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युद्ध ही विकल्प नहीं है
थॉमस एल फ्रीडमैन/स्तंभकार
Updated Mon, 25 Nov 2013 07:43 PM IST
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मध्य पूर्व ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अगर आप अच्छा खाते हैं, नियमित रूप से व्यायाम करते हैं, धूम्रपान नहीं करते, तो लंबे समय तक जिएंगे और ऐसे दिन भी देख लेंगे, जब यरूशलम को अपने कब्जे में लेने वाले यहूदी और मक्का-मदीना की मस्जिदों की रक्षक सऊदी सुन्नी ईरान के शियाओं और अमेरिका के प्रोटेस्टेंटों के खिलाफ गठजोड़ करेंगे।
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आप ऐसे दिन भी देखेंगे, जब हिंदुओं का भारत और कंफ्यूशियस का चीन अमेरिका का साथ देंगे। जबकि धर्मनिरपेक्ष फ्रेंच दोनों तरफ होंगे! मैंने तो अब सब कुछ देख लिया है।
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हाल ही में मैंने अबूधाबी में गल्फ सिक्योरिटी कांफ्रेंस में हिस्सा लिया, जिसमें पूरी अरब/मुस्लिम दुनिया के अधिकारी और विशेषज्ञ मौजूद थे।
शुरुआती सत्र में इस्राइल के राष्ट्रपति शिमोन पेरिस ने यरूशलम स्थित अपने दफ्तर से सैटेलाइट के जरिये सम्मेलन को संबोधित किया।
अरब लोगों के बीच इस्राइल के राष्ट्रपति के संबोधन को देखकर मुझे ओस्लो के वे पुराने दिन याद आ गए, जब इस्राइल और अरब के लोग काहिरा और अम्मान में व्यापार सम्मेलन आयोजित करते थे।
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लेकिन इस्राइल-अरब का यह सहयोग किसी सामंजस्य पर नहीं, बल्कि उस आदिवासी परंपरा पर आधारित है, जिसमें कहा जाता है कि मेरे दुश्मन का दुश्मन मेरा दोस्त है।
और मौजूदा मामले में दोनों का दुश्मन ईरान है, जो परमाणु हथियार बनाने की तैयारी में जोरों से जुटा है।
इस्राइल के कई राजनयिक और मंत्री तथा वहां की लॉबी अमेरिकी कांग्रेस के सामने अपना पक्ष रख रही है, वहीं अरब देशों के अधिकारी ओबामा प्रशासन को सीधे-सीधे यह संदेश दे रहे हैं कि अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी के नेतृत्व में फ्रांस, ब्रिटेन, रूस, चीन और जर्मनी के विदेश मंत्रियों ने ईरान के सामने जब यह प्रस्ताव रखा था कि अपना सैन्य परमाणु कार्यक्रम बंद कर देने की स्थिति में उस पर लगे व्यापार संबंधी प्रतिबंध में छूट दी जाएगी, तो तेहरान ने किस तरह उसका विरोध किया था।
मैंने कभी नहीं देखा कि इस्राइल और अमेरिका के प्रमुख अरब सहयोगी मिलकर मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति की विदेश नीति के एक अहम फैसले को बाधित करने का काम कर रहे हों।
इससे पहले मैंने यह भी कभी नहीं देखा कि डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन्स के सांसद अपने राष्ट्रपति के खिलाफ इस्राइल का पक्ष लेने को बेताब हों।
अमेरिकी सांसदों का यह रुख उस बढ़ती प्रवृत्ति का नतीजा है, जिसमें वे यहूदी वोटों और चुनावी चंदे के लिए इस्राइली लॉबी के मन मुताबिक काम करना पसंद करते हैं।
इसके बावजूद मैं इस्राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू और सऊदी अरब के शासक अब्दुल्ला की अनदेखी नहीं कर रहा, जो ईरान के साथ प्रस्तावित समझौते के खिलाफ हैं। लेकिन इससे तो केरी का काम और आसान हो जाता है।
वह तेहरान को कह सकते हैं, देखिए, हमारे दोस्त इस समझौते के किस तरह खिलाफ हैं! इनमें से एक के पास तो मजबूत वायुसेना है। ऐसे में, आप जितनी जल्दी इस समझौते पर दस्तखत करें, आपके लिए उतना अच्छा होगा।
मैं इस्राइल और अरब की संशयी सोच पर क्षुब्ध नहीं हूं, लेकिन हम उन्हें एक समझौते को रोकने नहीं दे सकते। यह ठीक है कि ईरान पर यकीन करना खतरनाक हो सकता है।
उसने बम बनाने के मामले में झूठ बोला है, और उस सख्त आर्थिक प्रतिबंध के बगैर, जिसे लागू भले ही ओबामा ने किया, पर जिसमें इस्राइल और अरब राष्ट्रों ने प्रभावी भूमिका निभाई, वह अभी बातचीत की मेज पर नहीं आता।
मैं अरब राष्ट्रों की चिंताओं को भी समझ रहा हूं। उनका कहना है कि अमेरिका तो यह समझौता करके निकल जाएगा, पर तब वह ईरान को आर्थिक रूप से और मजबूत बना जाएगा, जब सीरिया, इराक, लेबनान और बहरीन में उसका प्रभाव बढ़ चुका है।
इसके बावजूद ईरान के साथ केरी का यह समझौता दीर्घावधि में हमारे लिए अच्छा है। इसके चार कारण हैं। पहला, प्रतिबंधों में मामूली छूट के बदले ईरान के परमाणु बम बनाने वाली सभी तकनीकों का इस्तेमाल बंद हो जाने की उम्मीद है।
कच्चे तेल संबंधी प्रतिबंधों के बरकरार रहने से ईरान तब भी काफी नुकसान में रहेगा। ऐसे में, ईरान एक ही समय बम बनाने और बातचीत करने लायक नहीं रहेगा।
दूसरे, नेतन्याहू की सोच है कि और ज्यादा प्रतिबंध लगाने से ईरान पूरी तरह आत्मसमर्पण कर देगा, पर ईरान के विशेषज्ञों का मानना है कि यह संभावना न के बराबर है।
तीसरा, बम बनाने की तकनीक के मामले में ईरान पहले से ही पारंगत है। इसलिए जब तक आप हर ईरानी के दिमाग की सफाई नहीं करते, तब तक उसकी परमाणु तकनीक को पूरी तरह खत्म कर पाना संभव नहीं।
चौथा यह कि स्थायी सुरक्षा केवल ईरान में एक आंतरिक बदलाव के जरिये ही संभव है, जो ज्यादा खुलेपन के जरिये ही हो सकता है। केरी के समझौते से ईरान का परमाणु कार्यक्रम रुक सकता है, साथ ही, इससे वहां उदार प्रवृत्तियों को ज्यादा मजबूती भी मिलेगी।
अगर इस्राइल अमेरिका की अगुवाई वाले समझौते को बेअसर कर देता है, तो ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई ही बचेगा। जब नेतन्याहू एक विश्वसनीय राजनयिक विकल्प को ध्वस्त कर देंगे, तब अमेरिका या नाटो के कितने सहयोगी ईरान में बमबारी करने जाएंगे? जाहिर है, ज्यादातर लोग सैन्य कार्रवाई के पक्ष में नहीं होंगे।
वैसे में, अकेले सैन्य कार्रवाई कर इस्राइल ईरान को परास्त कर सकता है, लेकिन वैसी स्थिति में वह बम बनाने के मामले में भी स्वतंत्र हो जाएगा। क्या इस्राइल हर छह महीने में ईरान पर बमबारी करने के लिए तैयार है?