फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Village away from development

भारत चांद पर जाने का प्रयास कर सकता है तो विकास से दूर क्यों हैं गांव

Mon, 30 Sep 2019 06:38 AM IST
तवलीन सिंह तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Published by: तवलीन सिंह Updated Mon, 30 Sep 2019 06:38 AM IST
विज्ञापन
Village away from development
प्रतीकात्मक तस्वीर

जिस दिन टेक्सास के ह्यूस्टन शहर में प्रवासी भारतीय अपने प्रधानमंत्री का शानदार स्वागत कर रहे थे, उस दिन मैं ग्रामीण महाराष्ट्र के दौरे पर थी। इस वर्ष बरसात का मौसम बहुत ज्यादा लंबा रहा है, सो जहां कभी सड़कें हुआ करती थीं, वहां अब टूटी, गड्ढे भरी पगडंडियां रह गई हैं, जिन पर गाड़ी रुक-रुककर आगे बढ़ती है। इसका फायदा इतना जरूर हुआ कि मुझे सड़क के आसपास के गांवों का हाल जांचने का मौका मिला। इनका हाल अच्छा नहीं था। बरसात का पानी गलियों में इतना भर गया था कि गलियां नालियों में तब्दील हो गई थीं, जिनमें हर किस्म का कूड़ा बहता दिख रहा था। उस गंदगी में छोटे बच्चे नंगे पांव खेल रहे थे।


loader

ऐसे दृश्य देखने को मिले दिन भर, सो जब शाम को टीवी पर मैंने ‘हाउडी मोदी’ का विशाल सम्मेलन देखा और ‘मोदी, मोदी’ के नारे सुने, तो मुझे ऐसा लगा कि वह सब किसी अलग यथार्थ का हिस्सा था, जिसका उस यथार्थ से कोई वास्ता नहीं था, जिसमें मैंने सारा दिन बिताया था। हम जो शहरों में रहते हैं, नरेंद्र मोदी की दूसरी शानदार जीत के बाद आधूनिक, समृद्ध भारत के सपने देखने लग गए हैं, लेकिन ग्रामीण भारत के लोगों के लिए यह सपना देखना बहुत मुश्किल है, क्योंकि ग्रामीण भारत में प्रगति की रफ्तार बैलगाड़ी की है। यहां पिछले पांच वर्षों में परिवर्तन जितना थोड़ा बहुत आया है, वह सिर्फ यह है कि खूब सारी सेलफोन की दुकानें खुल गई हैं और कंप्यूटर कोर्स के इश्तहार जगह-जगह दिखने लगे हैं।

जिस क्षेत्र के दौरे पर मैं निकली थी, वहां मैं चुनावों के समय बहुत बार आई हूं। सो यकीन मानिए, जब मैं कहती हूं कि भाजपा की सरकार आने के बाद फर्क अगर आया है, तो सिर्फ यह कि सड़कें काफी बन गई हैं, लेकिन इनके निर्माण का तरीका वही पुराना, घटिया किस्म का है, जिसका लाभ ठेकेदारों को ज्यादा और यात्रियों को कम मिला है। ठेकेदार खूब पैसे बना लेते हैं, क्योंकि सड़कें वे इतनी कच्ची बनाते हैं कि बरसात के बाद उनको दोबारा वही सड़कें बनाने का काम मिल जाता है। तकलीफ होती है हम यात्रियों को और इस देश के करदाताओं को, जिनके पैसे जाया होते हैं दोनों बार। विकसित और अर्ध-विकसित देशों में सड़कें बरसातों में बह नहीं जातीं।

मेरा इरादा मोदी की शान कम करने का बिल्कुल नहीं है। ह्यूस्टन में उनका स्वागत देखकर मेरा भी दिल खुश हुआ और अच्छा लगा कि विश्व के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति इस स्वागत में शामिल हुए और मोदी की प्रशंसा भी उन्होंने खुलकर की। बहुत अच्छी बातें हैं यह, लेकिन अब जब आप वतन वापस आए हैं प्रधानमंत्री जी, तो थोड़ा-सा ध्यान उन चीजों की तरफ भी लाइए, जहां परिवर्तन का आपका संदेश अभी तक पहुंचा नहीं है।

भारत अगर चांद तक जाने का प्रयास कर सकता है, तो क्या कारण है कि आधुनिक सड़कों के निर्माण का प्रयास नहीं कर सकता है? ग्रामीण भारत के गंदे, बेहाल गांवों में आधुनिक सुविधाएं लाने का प्रयास क्यों नहीं हो रहा? स्वच्छ भारत मोदी के पहले कार्यकाल का सबसे सफल अभियान साबित हुआ है, लेकिन इसके बावजूद हमारे गांवों का वही हाल है, जिसे देखकर गांधी जी ने सौ साल पहले कहा था कि ये गंदगी के केंद्र हैं, जहां न वातावरण सुहाना है और न दृश्य। उनके अपने शब्दों में, ‘गांवों के दृश्य इतने बदसूरत हैं कि उनमें जाने से पहले आंखें और नाक बंद करनी पड़ती है मुझे।’ स्वच्छ भारत अभियान से थोड़ा बहुत परिवर्तन आया तो है, लेकिन करने को बहुत कुछ बाकी है। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed