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मोबाइल है आदमी

Thu, 25 Oct 2012 09:07 PM IST
प्रकाश पुरोहित
प्रकाश पुरोहित Updated Thu, 25 Oct 2012 09:07 PM IST
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vyang of prakash purohit

आज हर कोई कान पर यों हाथ लगाए नजर आता है, जैसे जन्म के साथ ही कान को हाथ से जोड़ दिया गया हो। पहले तो लगता था कि आशिकबाजी का प्रसाद मिला है और गाल की ललाई छिपाई जा रही है। यह भी लगता रहा कि क्रिकेट की कमेंटरी आ रही होगी। और जो खेल से अनजान थे, वे समझते थे कि कव्वालों की सोहबत में उठ-बैठ रहा है। जितने दिमाग, उतनी आशंकाएं! मगर बाद में तो कोई पिटकर भी आ रहा हो, तो शंका का लाभ मिल जाता था कि मोबाइल सुन रहा होगा।

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तब घरेलू फोन पर भी लोग सवार रहते थे, मगर यदा-कदा बाहर निकलते थे, तो अपनी विशुद्ध सिंगल काया के साथ भी पाए जाते थे। घर में होते थे, तो फोन देखकर ही समझ में आ जाता था कि चोंगा किन हाथों की वजह से क्रेडिल से दो फुट ऊपर हवा में तैर रहा है। बाहर भी रिसीवर को माइनस करने के बाद उन्हें पहचान लिया जाता था।
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मगर यह मोबाइल सेवा उनके कान की तरह अब शरीर का हिस्सा हो गया है। पत्नी को चाय के लिए भी बोलना होता है, तो मोबाइल से लैंड लाइन पर लगाने में नहीं हिचकते हैं। सबसे मुश्किल पल वे होते हैं, जब मोबाइल ऐसे पड़ा रहता है, जैसे बच्चा मस्ती करने के बाद गहरी नींद में सो रहा हो। मगर उनसे मोबाइल की यह अदा देखी नहीं जाती। उन्हें हर पल लगता है कि अब रोया-तब रोया। हसरत भरी निगाह से यों देखते हैं मोबाइल को, जैसे तांत्रिक श्मशान में नरमुंड को देखता है।
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आ क्यों नहीं रहा कोई फोन? नहीं आएगा, तो क्या मैं हाथ पर मोबाइल धरे बैठा रहूंगा? धिक्कार है ऐसे जीवन पर! लगा...उठ...हिम्मत कर... जो नंबर याद आए, उसे लगा ले। न हो, तो रांग नंबर ही लगा दे...और यह भी न कर सके, तो सौ नंबर लगा दे, रेलवे-बस पूछताछ, 197 कहीं तो लगा। तभी घंटी बजती है। लैंड लाइन की है। वह गुस्सा हो जाता है कि मोबाइल है, पता नहीं है क्या! सोचता है उठूं या बजने दूं लैंडलाइन फोन को! हेठी लगती है उसे।


गुलामी मानता है कि चलकर उस तक जाना होता है। न यह पता चलता है कि किसका फोन है और न नंबर देखकर काटने की सुविधा! डर यह भी है कि फोन उठाने गया और उधर कहीं मोबाइल बज गया तो! मन को समझाता है कि यह आवाज मिथ्या है, इसके बहकावे में मत आना! तभी लैंडलाइन फोन थक-हारकर चुप हो जाता है और मोबाइल बज उठता है ‘यार, फोन क्यों नहीं उठा रहा, घर पर नहीं है क्या?’

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