नर्मदा से उठी न्याय की आवाज
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नर्मदा घाटी में एक बार फिर सत्याग्रह का दौर चल रहा है। मेधा पाटकर 27 जुलाई से अनिश्चितकालीन उपवास पर हैं। इस तरह के सत्याग्रह यहां पहले भी हुए हैं, पर इस बार समस्याएं पहले से अधिक गंभीर हैं। बांध की ऊंचाई बढ़ चुकी है और गेट बंद होने से डूब क्षेत्र के गांवों में बहुत पानी भर जाने की आशंकाएं बढ़ गई हैं। हजारों विस्थापित परिवार, जो इन गांवों में हैं, के लिए खतरा बढ़ गया है। इस सिद्धांत को व्यापक स्तर पर स्वीकार किया गया है कि संतोषजनक पुनर्वास वही माना जाएगा, जहां विस्थापितों की स्थिति में पहले से कुछ सुधार नजर आए। या कम से कम पहले से स्थिति बदतर न हो। सरदार सरोवर बांध के अधिकतर विस्थापित आज इस स्थिति में नजर नहीं आ रहे हैं। विस्थापितों की अधिकतम संख्या मध्य प्रदेश में है। यहां विस्थापितों को भूमि देने की पक्की बात सरदार सरोवर परियोजना के आरंभिक दौर में कही गई थी, पर बाद में मध्य प्रदेश सरकार एकतरफा तौर पर विस्थापितों को वैकल्पिक भूमि देने से पीछे हट गई।
इस वजह से विस्थापितों की सबसे विकट स्थिति मध्य प्रदेश में ही नजर आती है। गुजरात और महाराष्ट्र में विस्थापितों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। उनके लिए भूमि की व्यवस्था है, पर उनकी भी कई समस्याएं हैं।
भूमि के वायदे से पीछे हटने के बाद मध्य प्रदेश में सरदार सरोवर परियोजना के विस्थापितों के लिए नकद मुआवजे आदि की प्रक्रिया आरंभ हुई, तो इसमें भी भारी भ्रष्टाचार पाया गया। झा कमीशन की रिपोर्ट व सरकारों के मान्यता प्राप्त दस्तावेजों से भी भ्रष्टाचार की गंभीरता का प्रमाण मिलता है। जब भूमि नहीं मिली और क्षति पूर्ति में भ्रष्टाचार हुआ, तो निश्चय ही विस्थापितों की समस्याएं बढ़नी थीं। वे संतोषजनक पुनर्वास की स्थिति में कतई नहीं हैं, पर सरकार का दबाव है कि जो मिला है, उसे स्वीकार कर शीघ्र डूब क्षेत्र से हट जाएं। दूसरी ओर पहले के वायदों व वास्तविक स्थिति में जो बड़ी दूरी है, उस पर ध्यान दिलाते हुए नर्मदा बचाओ आंदोलन ने कहा है कि पहले संतोषजनक पुनर्वास करना चाहिए, उसके बाद ही विस्थापितों को अपने मूल निवास-स्थल से हटने के लिए कहना चाहिए।
नर्मदा बचाओ आंदोलन का संघर्ष तीन दशकों से भी अधिक समय से चल रहा है। लोकतंत्र में सरकार से भिन्न मत रखने वाले संगठन यदि अपनी बात को तर्कसंगत व तथ्यात्मक ढंग से प्रस्तुत करें, तो सरकारों को ऐसे जन-संगठनों की बात खुले मन से सुननी चाहिए। हो सकता है, एक वैकल्पिक विचार को समझने से कुछ बड़ी गलतियों से बचा जा सके।
नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सरदार सरोवर परियोजना के औचित्य के बारे में अनेक वर्षों तक लगातार आवाज उठाई। बाद में जब इस परियोजना व इसके विस्थापन के आकलन के लिए मोर्स समिति या स्वतंत्र मूल्यांकन समिति का गठन विश्व बैंक ने किया, तो इस समिति ने भी विश्व बैंक द्वारा इस परियोजना के लिए कर्ज देने का विरोध करते हुए कहा कि परियोजना में बुनियादी कमियां हैं तथा पुनर्वास ठीक से होने की संभावनाएं यहां नजर नहीं आ रही हैं। इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर विश्व बैंक को परियोजना के लिए दिया जा रहा अपना कर्ज रोकना पड़ा।
इस समय संघर्ष और विवाद नाजुक तथा संवेदनशील दौर में है। सरकारों को चाहिए कि आंदोलन की मुख्य मांगों को स्वीकार कर आपसी सहयोग से संतोषजनक पुनर्वास की ओर बढ़ें। अहिंसक लोकतांत्रिक संघर्ष की जीत लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत मानी जाएगी। किसी भी हालत में इस आंदोलन का उत्पीड़न नहीं होना चाहिए।