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जरा मून तक गए हैं
कुमार विनोद
Updated Sun, 06 Sep 2015 07:32 PM IST
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वे दिन गए, जब प्रेमी झूठ-मूठ गुनगुनाते हुए अपनी प्रेमिका को आमंत्रण देता था-चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो। प्रेमिका यह जानते हुए भी, कि उसे बेवकूफ बनाया जा रहा है, कह देती थी-हम हैं तैयार चलो। हकीकत क्या है, इससे दोनों ही पक्ष वाकिफ थे। बस थोड़ा मनोरंजन हो जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। चांद के पार का तो पता नहीं, अलबत्ता चांद पर प्लॉट जरूर बेचे जा रहे हैं।
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आने वाले समय में लोग यदि चांद पर बस गए, तो धरती पर रोजमर्रा की बातचीत का अंदाज ही बदल जाएगा। फोन आएगा-हैलो! गुप्ता जी हैं? मिसेज गुप्ता इठलाती हुई जवाब देंगी-जी, वह तो मेरे सबसे छोटे वाले देवर से मिलने जरा मून तक गए हैं। और फिर 'कब तक लौटेंगे’ के जवाब में कहेंगी-वहां रुकने का वैसे तो उनका एक-आध दिन का ही प्रोग्राम था, लेकिन आजकल फेस्टिवल सीजन के चलते रॉकेट में रिजर्वेशन जल्दी नहीं मिल पा रहा। लेकिन टिकट कन्फर्म होने के ठीक तेरहवें दिन वह दिल्ली पहुंच जाएंगे।
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इधर धरती पर मकान बना रहा कोई व्यक्ति अपना काम कई दिनों तक बंद रहने की शिकायत लेकर कांट्रेक्टर के पास जाएगा, तो वह चांद की तरफ इशारा कर कहेगा कि ऊपर एक बहुत ही अर्जेंट काम चल रहा है। अगले हफ्ते उनका गृह-प्रवेश है। फिर मामले की ऊंच-नीच समझाते हुए कहेगा कि ऊपर के जिस मकान की मैं बात कर रहा हूं, उसका मालिक एमडीए यानी ‘मून डेवलपमेंट अथॉरिटी’ का चीफ एडमिनिस्ट्रेटर है। जब आप अपने मून वाले प्लाट पर कंस्ट्रक्शन शुरू करेंगे, तो एनओसी वगैरह के लिए हमें इन्हीं के पास जाना पड़ेगा। अब आप ही बताइए, क्या हम उन्हें नाराज कर सकते हैं?
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यह सब सुनकर धरती पर मकान बना रहा बंदा यह सोचकर नतमस्तक हो जाएगा कि चलो, कोई बात नहीं। यहां वाला मकान बनने में थोड़ी देरी भी हो गई तो क्या, कम से कम चांद वाला मकान बनाते समय तो कोई अड़चन नहीं आएगी!