लोकतंत्र का वायरस
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कमाल करते हैं आप, इसे रचनात्मक पहल कह रहे हैं! सरकार को सद्बुद्धि देने का यज्ञ कर रहे हैं आप! यज्ञ जैसे ढकोसले में आप विश्वास रखते हैं, जबकि अपनी सरकार कानून तक में विश्वास नहीं रखती! उसके मन-मुताबिक कोर्ट से फैसला नहीं आए, तो वह संसद में कानून बदल देती है। हालिया सर्वे ने बता दिया कि जो नेता आपराधिक पृष्ठभूमि का होता है, उसकी तीव्र गति से न केवल पूंजी बढ़ती है, बल्कि वोट बैंक भी बढ़ता है! नेता चुनाव जिताऊ होना चाहिए, फिर चाहे वह जेल में रहकर लड़े या बेल लेकर। जिस कानून के तहत चुनाव में सीटें कम मिलें, वह कानून सियासी दलों के लिए ‘काला कानून’ है। दागी नेता तो हर दल में हैं, इसलिए सभी दल दागी नेताओं के मुद्दे पर दिल मिला रहे हैं।
भाई साहब, सच्ची बात यह है कि आप भारतीय लोकतंत्रजन्य बीमारियों से ग्रसित हैं। इधर बरसात के दिनों में लोकतंत्र का वायरस कुछ ज्यादा ही संक्रमण फैला रहा है। सरकार को दोष देने के बजाय आप किसी कुशल चिकित्सक से अपना इलाज कराते, तो ज्यादा बेहतर होता। पिछले दिनों आप बारह रुपये हाथ में पकड़े-पकड़े खाना तलाशते रहे। नेताओं के बयानों को आप ऐसे ही दिल पर लेते रहे, तो हृदयाघात से नहीं बच पाएंगे!
पिछले दिनों जब देश में ‘तार’ सेवा बंद हुई, तो आपने पीएम साहब को महंगाई कम करने के लिए थोक में तार ठोक दिए! यह मानसिक बीमारी नहीं, तो क्या है? आपने इस उम्मीद में तार भेजे कि पीएम साहब ‘तार’ पाकर तत्काल महंगाई कम कर देंगे। दशकों पहले आम आदमी ‘तार’ को महत्व देता था, लेकिन अब ‘करार’ को महत्व देता है।
आप गंभीर मानसिक बीमारी से ग्रसित हैं, इसका ‘डायग्नोसिस’ उस समय हुआ, जब आपने पीएम और राहुल जी को क्रमशः एक रुपये, पांच रुपये और बारह रुपये के मनी ऑर्डर भेजे। आपने क्या सोचा था कि बीस मिनट के भीतर कोई सेवक भोजन लेकर आपके घर हाज़िर हो जाएगा! वहां दिल्ली में पीएम साहब ने लंगर नहीं खोल रखा है, जो आपको खाना पार्सल कर देते। भाई साहब, बारह रुपये में तो एक थाली खाना पार्सल करने वाला ‘मैटेरियल’ भी नहीं मिलता, खाना तो बड़ी बात है। इसलिए आपको मेरी नेक सलाह है कि तत्काल अपना इलाज कराएं। आप इस समय भारतीय लोकतंत्र के सबसे खतरनाक वायरस की गिरफ्त में हैं।