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मनुष्यता की अमरता का सच्चा पर्व: विजयदशमी का दिन मरणोत्सव... व्यापक अर्थ में यह समूची मानवता का अमृतोत्सव है

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सार
विजयदशमी शक्ति की आराधना का भी पर्व है। आदि शक्ति की इस दिन पूरे भाव के साथ आराधना होती है तथा इस आस्था के मूर्तिरूप को सदैव जीवंत बने रहने के लिए विसर्जित किया जाता है। नए कार्य आरंभ किए जाते हैं, शस्त्र पूजा की जाती है।
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Vijayadashami true festival of humanity immortality in broader sense immortality fest for entire humanity
विजयदशमी के दिन रावण दहन की परंपरा - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी

विस्तार

दशहरा मरणोत्सव है। मरण का उत्सव, अंत्येष्टि का पर्व! यह स्वाभाविक प्रश्न है कि क्यों शोक की स्मृति को उल्लास के रूप में परिणत करने की परंपरा हमारे पूर्वज स्थापित कर गए? इसलिए कि मनुष्यता की स्मृति जीवंत रह सके। हमारे पुरखों ने रावण की अंत्येष्टि को इसलिए महत्वपूर्ण बना दिया, ताकि दानवता की पराजय और मानवता की विजय की स्मृति अमिट बनी रहे। रावण के पुतले का दहन एक रूढ़ि नहीं है, सोच है, वह चिंतन है, जो बार-बार बंधनमुक्ति के द्वार पर लाकर खड़ा कर देता है। उन बंधनों से मुक्ति के द्वार पर, जो छल, छद्म, पाखंड, अपारदर्शिता, अहंकार, अमर्ष और अनुदारता के हैं, वैमनस्य, ईर्ष्या, कलुष और विभेद के हैं। दशहरा इन अर्थों में लोक में ही मुक्ति पा लेने का वह अनुष्ठान है, जो रावण दहन से उठती अग्नि की साक्षी में संपन्न किया जाता है। इसे विजयदशमी भी कहते हैं, ताकि हम इन सब वृत्तियों और अवगुणों पर विजय पा सकें। यह भी मान्यता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय ‘विजय’ नामक मुहूर्त होता है तथा इस मुहूर्त में चूंकि सभी कार्यों की सिद्धि होती है, इसलिए इसे विजयदशमी कहते हैं।



यह शक्ति की आराधना का भी पर्व है। आदि शक्ति की इस दिन पूरे भाव के साथ आराधना होती है तथा इस आस्था के मूर्तिरूप को सदैव जीवंत बने रहने के लिए विसर्जित किया जाता है। नए कार्य आरंभ किए जाते हैं, शस्त्र पूजा की जाती है। कहा जाता है कि इस दिन शिवाजी महाराज ने औरंगजेब पर विजय के लिए प्रस्थान किया था। यह राजाओं द्वारा युद्ध के लिए प्रस्थान करने का आदर्श दिन माना जाता था।


प्रायः समूचे भारत में संध्या के समय रावण दहन होता है और शमी वृक्ष के पत्ते सोने के रूप में तथा ज्वार की पत्तियां चांदी के रूप में रावण दहन के पश्चात लाई जाती हैं तथा भगवान के समक्ष रखने के बाद उनका एक-दूसरे के बीच आदान-प्रदान किया जाता है। यह वस्तुतः एक-दूसरे की समृद्धि की कामना की अभिव्यक्ति है, जिसे लोक मानस ने रावण की सोने की लंका के लुटने से जोड़ दिया है। यह भी मान्यता है कि शमी वृक्ष पर अर्जुन ने अपना धनुष रखा था, जिसके कारण उसे विजय मिली और यह भी कि इस वृक्ष ने राम की विजय का उद्घोष किया था, इसलिए इसकी पूजा की जाती है।

दशहरा, पारंपरिक रूप से मनाई जाने वाली रामलीला का महत्वपूर्ण अंग है, जिसकी जड़ें प्राचीन भारतीय महाकाव्य रामायण में हैं, जिसे महर्षि वाल्मीकि ने लगभग 500 ईसा पूर्व रचा था। रामायण की कथा, वाचिक परंपरा में निरंतर रही तथा मध्यकाल में उसका नाटकीय रूप विकसित हुआ। ओरछा के राजमहल की भित्तियों पर जो रामलीला के अंकन राजा वीरसिंहजूदेव के समय सोलहवीं सदी में निर्मित हुए, वे वास्तव में रामलीला के नाट्य अंकन हैं, जिनमें रामचरित को अंकित किया गया है। विद्वान मानते हैं कि ये अंकन केशव की रामचंद्रिका के आधार पर किए गए थे।

सोलहवीं सदी में जब गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की, तब रामलीला को नया आयाम मिला। उन्होंने रामलीला की परंपरा विकसित की, जो आज भी प्रचलित है। यह परंपरा उनके अनुयायी मेधा भगत ने आरंभ की और बनारस में तो यह 31 दिनों तक मनाई जाती है तथा रावण वध दशहरे को ही होता है। वर्ष 2008 में यूनेस्को ने रामलीला को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर’ घोषित किया है।

हिमाचल प्रदेश का कुल्लू का दशहरा प्रसिद्ध है। आश्विन माह के पहले 15 दिनों में राजा सभी देवी-देवताओं को धालपुर घाटी में रघुनाथजी के सम्मान में यज्ञ करने का न्योता देते हैं। कुल्लू नगर में 100 से अधिक देवी-देवता अपने मुख्य देवता रघुनाथजी का पूजन करते हैं। पूरे नगर में उत्साह के साथ जुलूस निकाला जाता है।

मैसूर में दशहरा पर्व मनाने की शुरुआत 15वीं सदी में विजयनगर साम्राज्य के शासकों ने की थी। सजे-धजे हाथियों का जुलूस देखने विश्व भर से पर्यटक आते हैं। कुल्लू की तरह बस्तर का दशहरा भी बहुत प्रसिद्ध है। यहां इसे राम की रावण पर विजय के रूप में नहीं मनाते। यह मां दंतेेश्वरी को समर्पित पर्व है, जो 75 दिन चलता है। पहला दिन ‘काछिन गादी’ कहलाता है। यह पर्व 15वीं सदी से आरंभ हुआ था।

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में यह पर्व पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जाता है। राजस्थान में भी शस्त्र पूजन कर विजयोत्सव मनाया जाता है। गुजरात में गरबा और दुर्गा आराधना के साथ यह पर्व जुड़ा हुआ है। महाराष्ट्र में ‘सिलंगण’ के रूप में इसे सामाजिक महोत्सव के रूप में मनाते हैं। बंगाल, असम और ओडिशा में भी इसे दुर्गा पूजा के रूप में मनाते हैं। पंजाब में नए कार्यों को आरंभ करने और फसल कटाई के रूप में भी दशहरे को मनाया जाता है, तमिलनाडु में गोलू और देवी आराधना के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में दशहरे के समय बथुकम्मा नामक फूलों का त्योहार भी मनाते हैं। ऐतिहासिक रूप से, 14वीं शताब्दी के विजयनगर साम्राज्य में इसे महानवमी के रूप में मनाया जाता था। इतालवी यात्री निकोलो दे ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है कि यह एक भव्य धार्मिक और सैन्य उत्सव था, जिसमें मां दुर्गा को योद्धा देवी के रूप में पूजा जाता था। केरल में शस्त्रों की पूजा और देवी आराधना तो अन्य प्रांतों की भांति होती ही है, लेकिन वहां दशहरे को विद्या आरंभ से जोड़ा जाता है। लोग अपने शस्त्रों के साथ-साथ पुस्तकों की भी पूजा करते हैं। यहां यह जानना भी रोचक है कि मध्यप्रदेश के उज्जैन के चार ब्राह्मण परिवारों में, मंदसौर के खानपुरा इलाके में, विदिशा जिले के रावन गांव में तथा बैतूल जिले के छतरपुर गांव में इस दिन रावण की पूजा की जाती है। मंदसौर के बारे में कहा जाता है कि यह रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका है तथा यहां दामाद की तरह रावण का सम्मान किया जाता है।

जहां तक चित्रांकन का प्रश्न है, पर्व के रूप में दशहरे को मनाने के चित्रण केवल आधुनिक काल के हैं। मध्यकाल के अंकन रावण वध के हैं। चूंकि राम द्वारा रावण को मारने के उपलक्ष्य में इस पर्व को मनाया जाता है, इसलिए मुगल, राजस्थानी और पहाड़ी शैलियों सहित अन्य शैलियों में रावण के मारे जाने की घटना ही चित्रित की गई है। सबसे पुराने अंकन मुगल शैली के हैं। अकबर के समय में ईस्वी सन 1584 से 1588 के बीच सचित्र रामायण चित्रित हुई। इस रामायण के बाद अब्दुल रहीम खानखाना ने अकबर के ही समय में रामायण का अंकन कराया। बाद के काल में राजस्थानी और पहाड़ी शैलियों में रामायण के प्रसंगों के काफी अंकन हुए। शिल्प परंपरा में भी इस पर्व के मनाने के उत्कीर्णन नहीं हैं।

रावण व्यक्ति नहीं, वृत्ति का प्रतीक है। वृत्ति ही व्यक्तित्व के मूल में होती है। यह आम मान्यता है कि वह अहंकारी था, इसलिए भगवान राम के हाथों मारा गया, पर यदि गहरे सोचें, तो लगेगा कि वह वास्तव में आत्ममुग्ध था। आत्ममुग्धता के गर्भ से अहंकार जन्मता है। आत्ममुग्धता हो तो मनुष्य स्वयं को औरों से श्रेष्ठ समझने लगता है और अपनी निजता के परकोटे में कैद हो जाता है। रावण और राम में यही अंतर है कि रावण आत्ममुग्ध था, जबकि राम लोकमुग्ध थे। दशहरे पर हम दस सिरों वाले रावण का दहन करते हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि ये दस सिर उसके दस अवगुणों के प्रतीक हैं। संदेश यह है कि दुर्गुण भस्म होने चाहिए। लेकिन सच यह भी है कि रावण शिवभक्त भी था। इसलिए हमारे पुरखों ने रावण दहन के माध्यम से यह संदेश भी दिया कि रावण और उसके शीश पर सज्जित दुर्गुणों का दहन जरूर करो, लेकिन जब विजयी होकर लौटो, तो आस्था के सद्गुण का स्वर्ण लेकर लौटो। इसलिए दशहरे का यह पर्व युगों-युगों से दुर्गुणों को भस्म करने और सद्गुणों को अंगीकार करने के पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। यह उसकी सार्थक व्यंजना का महत्वपूर्ण आयाम है।

रावण की तभी मृत्यु हो पाई, जब भगवान राम उसकी नाभि के अमृत को अपने बाण से मुक्त कर सके। जिस दिन रावण का अमृत पर से एकाधिकार समाप्त हुआ, उसी दिन से अमृत लोक की धरोहर हो गया। इसीलिए दशहरा मरणोत्सव है, लेकिन व्यापक अर्थ में यह मरणोत्सव समूची मानवता का अमृतोत्सव है, मनुष्यता की अमरता का सच्चा पर्व।

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