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सद्गुणों में छिपा जीवन का सार
शिवकुमार गोयल
Updated Wed, 13 Feb 2013 12:16 AM IST
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संत मेहजी के प्रकांड पांडित्य तथा विरक्त स्वभाव की ख्याति पूरे जापान में फैली हुई थी। वह ईश्वर आराधना के साथ-साथ परोपकार के कार्यों में भी रुचि लेते रहते थे। जिज्ञासु उनके पास आते तथा अपनी शंकाओं का समाधान कर संतुष्ट होकर लौटते थे।
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एक दिन जापान के राज्यपाल किया जारी उनके दर्शनार्थ पहुंचे। उन्होंने अपने निजी सचिव को परिचय पत्र देकर संत जी के कमरे में भेजा। संत जी ने पत्र पढ़ा, जिसमें उनके राज्यपाल होने की चर्चा थी। संत जी सचिव से बोले, उनसे कहना, मैं राज-काज की बात करने वाले किसी व्यक्ति से नहीं मिलता, क्योंकि मैं राजनीति की बातों से सर्वथा अनभिज्ञ हूं। मैं केवल धर्म तथा साहित्य-संस्कृति की चर्चा करता हूं।
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निजी सचिव ने बाहर लौटकर राज्यपाल को संत जी के उद्गारों से परिचित कराया। राज्यपाल को अपनी गलती की अनुभूति हुई। उन्होंने कागज पर केवल अपना नाम लिखकर भेजा, तो संत जी ने उन्हें बुला लिया। वह घंटों तक उनसे धर्म और ईश्वर संबंधी चर्चा करते रहे।
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संत मेहजी का सान्निध्य पाकर जब राज्यपाल लौटने लगे, तो संत ने कहा, धर्म का सार सेवा, परोपकार, न्याय और करुणा जैसे सद्गुणों में समाहित है। ये सद्गुण ही मानव को अमर बनाते हैं, उसे शांति प्रदान करते हैं। राज्यपाल सिर झुकाकर संत जी की बातें सुनते रहे और उन्हें अपने जीवन में उतारने का मन ही मन उन्होंने संकल्प ले लिया।