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युद्ध स्मारक और राष्ट्रधर्म

Sun, 24 Feb 2019 07:40 PM IST
tarun veejay तरुण विजय
Updated Sun, 24 Feb 2019 07:40 PM IST
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War memorial and nationalism
युद्ध स्मारक

कुंभ में डुबकियां, मंदिर-अजान-चर्च सब ठीक है। लेकिन यदि सीमा, सैनिक और नागरिक लगातार आक्रमणों का शिकार हो रहे हों, तो कुछ भी ठीक नहीं रहता। भारतीय समाज स्मृति-लोप में जीता है या शायद इतने अधिक बर्बर आक्रमणों का सदियों से वह शिकार बनता आया है कि वह न पानीपत का परिणाम याद करता है, न 1947 की विभाजन की विभीषिका और उसके दो महीने बाद पाकिस्तानी हमले में गिलगित-बाल्टिस्तान गंवाना और मीरपुर का हिंदू नरसंहार झेलना।


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इसलिए आश्चर्य नहीं है कि चार-चार पूर्ण युद्ध और सात दशक लंबे अघोषित आतंकी हमलों को सहन करने वाले इस देश में हुतात्मा सैनिकों की याद में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बनाने में सत्तर साल बीत गए। युद्ध स्मारक राष्ट्रीय समाज की अपने सैनिकों, उनके बलिदान और उनके परिजनों के प्रति सामूहिक सम्मान का ही प्रकटीकरण नहीं होता, बल्कि यह राष्ट्रीय स्वाभिमान और गौरव का ऐसा प्रतीक होता है, जिससे आने वाली पीढ़ियां प्रेरणा ग्रहण करती हैं। दिल्ली में 'अमर जवान ज्योति' उस इंडिया गेट की छाया में है, जो उन भारतीय सैनिकों की याद में ब्रिटिश साम्राज्य ने बनवाया था, जो ब्रिटिश और सहयोगी सेनाओं के लिए प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में लड़े थे।

सरकार की सहायता के बिना चंडीगढ़ और बंगलूरू में सामाजिक सरोकार से जुड़े संस्थानों ने युद्ध स्मारक बनवाए। देहरादून में उत्तराखंड का सार्वजनिक क्षेत्र में युद्ध स्मारक बनाने के लिए छत्तीस वर्षों से (उत्तर प्रदेश के समय से ही) सैनिक संगठन मांग करते रहे। नरेंद्र मोदी सरकार में पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के सहयोग से वहां राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बनना शुरू हुआ, जिसमें इन पंक्तियों के लेखक ने अपनी संसद निधि से 2.38 करोड़ रुपये दिए। फिर भी अनेक बाधाएं डाली गईं और अब वह उद्घाटन की प्रतीक्षा में है।
 
यह उस उत्तराखंड राज्य का हाल है, जहां प्रायः हर दूसरे घर से सैनिक और बलिदानी रणबांकुरे सीमा पर गए हैं और आज भी देश में आंकड़ों की दृष्टि से सर्वाधिक सैनिक इसी राज्य से भर्ती होते हैं।

ब्रिटेन ने 1947 के बाद भी इस बात का ध्यान रखा कि भारत में उन सैनिकों की याद में बने स्मारकों, कब्रिस्तानों की वह अपने खर्च पर शानदार देखभाल करता रहे, जो ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति वफादार रहे और लड़े। दिल्ली से लेकर कोहिमा तक इनकी देखभाल के लिए ‘कॉमनवेल्थ वार ग्रेव्ज कमीशन’ तथा ‘इंपीरियल वार ग्रेव्ज ऐंड सीमेट्रीज ऑफ ब्रिटिश एम्पायर’ जैसे संगठन करोड़ों पौंड के बजट पर चलते हैं। अपने साम्राज्य के लिए जान देने वाले 17 लाख सैनिकों (दुनिया के 153 देशों से) के लिए अंग्रेजों ने 2,500 स्मारक और कब्रें राष्ट्रमंडल के विभिन्न देशों में संभाली हुई हैं। लेकिन अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान तो हिंदुओं के रक्त, संस्कार और सभ्यता का अंश है। श्राद्ध, पितृ विसर्जन, तर्पण क्या है? यही तो है!

नरेंद्र मोदी सरकार ने राजधानी में इंडिया गेट के पास राष्ट्रीय युद्ध स्मारक निर्मित कर, जिसका आज उद्घाटन होना है, एक प्रकार से अपने पुरखों के प्रति राष्ट्रीय ऋण की ही अदायगी की है। इसके लिए पांच सौ करोड़ रुपये की राशि बलिदानियों के प्रति दो बूंद अर्घ्य समान ही है। इस राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में 1947 के बाद से अद्यतन विभिन्न युद्धों-1947-48, 1961 (गोवा), 1962 (चीन), 1965,1971, 1987 (सियाचिन), 1987-88 (शांति सेना श्रीलंका), कारगिल-1999 व अन्य सैन्य अभियानों में बलिदान हुए सैनिकों के नाम उत्कीर्ण किए जाएंगे। इसके साथ ही एक राष्ट्रीय यद्ध संग्रहालय का निर्माण किया जाना भी प्रस्तावित है।
 
यह युद्ध स्मारक हमारे महान भारत की वीरता का तीर्थ होगा। यह भारतीयों द्वारा स्वतंत्र भारत के सेनानियों की स्मृति में, स्वतंत्र देश की जनता के धन से बना सच्चा भारतीय स्मारक होगा, जो भारत की जनता को आत्मर्पित किया जाएगा। एक ऐसी दिल्ली में, जो गुलामी के अवशेषों और दासता के चिह्नों से भरी पड़ी है, राष्ट्रीयता के इस सैन्य-शौर्य तीर्थ का उदय स्वातंत्र्य ज्योति की अमर्त्य शिखा को अभिव्यक्त करता है।

भारत में स्मृति-लोपी सेक्यूलर प्रभाव खत्म होना चाहिए। पूर्वजों के संघर्ष, जय-पराजय, दुख-सुख और पराक्रम की स्मृति राष्ट्र तथा समाज का प्राण होती है। सड़क, पानी, बिजली जीवन की आवश्यकताएं हैं, लेकिन मनुष्य काया की तरह राष्ट्र का एक मन, एक आत्मा होती है, जिसे स्मृति जिंदा रखती है।
 
जिस देश को खत्म करना हो, वहां उसकी स्मृति, यानी सामूहिक स्मृति और जन चैतन्य को मार दिया जाता है। आवश्यकता है कि अब विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध भारतीय समाज के गौरवशाली प्रतिरोध, विजय-गाथाओं, हम पर हुए अत्याचारों और नरसंहारों के बाद क्रांतिकारी आंदोलनों को समेटे हुए स्वतंत्रता दिवस तक की यात्रा को विशाल-विराट भारतीय स्वतंत्रता-संग्रहालय में प्रस्तुत किया जाए। आज तक आसेतु हिमाचल, कश्मीर से अंडमान, तवांग से ओखा तक भारतीय संघर्ष के महान अप्रतिम विश्व में अन्यत्र दुर्लभ उदाहरणों को एक साथ कहीं भी प्रस्तुत नहीं किया गया है।
 
राजनेता अपने चुनावों पर दस-बीस हजार करोड़ रुपये खर्च करना सामान्य मानते हैं। एक सांसद लोकसभा चुनाव में 25-50 करोड़ तो यों ही खर्च कर देता है। हमारे देश के महिमावान सांसदों, विधायकों और पार्षदों के चुनाव में आज तक कितने अरब रुपये पोस्टरों, बैनरों तथा जन-एकत्रीकरण पर खर्च हुए! इसका 00.01 प्रतिशत भी यदि भारत अपने हुतात्माओं को श्रद्धांजलि देने और उनकी स्मृतियों को संजोने पर खर्च करे, तो यह वास्तविक राष्ट्रधर्म का निर्वाह होगा। और तभी कुंभ, नमाज-अजान, चर्च सुरक्षित रह पाएंगे। इन सबका क्रम 'जय हिंद' के बाद ही आता है। 

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