{"_id":"3f869814-30c9-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"wait-nation-india","type":"story","status":"publish","title_hn":"कब तक इंतजार करेगा यह देश","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
कब तक इंतजार करेगा यह देश
तवलीन सिंह
Updated Sat, 17 Nov 2012 08:42 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इस देश की व्यावसायिक राजधानी मुंबई में जिस उत्साह से दिवाली के समय लक्ष्मी पूजा होती है शायद ही किसी दूसरे शहर में होती होगी। अफसोस कि इस साल आर्थिक मंदी की वजह से ऐसी मायूसी छाई रही इस महानगर में कि दिवाली की रोशनियां भी कम दिखीं और त्योहार मनाने का शौक भी कम दिखा।
विज्ञापन
कुछ दुकानदारों से जब बात की, तो मालूम हुआ कि खरीदार भी कम आए इस वर्ष, और जो थोड़े-बहुत आए, उन्होंने सोच-समझकर, खरीदारी की। मुंबई शहर में रहते हैं देश के सबसे अमीर नागरिक, जिनमें से कुछ मेरे दोस्त हैं, सो उनको फोन लगाया मंदी का असर समझने।
विज्ञापन
अर्थव्यवस्था का बुरा हाल होने के बावजूद उनको ऐसा लगता है कि देश के बड़े राजनेताओं को न तो परवाह है इसको लेकर और न ही चिंता है भारत के भविष्य की। एक उद्योगपति दोस्त ने इन शब्दों में अपनी निराशा व्यक्त की, 'मानते हैं हम कि ज्यादातर दोष इस सरकार का है, लेकिन अगर विपक्ष में हम देख सकते उम्मीद की किरण, तो कुछ तो बात बनती।
विज्ञापन
समस्या यह है कि देश के मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी का हाल तो कांग्रेस से भी बदतर दिखता है।...वह समझ ही नहीं पाई है कि उसको किस दिशा में चलना चाहिए।' इस बात की गहराई जब मैंने समझने की कोशिश की, तो साफ दिखने लगा कि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी इतनी दिशाहीन हो गई है कि यह भी नहीं दिखता उसको कि वर्तमान आर्थिक मंदी उसके लिए बहुत बड़ा मौका साबित हो सकता है।
कैसे? क्योंकि मंदी आई है वामपंथी आर्थिक नीतियों के कारण, जिनकी बुनियाद रखी सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति ने और जिन पर अमल किया प्रधानमंत्री ने अपने खुद के विचारों को ताक पर रखकर। लेकिन इस बात की तरफ ध्यान कौन दिलाएगा कि जितने भी खिलाड़ी हैं राजनीतिक मैदान में आजकल, सब वामपंथी मिजाज के हैं!
मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी से लेकर अरविंद केजरीवाल के नए राजनीतिक दल तक सब बोलते हैं वामपंथी आर्थिक नीतियों के पक्ष में। कमोबेश सभी देश के उद्योगपतियों को खलनायकों की तरह देखते हैं। ऐसी स्थिति में उस विपक्षी दल को क्या आवाज नहीं उठानी चाहिए, जो अपने को वामपंथी नहीं मानता?
भाजपा हमेशा से कहती आई है कि उसकी आर्थिक सोच अलग है वामपंथियों से। और जब सरकार चलाने का मौका मिला अटल बिहारी वाजपेयी को, उन्होंने आर्थिक सुधारों को डटकर आगे बढ़ाया वामपंथी राजनीतिक दलों के ऐतराज के बावजूद। नतीजा यह कि 2004 तक खुशहाली ऐसी फैली कि दुनिया मानने लग गई कि कुछ ही समय में हम चीन का मुकाबला करने लायक हो जाएंगे।
फिर सोनिया-मनमोहन सिंह की सरकार बनी और देश की आर्थिक दिशा बदल गई इतनी कि कि मंदी धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में फैलने लगी। जब प्रधानमंत्री को दिखा कि कुछ ज्यादा ही बुरा हाल हो गया है, तो उन्होंने फिर बुलंद किया आर्थिक सुधारों का नारा, लेकिन इसका स्वागत करने के बदले भाजपा ने ऊंचे स्वर में विरोध किया। भारत के भविष्य की तसवीर इस दल के बड़े नेताओं को दिखती भी है क्या?
यह सवाल जब मैंने अपने भाजपाई दोस्त से किया, तो जवाब यह मिला, अरे भाई, हमको थोड़ा समय और दे दो न। गुजरात के चुनाव के बाद आप देखना क्या होगा, जब नरेंद्र मोदी दिल्ली आएंगे। ऐसा फर्क दिखेगा आपको कि बस...। यह सुनने के बाद मायूसी का असर मुझे अपने में महसूस होने लगा।
इसलिए कि कब तक इंतजार करता रहेगा यह बदकिस्मत देश उस घड़ी का, जब वास्तव में एक ऐसा राजनेता आएगा सामने, जो देश की बागडोर अपने हाथों में ऐसे थामेगा कि टूटी, दिशाहीन सड़कों पर अटकी भारत की गाड़ी फिर तेजी से आगे बढ़ने लगेगी? ऐसा लगने लगा है कि स्वतंत्रता मिलने के बाद भारतवासियों ने सिर्फ इंतजार ही किया उस सुनहरे भविष्य के सपने के पूरे होने का, जो इस दिवाली को बिलकुल बिखर-सा गया।
कब तक करते रहेंगे हम इंतजार? कब तक बर्दाश्त करते रहेंगे हम ऐसे राजनेताओं को, जो गलत आर्थिक नीतियां हम पर थोपकर बुनियादी सेवाएं भी दे नहीं सकते आम भारतीय को? कब तक हर चुनाव में हमको सुनने को मिलेंगी वही मांगें, जो इस देश के वासी 1947 से करते आए हैं-रोटी, कपड़ा, मकान। बिजली, पानी, सड़क। नहीं मिली हैं अगर ये चीजें आज तक, तो सिर्फ इसलिए कि हमारी आर्थिक नीतियां नाकाम रही हैं और हमारी आर्थिक दिशा गलत।