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दिलों में बनता देश, बता रहे हैं विश्वनाथ त्रिपाठी
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स्वतंत्रता दिवस (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : PTI
आज हम अपनी स्वतंत्रता की 73वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। यही अवसर है कि हम अपने इन सात दशकों के सफर का एक सम्यक मूल्यांकन करें। बेशक उस समय ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शोषण के चलते हम अभाव, गरीबी, अशिक्षा आदि से जूझ रहे थे, लेकिन हमारे देश में राजनीतिक चेतना बहुत प्रबल थी।
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इसी राजनीतिक चेतना की बदौलत हमने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ी और ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंका था। नैतिक शक्ति के बल पर हमारे देश के कई नेताओं की विदेशों में बड़ी प्रतिष्ठा थी। विशेष रूप से गांधी की। बड़ी-बड़ी राजनीतिक सत्ताएं भारत का नाम लेती थीं और हमारी तरफ उम्मीद से देखती थीं।
जब दुनिया दो ध्रुवों में बंट गई, उस समय भी भारत ने एक तीसरी दुनिया का स्वप्न देखा और गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व किया। मगर अब जिसके पास आर्थिक और सैन्य शक्ति है, वही देश बड़ा माना जाता है। इन सात दशकों में हमने आर्थिक दृष्टि से, सैन्य दृष्टि से, विज्ञान, प्रौद्योगिकी व अंतरिक्ष के क्षेत्र में काफी विकास किया है, हमारी शक्ति बढ़ी है, साख बढ़ी है। और हम अब विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होने की स्थिति में पहुंच गए हैं।
हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि हम आज जनतांत्रिक, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष संविधान के तहत हैं। इन सात दशकों में और कुछ हुआ हो, चाहे न हुआ हो, लेकिन चुनाव के जरिये सरकारों के बदलने की जो जनतांत्रिक व्यवस्था है, वह अक्षुण्ण बनी हुई है। यहां तक कि जो लोग यह कहते हैं कि इन सत्तर सालों में कुछ नहीं हुआ, वह भी इसी जनतांत्रिक प्रक्रिया से चुनकर आए हैं।
इस जनतांत्रिक प्रक्रिया का बने रहना इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए, क्योंकि हमारे आस-पास के कई देशों में यह प्रक्रिया निरंतर कायम नहीं रह पाई। पाकिस्तान का जन्म तो हमारी स्वतंत्रता के साथ ही हुआ, लेकिन वहां जनतांत्रिक व्यवस्था का क्या परिणाम हुआ, वह सबके सामने है।
यही नहीं, हमने दूसरे देशों में भी जनतांत्रिक व्यवस्था कायम करने में सहयोग किया। इसका उदाहरण बांग्लादेश है। दूसरी बात यह है कि स्वतंत्र होने के बाद हमने अपनी सीमा का भी विस्तार किया है। जब हम स्वतंत्र हुए थे, तब गोवा विदेश था। हमने उसे अपने देश में शामिल किया। पुड्डुचेरी फ्रेंच कॉलोनी थी, हमने उसे भी अपना बनाया।
जिस समय हमारा देश स्वतंत्र हुआ था, हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर नहीं थे। अपनी जरूरतों के लिए खाद्यान्न आयात करते थे। लेकिन आज स्थिति यह है कि हम न केवल अपनी आवश्यकता से अधिक खाद्यान्न का उत्पादन करते हैं, बल्कि उसका निर्यात भी कर रहे हैं। यह एक दिन में नहीं हुआ है।
इसके अलवा स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, ऊर्जा उत्पादन के मामले में भी हमने उल्लेखनीय प्रगति की है, हालांकि अब भी हमें काफी कुछ करना होगा। सामाजिक दृष्टि से देखें, तो दलित चेतना, नारी चेतना का विकास हुआ है। इन अस्मिताओं का उदय हमारे जागरण के लक्षण हैं। मगर दुख की बात यह है कि हमारे देश में सांप्रदायिकता की जड़ें इतनी गहराई में चली गई हैं कि वे हमारे विकास के रास्ते को अवरुद्ध करती हैं।
आजादी के समय आम लोगों के समक्ष रोटी, कपड़ा और मकान की मूलभूत समस्याएं थीं। कमोबेश अब भी एक बड़ी आबादी के साथ ये समस्याएं बरकरार हैं, लेकिन यह भी तथ्य है कि आबादी बढ़ने के बावजूद अब देश में पहले जैसी भुखमरी नहीं है। इस दिशा में कमोबेश सभी सरकारों ने काम किया है। मगर आज बेरोजगारी भयंकर रूप से बढ़ी है।
जो शिक्षित युवा हैं, वे छोटी-मोटी नौकरियां करना नहीं चाहते और छोटी-मोटी नौकरियां हैं भी नहीं। कोरोना महामारी के समय तो यह समस्या और भी विकराल हो चुकी है। अनेक युवाओं की आत्महत्या की खबरें इधर आई हैं। इस समय देश की बहुसंख्यक आबादी पीड़ा और यातना से कराह रही है। इसकी सबसे ज्यादा मार दिहाड़ी मजदूरों और छोटे-मोटे व्यवसाय करने वाले लोगों पर पड़ी है।
नागार्जुन की एक कविता है-कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास। उस कविता का परिदृश्य आंखों के सामने दिखता है। हमारे लोकतंत्र के सामने जो चुनौतियां हैं, उसमें एक प्रमुख समस्या है-चुनाव में धनबल का प्रयोग। उसका समाधान यही है कि चुनाव में धन कम से कम खर्च किया जाए। दुखद है कि हमारे राजनीतिक परिदृश्य से दो चीजों का लोप हो गया है।
पहली, चाहे कोई भी पार्टी हो, अब कोई भी नेता नैतिक जवाबदेही के नाम पर पद छोड़ने की बात नहीं करता है। दूसरी, क्या इस देश में एक भी ऐसा नेता नहीं रह गया है, जो यह कहे कि मैं दल-बदलुओं, आपराधिक छवि वाले और भ्रष्ट नेताओं के सहयोग से सरकार नहीं चलाऊंगा? कोई तो ऐसा होना चाहिए!
हमारा देश अपने दिक्-काल में बहुत विशाल और विविधताओं वाला है। आज जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात हो रही है, क्या उसके जरिये हम लोकतंत्र के उच्चतम आदर्श को प्राप्त कर सकते हैं? एकता और एकरूपता, दोनों में फर्क है, बल्कि कहें कि दोनों एक-दूसरे के विपरीत हैं।
सबसे बड़ी चिंता की बात है कि वैज्ञानिक दृष्टि से इतिहास को देखने की कोई प्रेरणा नहीं ली जा रही है, बल्कि बहुत जोर-शोर से यह दबाव बनाया जा रहा है कि आप एक ही दृष्टि से इतिहास को देखें। समस्याओं को देखने की जो सामाजिक-वैज्ञानिक दृष्टि होती है, उसी के जरिये हम विकास कर पाते हैं। इतिहास को एक ही दृष्टि से देखना आत्मघाती है।
हमारे देश में मौसम, खान-पान, रहन-सहन, पहनावे, भाषा, धर्म-पंथ की विविधता है, जिससे हमारे देश की बहुरंगी तस्वीर बनती है। इस विविधता को खत्म करके यदि एकरूपता की बात करें, तो अनेकता में एकता की जरूरत ही क्या रह जाएगी! हिंसा के रास्ते से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। जनता को शिक्षित-जागरूक बना करके ही जातिगत या धार्मिक मतभेद खत्म किए जा सकते हैं।
जिस चीज को आप दिल से चाहते हैं, उसकी सुरक्षा के प्रति आप हमेशा चिंतित और शंकालु रहते हैं। सदैव चौकसी ही स्वतंत्रता की कीमत है। मुक्तिबोध ने कहा है कि सकर्मक ज्ञान होना चाहिए। मुझे उम्मीद है कि इसी सकर्मक ज्ञान और निरंतर चौकसी के जरिये हम अपने लोकतंत्र, अपनी स्वतंत्रता और अपनी जन्मभूमि की रक्षा के लिए तत्पर रहेंगे। (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)