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हिंसा की लपटों में दक्षिण सूडान

Tue, 24 Dec 2013 09:12 AM IST
इस्माइल कुशकुश
इस्माइल कुशकुश Updated Tue, 24 Dec 2013 09:12 AM IST
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violence in south sudan

संयुक्त राष्ट्र परिसर में शरण लिए दसियों हजार भयभीत लोगों के बीच, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे हैं, बैठकर मानवाधिकार कार्यकर्ता बील बुत्रोस बील सुरक्षा चिंताओं के बारे में नोट ले रहे हैं। उन हजारों लोगों की तरह वह भी सुरक्षा की तलाश में वहां पहुंचे हैं। दक्षिण सूडानी सुरक्षा बलों के बारे में वह कहते हैं कि वे उनके घर आए थे और उनका पीछा कर रहे थे।

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राष्ट्रपति सेल्वा कीर की इस घोषणा के बाद कि पिछले हफ्ते पूर्व उपराष्ट्रपति द्वारा सैन्य प्रयास के जरिये उनकी सरकार के तख्तापलट की कोशिश की गई थी, दक्षिण सूडान अनिश्चितता और उथल-पुथल के भंवर में फंस गया है। माना जाता है कि राजधानी जुबा में सैकड़ों लोग मारे गए हैं और हजारों लोग हिंसा के डर से भागकर झाड़ियों में छिप गए हैं।
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हालांकि पूर्व उपराष्ट्रपति रीक मेचार ने तख्तापलट की कोशिश में हाथ होने से इन्कार करते हुए राष्ट्रपति पर आरोप लगाया है कि वह अपने विरोधियों पर कहर ढाने के लिए बहाने के रूप में इस अशांति का उपयोग कर रहे हैं। बेशक दोनों पक्ष इस हिंसा के भड़कने पर बहस कर रहे हैं, लेकिन लंबे समय तक इस अनुभवहीन नए राष्ट्र में तनाव का जारी रहना अंतरराष्ट्रीय जगत को इसके अस्तित्व के प्रति चिंता पैदा कर रहा है।
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अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चिंता जताते हुए कहा, दक्षिण सूडान का भविष्य दांव पर है। हालिया संघर्ष ने उसे अपने काले अतीत में लौटने का खतरा पैदा कर दिया है। मानवाधिकार कार्यकर्ता कहते हैं कि इस छोटे से देश के अन्य झगड़ों की तरह इस संघर्ष के भी जातीय आयाम हैं।

पूर्व उपराष्ट्रपति मेचार, जिन्हें कीर ने पूरे मंत्रिमंडल को भंग करने के साथ पद से हटा दिया था, नुएर समुदाय से हैं। जबकि राष्ट्रपति बहुसंख्यक डिंका समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। राजधानी जुबा में दक्षिण सूडानी सुरक्षा बल नुएर समुदाय के लोगों को निशाना बना रहे हैं। उन्होंने कइयों को मार दिया गया है और बहुतों को हिरासत में ले लिया गया है। उनमें सैनिक, नीति-निर्माता, छात्र, मानवाधिकार कार्यकर्ता और शरणार्थी शामिल बताए जाते हैं।

लेकिन राजधानी से बाहर जोंगलेई प्रांत में इसके उल्ट हो रहा है। नुएर समुदाय की सैन्य टुकड़ियां डिंका समुदाय के लोगों को निशाना बना रही हैं। वे संयुक्त राष्ट्र के परिसर पर धावा बोल रही हैं, जहां हजारों नागरिक शरण लिए हुए हैं। उन्होंने तेल संयंत्रों पर भी हमला किया है। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने कहा है कि उसके कार्यकर्ताओं के जीवन का भारी नुकसान हुआ है।

ह्यूमन राइट्स वॉच के अफ्रीकी निदेशक ने कहा है कि वह इस बात से चिंतित हैं कि चौतरफा नस्लीय हमले भविष्य में बदले की भावना को और भड़काएंगे, जिसके फलस्वरूप और हिंसा बढ़ेगी। हालांकि अन्य पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस झगड़े की वजह नस्लीयता नहीं, बल्कि राजनीति है। जुबा स्थित सूड इंस्टीट्यूट के विश्लेषक जकारिया डींग अकोल कहते हैं कि यह सत्ता संघर्ष है। नस्लीयता तो बाद की बात है।

दशकों के गृहयुद्ध के बाद उत्तरी सूडान से पृथक होकर 2011 में दक्षिणी सूडान स्वतंत्र राष्ट्र बना। मगर अब आलोचक राष्ट्रपति कीर पर तानाशाह होने का आरोप लगाते हैं, जो भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन एवं स्वतंत्रता की कमी वाली सरकार का संचालन करते हैं। दूसरी तरफ मेचार विरोधी उन्हें अवसरवादी बताते हैं, जिन्होंने सूडान के खिलाफ गृहयुद्ध के दौरान अपने और नुएर समुदाय के फायदे के लिए पाला बदल लिया था।

ब्रिटेन से डॉक्टरेट की उपाधि लेने वाले मेचार सूडानी पीपुल लिब्रेशन आर्मी (जिस पार्टी का नेतृत्व अभी कीर कर रहे हैं, उसकी सैन्य टुकड़ी) के वरिष्ठ सदस्य थे। 1991 में वह उस आंदोलन से अलग हो गए और अपना अलग समूह बनाया, जिसने 1997 में सूडानी सरकार से शांति समझौता किया था। इस दौरान मेचार के समूह ने दक्षिण सूडानी विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, लेकिन बाद में वह फिर दक्षिणी विद्रोही बलों के साथ शामिल हो गए। जब दक्षिण सूडान 2011 में अलग हुआ, तो मेचार को उप राष्ट्रपति बनाया गया।

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि हालिया उथल-पुथल ने 20,000 लोगों को उसके जुबा स्थित परिसर में शरण लेने को मजबूर किया है, जिससे मानवीय चिंता बढ़ गई है। मानवाधिकार कार्यकर्ता बील कहते हैं, न खाना है, न पानी है और चिकित्सा सुविधाएं भी सीमित हैं। यह रहने की जगह नहीं है।

राजनयिकों ने भी दक्षिण सूडान की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है। सुरक्षा परिषद ने एक बयान जारी कर कहा है कि राजनेताओं के बीच विवाद के चलते सुरक्षा के तेजी से बिगड़ते हालात और मानवीय संकट ने न सिर्फ उस देश के दीर्घकालीन सुरक्षा एवं स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर दिया है, बल्कि पड़ोसी देशों और उस क्षेत्र में शांति एवं सुरक्षा के लिए भी चुनौतियां पैदा कर दी हैं। आशंका है कि बढ़ती हुई अनिश्चितता पहले से ही संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करेगी। तेल संयंत्रों में काम करने वाले करीब 200 श्रमिकों ने संयुक्त राष्ट्र के शिविरों में शरण ली है और चीनी तेल कंपनी ने भी अपने श्रमिकों को हटाना शुरू कर दिया है।


जाहिर है, दक्षिण सूडान में गृहयुद्ध के गंभीर स्थानीय एवं क्षेत्रीय परिणाम होंगे। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के कैसी कोपलैंड कहते हैं कि आने वाले दिनों में शरणार्थी युगांडा, केन्या और इथोपिया का रुख करेंगे। इनफ प्रोजेक्ट के विश्लेषक अक्षय कुमार कहते हैं कि इस संकट के राजनीतिक समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को कूटनीतिक प्रयास करने होंगे। हालांकि बील को इस संकट के त्वरित समाधान को लेकर संदेह है। वह कहते हैं कि पूरा देश इस समय पीड़ित है।

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