फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   war history: Time to unveil the bitter truth

युद्ध संबंधी सूचनाएं: कड़वे सच से चीकट पर्दा उतार देने का वक्त

Thu, 17 Jun 2021 05:56 AM IST
Pradip Kumar प्रदीप कुमार
प्रदीप कुमार Published by: Pradip Kumar Updated Thu, 17 Jun 2021 05:56 AM IST
विज्ञापन
war history: Time to unveil the bitter truth
INDIA PAK

आजादी से अब तक लड़े गए युद्धों के संचालन और परिणामों का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण अभी तक इसलिए संभव नहीं हो पाया कि किसी भी सरकार ने तथ्यों को उजागर करने की हिम्मत नहीं जुटाई। कई पूर्व सेनाधिकारियों, नौकरशाहों और विदेशी विशेषज्ञों के अध्ययन की, कुछ अपवादों को छोड़, गंभीर सीमाएं रही हैं। अवकाशप्राप्त अधिकारी गोपनीयता कानून का उल्लंघन कर नहीं सकते और विदेशियों के पास आवश्यक जानकारी हो नहीं सकती। अनेक किताबें पूर्व निर्धारित निष्कर्षों पर पहुंचने के लिए लिखी गईं। मिथकों, भ्रांतियों और राजनीतिक दृष्टि से सुविधाजनक 'तथ्यों' को सच बताया जाता रहा। इस चीकट पर्दे को उतार फेंकने के लिए रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने अब अच्छी शुरुआत की है। 


loader

कुछ शर्तों का पालन करते हुए 25 साल के बाद वर्गीकृत सूचनाओं को सार्वजनिक किया जाएगा। आशा की जाए, रक्षा मंत्रालय के संयुक्त सचिव की  अध्यक्षता में प्रस्तावित कमेटी का गठन और कार्य घोषित नीति के लक्ष्य के अनुरूप होंगे। पाकिस्तान ने अपनी स्थापना के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर को हड़पने के लिए हमला कर दिया। पहले हथियारबंद कबाइलियों और फिर नियमित सेना को भेजने का मौका उसे इसलिए मिला कि महाराजा हरि सिंह स्वतंत्र कश्मीर  रियासत का सपना देख रहे थे। श्रीनगर हवाई अड्डे पर भारतीय सेना के उतरने से पहले तक पाकिस्तान करीब एक तिहाई हिस्से पर कब्जा कर श्रीनगर के नाके तक  पहुंच चुका था। भारतीय सेना हमलावरों को खदेड़ते हुए रावलपिंडी मार्ग के छोर तक पहुंची ही थी कि उसे रुक जाने का आदेश दे दिया गया। 

प्रचारित सत्य यह है कि प्रधानमंत्री नेहरू ने गवर्नर जनरल माउंटबेटन के दबाव में युद्धविराम करवा दिया। कमेटी को सच की पड़ताल करनी होगी। सच यह तो नहीं कि रावलपिंडी मार्ग पर आगे बढ़ते हुए मुजफ्फराबाद पर कब्जा और स्कार्दू-हुंजा की मुक्ति के लिए जरूरी सैन्य बल उस समय उपलब्ध ही नहीं था? एक बात यह भी कि स्थायी सैन्य अभियान जनसमर्थन के बगैर मुमकिन नहीं होता और आज के गुलाम कश्मीर (पीओके) में शेख अब्दुल्ला का प्रभाव नहीं था। 

1962 का पूरा सच शायद ही कभी सामने आ पाए। हास्यास्पद सच यह है कि जगजाहिर बातों पर भी हम कुंडली मारे बैठे हुए हैं। अत्यंत विवादित है हेंडरसन ब्रुक्स रिपोर्ट। 1962 में हार के कारणों की गहराई तक पहुंचने के लिए भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल हेंडरसन ब्रुक्स को जिम्मेदारी सौंपी गई थी। नई दिल्ली में टाइम्स, लंदन के संवाददाता नेविल मैक्सवेल ने ब्रुक्स रिपोर्ट पर आधारित विस्तृत किताब (इंडियाज चाइना वार) लिख डाली। अब उसमें गोपनीय कुछ भी नहीं बचा। बीएम कौल, जेपी दलवी, एनएन भाटिया और डीके पलित जैसे पूर्व सेनाधिकारियों ने अपने-अपने नजरिये से 1962 पर बहुत लिखा है, मगर वह आधा-अधूरा है। नेहरू और रक्षामंत्री कृष्णा मेनन के अलावा और किसी की जवाबदेही नहीं बनती? वित्तमंत्री मोरारजी देसाई क्या सहयोग कर रहे थे? युद्ध के संचालन में बुजदिली दिखाने वाले कौन फौजी अफसर थे? कमेटी को इन घटनाओं से संबंधित हर दस्तावेज को प्रकाशित करने पर विचार करना होगा।

1965 के युद्ध से भी व्यापक जनता अभी तक वस्तुतः असूचित है। कच्छ पर पाकिस्तानी हमले के बाद सतर्कता न बरते जाने का दोषी कौन है? फौजी अफसर, खुफिया एजेंसियां या नेता? लाहौर मोर्चा न खोला गया होता, तो कश्मीर के एक हिस्से का निकल जाना तय था। आगे बढ़ रही भारतीय सेना इच्छोगिल नहर को पार कर लाहौर शहर में क्यों नहीं घुसी? ताशकंद समझौते का सच क्या है? अब न सोवियत संघ रहा और न 1965 के नेता व अधिकारी। इसलिए यह आसानी से बताया जा सकता है कि क्या सोवियत प्रधानमंत्री कोसिगिन ने मास्को में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री पर समझौते का दबाव डाला था। 

1971 के संपूर्ण सत्य को जानने का जनता को अधिकार है और उसे प्रकट करने में कोई हर्ज भी नहीं। तीन दिसंबर, 1971 की रात अनेक भारतीय हवाई अड्डों पर पाकिस्तानी हमलों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का दो टूक आदेश था- पाकिस्तानी युद्ध तंत्र को तहस-नहस कर डालो। ढाका में हथियार डाले जाने के बाद पश्चिमी पाकिस्तान मोर्चे पर सेना को बढ़ने से क्यों रोक दिया गया? अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर ने चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन लाइ से भारत के खिलाफ सैनिक हस्तक्षेप करने के लिए कहा था। चाउ ने पाकिस्तानी तानाशाह याह्या खान को भरोसा भी दिला दिया था कि एक-दो दिन मोर्चा संभाले रहिए, चीनी सेना पहुंच रही है? चीन ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया? बंगाल की खाड़ी की ओर अमेरिकी जहाजी बेड़े के बढ़ने पर उच्च स्तर पर क्या प्रतिक्रिया हुई थी? 

भारत में सरकार किसी पार्टी या मोर्चे की हो, कोई भी जिम्मेदार प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री अवर्गीकरण में एक हद से आगे नहीं जा पाएगा। इस प्रश्न का सटीक उत्तर मिलना मुश्किल है कि चीन की खतरनाक राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित विस्तारवाद के कारण भारत से रिश्ते खराब हुए या कुछ और भी था? नेहरू सरकार ने बफर के खात्मे को स्वीकार भी कर लिया था। फिर क्या तिब्बत की वजह से ही टकराव की नौबत आई? दलाई लामा को राजनीतिक शरण देने से एक बार इन्कार करने के बाद नेहरू ने निर्णय क्यों बदला? ल्हासा से भारतीय सीमा तक दलाई लामा की पलायन-टीम में रेडियो ऑपरेटर के रूप में काम कर रहे सीआईए एजेंट का सच क्या है? 

संबंधित फाइलों के डबल लॉकर से निकल पाने की आशा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उससे विदेश नीति में बड़े उलटफेर का खतरा है। पर युद्धों के कारणों, संचालन, राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक-सैनिक कमजोरियों पर प्रकाश तो पड़ना ही चाहिए। हम किससे छिपाना चाहते हैं? मसलन, 1962 में हमला करने से पहले माओ को भारतीय सेना की तैयारी और बीएम कौल जैसे कमांडरों के रण कौशल की जानकारी भारतीय नेताओं से कहीं अधिक थी। घटनाओं और परिणामों का विश्लेषण न होने से हम अंधकार में पड़े रहते हैं। जवाबदेही भी प्रायः तय नहीं हो पाती। जब गढ़े गए मिथक सच बन जाएं, इतिहास से सीखने की संभावना समाप्त हो जाती है। कामना करें, कमेटी का शीघ्र गठन होगा और वह निर्भय होकर पूर्ण निष्पक्षता से कार्य कर सकेगी।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed