराबे के बाद गति मिली थी। हालांकि, ऐसा होने वाला नहीं था; आखिर अयातुल्ला और ओसामा के भूत भी, भले ही वे इस्लामिक विभाजन के विपरीत कोनों पर खड़े थे, उस कल्पना को पूरा नहीं कर पाए थे।

समझने वाली बात यह है कि हमास ने भी अपने संघर्ष को फलस्तीन से ज्यादा इस्लामी बना दिया था, और उसकी सोच में, खोई हुई जमीन की राष्ट्रवाद की भावना की जगह पवित्र जमीन के लिए धार्मिक घोषणापत्र ने ले ली थी। हमास ने वास्तव में जो हासिल किया, वे थीं सुर्खियां और तस्वीरें-और दुनिया भर में फैला एकजुटता का आंदोलन। उन्होंने इन्सानी जिंदगी की परवाह न करने वाला संगठन होने के बावजूद अवधारणा की लड़ाई जीत ली।

इस्राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू लड़ाई जारी रख सकते थे, लेकिन उससे हमास के दुष्प्रचार को और बढ़ावा मिलता। इस बीच इतिहास और नॉर्वेजियन कमेटी से मान्यता की उम्मीद रखने वाला सौदेबाज (ट्रंप) आगे आया। उसने नेतन्याहू को एक ऐसे युद्ध से वंचित कर दिया, जो उनके राजनीतिक भविष्य की रक्षा करता। इसके बावजूद, ट्रंप को शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं मिला।
यूक्रेन में चल रही दूसरी जंग का भी आसानी से खत्म होना मुश्किल है। यह भी एक असमान लड़ाई है, लेकिन कमजोर पक्ष हार नहीं मानेगा, और सौदेबाज, जो स्वभाव से ताकत का प्रशंसक है, युद्ध भड़काने वाले को शांति की मेज पर लाने के लिए मजबूर नहीं करेगा। यूक्रेन को सताने वाले को पक्का यकीन है कि पश्चिम अपरिवर्तनीय सांस्कृतिक पतन से गुजर रहा है।

स्टालिनवादी सोच वाले रूसी और उससे प्रभावित अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच खड़ा वह छोटा-सा आदमी (जेलेंस्की) है, जो अपना घर या अपना गौरव नहीं छोड़ेगा। और 2025 के अंत में, घर का विचार, जो एक जबरन खत्म किए गए युद्ध और एक निर्बाध युद्ध के बीच फंसा हुआ था, उसने एक ऐसी दुनिया में नैतिक सहमति की अव्यवहार्यता का सबक दिया, जहां पुरानी पहचान और गलत समझी गई विचारधाराएं हमारे फैसलों पर हावी हो जाती हैं।

जहां एक तरफ पुतिन उस चीज से बेअसर रहे, जिसे वह और उनके साथी उदारवादी भावुकता कहकर खारिज कर देते, वहीं ट्रंप अपने राजनीतिक कद से छोटे दिखे। ‘सब कुछ मानो या छोड़ दो’, वाले शांतिदूत को अपने तरीकों की सीमाएं समझ आ गई हैं। फिर बचे व्यापार योद्धा ट्रंप। उन्हें भी अपनी शाही शक्तियों की सीमाओं का एहसास हुआ, जब उन्होंने चापलूसों और आसानी से मान जाने वालों से अलग दिल्ली और बीजिंग जैसी जगहों पर राष्ट्रीय संकल्प की सच्चाई देखी।

भारत के लिए यह एक स्वाभाविक सहयोगी को खुश रखने और एक दबंग के सामने बिना झुके खड़े रहने के बीच चुनाव था। उसने दूसरा रास्ता चुना। और शी जिनपिंग के चीन के नजरिये से यह हमेशा के तानाशाह के लिए अपना दायरा बढ़ाने का एक मौका था। ट्रंप ने जितनी भी लड़ाइयां लड़ीं और देश व विदेश में जितनी लड़ाइयों को रोकने की कोशिश की, उसके बाद वह कमजोर दिखे और अमेरिका भी ज्यादा महान नहीं दिखा। वह अकेले नहीं थे। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा चुना हुआ नेता था, जो पराजय का हकदार न हो। वे उस जनादेश को संभालने में तेजी से नाकाम हो रहे थे, जो उन्होंने जीता था, जैसा कि लंदन और पेरिस में हुआ, या उन समाजों में जो नाराजगी को समझने में नाकाम थे।

2025 के उत्तरार्ध तक, पश्चिमी लोकतंत्र शायद विचारधाराओं के जाने-पहचाने तरीकों से परे किसी नेतृत्व की तलाश कर रहे होंगे। लेकिन भारत एक अलग कहानी बताता है, जिसे उन लोगों ने पूरी तरह से नहीं समझा है, जो अब भी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को किसी हिंदू राष्ट्रवादी जादू-टोने से जोड़ते हैं। उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर एक दशक से ज्यादा समय हो गया है, फिर भी भारत के साथ संवाद के उनके विषय खत्म नहीं हुए हैं।

शायद धारणा की राजनीति को एक ऐसे नेता की जरूरत थी, जो सामाजिक आकांक्षाओं को पूरा करने वाले और पुरानी वैचारिक सोच को खत्म करने वाले के तौर पर ताकत का इस्तेमाल कर सके। वह (नरेंद्र मोदी) अब भी जीत रहे हैं। कुछ नेताओं को 2026 में प्रवेश करने की इजाजत दी गई है, ताकि उन्हें उस संवाद के लिए इनाम मिलने का बेहतर मौका मिले, जो उन्होंने शुरू किया है।  edit@amarujala.com      
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