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अवामी जीत यानी जय बांग्ला, जय भारत

Mon, 31 Dec 2018 06:53 PM IST
Raman Singh प्रदीप कुमार
प्रदीप कुमार Published by: Raman Singh Updated Mon, 31 Dec 2018 06:53 PM IST
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Victory of awami League
शेख हसीना

बांग्लादेश के संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग ने दो तिहाई से अधिक बहुमत हासिल कर वाकई इतिहास बनाया है। इसका कारण है शेख हसीना की ऐतिहासिक उपलब्धियां। बांग्लादेश के 48 साल के जीवन में कई काम पहली बार हुए। वे सारे काम, जो उनके पिता बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान करना चाहते थे, लेकिन 1971 के मुक्ति संग्राम में हारी ताकतों ने उनकी हत्या करवा दी थी। बाद में अस्थिरता और दिशाहीनता का लंबा दौर चला। 2009 से अब तक प्रति व्यक्ति औसत आय तीन गुना हो गई। कामकाजी महिलाओं की संख्या दोगुना हो गई। लाखों नए लोगों को रोजगार मिला। 'भीख का कटोरा' कहे जाने वाले देश में औसत उम्र 72 साल हो गई, भारत से भी अधिक।


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इन सब बड़े-बड़े कामों की अनदेखी कर, विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेतृत्व में बने 'एक्य मोर्चा' ने नतीजों को संजीदगी से स्वीकार करने के बजाय धांधली का आरोप लगाते हुए दोबारा चुनाव की मांग की है। विपक्ष का केस बेदम है। अमेरिका, ब्रिटेन और कुछ अन्य यूरोपीय देशों का मीडिया कयास लगा रहा था कि 'दो अधिनायकवादियों' के बीच किसकी जीत होगी। यानी विपक्ष की हार और अवामी लीग की विराट विजय का पूर्वानुमान किसी को नहीं था। खुद सेनाध्यक्ष जनरल अजीज अहमद ने एलान किया कि इतना शांतिपूर्ण मतदान पहले कभी नहीं हुआ होगा।
 
हिंसा में 18 लोग मारे गए और 300 से ज्यादा घायल हुए। बीएनपी-जमात-ए-इस्लामी के गठजोड़ ने 2014 के चुनाव का बॉयकॉट किया था। उस चुनाव में भी 18 जानें गई थीं। उस हिंसा का सच यह है कि जमात के हथियारबंद दस्तों ने मतदान केंद्रों पर बमबाजी की थी। नेतृत्वहीनता और विश्वसनीयता की अनुपस्थिति ने भी विपक्ष पर प्रतिकूल प्रभाव डाला। बीएनपी की नेता, पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया भ्रष्टाचार के अभियोगों में जेल में हैं। उनके वारिस, बेटे तारिक रहमान 2004 के सीरियल विस्फोटों में सजा से बचने के लिए लंदन में आत्मनिर्वासन काट रहे हैं।

चुनाव में बीएनपी का नेतृत्व करने लिए कोई बड़ा नेता था ही नहीं। बीएनपी, जमात और अन्य दलों के मोर्चे के रहनुमा बने कमाल हुसैन। कमाल शेख मुजीब के अनन्य सहयोगी थे। पर शेख मुजीब की हत्या और उसके बाद ढाका सेंट्रल जेल में ताजुद्दीन अहमद जैसे वरिष्ठ नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों के हत्यारों के मोर्चे को कमाल के नेतृत्व पर जाहिर है, जनता यकीन नहीं करने वाली थी।
 
भारत के लिए गौरतलब यह है कि दोनों मोर्चों में कट्टरपंथी तत्व शामिल थे। अवामी लीग के साथ 'हिफाजत-ए-इस्लाम' था, जो कई कट्टरपथी दलों का गठबंधन है। एक काल परीक्षित सेक्यूलर पार्टी का कट्टरपंथियों से मोर्चा क्यों? इसे उपमहाद्वीपीय बाध्यताओं के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। बांग्लादेश में 1975 और 1990 के बीच अधिकतर इस्लामी पार्टियां वजूद में आईं। सऊदी अरब और कुवैत जैसे देशों की मदद से हजारों मदरसे खुल चुके हैं। इनमें पढ़ने वाले करीब 15 लाख छात्रों और उनके परिजनों की वोट ताकत का हिसाब लगाएं। अभी तक हुए चुनावों में इस्लामपसंद पार्टियों को छह से 14 फीसद तक वोट मिलते रहे हैं। कोई चतुर नेता इस संख्या बल से वंचित नहीं होना चाहेगा। एक फायदा यह भी कि 'हिफाजत-ए-इस्लाम' ने सभी हमदर्द वोट बीएनपी खाते में नहीं जाने दिए। कुल मतदाताओं में करीब दस फीसदी हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक वोटरों का लगभग पूरा वोट भी अवामी लीग के पक्ष में गया।

इस चुनाव में भारत का क्या-क्या दांव पर लगा हुआ था, यह समझने के लिए एक मिसाल काफी होगी। बांग्लादेश सरकार ने मतदान से करीब तीन हफ्ते पहले ढाका स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग पर अंदरूनी मामलों में दखल और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगाया। शेख हसीना के काल में भारत विरोधी उग्रवादियों के नकेल लगी है। बीएनपी-जमात की जीत भारत के खिलाफ एक पुराने मोर्चे को फिर सक्रिय कर देती। विजय की यह मधुरिम वेला भारतीय राजनय के लिए चुनौती भी पेश करेगी। लालफीताशाही और क्षुद्र राजनीति (याद करें, ममता बनर्जी ने ऐन वक्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ ढाका जाने से किस तरह इनकार किया था) का स्थान दूरगामी राष्ट्रीय हितों से प्रेरित राजनय को लेना होगा।

आने वाले दिनों में तीस्ता समझौता हो जाए और वाया बांग्लादेश पूर्वोत्तर राज्यों तक जाने का गलियारा मिल जाए, तो वह भारत विरोधियों की बड़ी शिकस्त होगी। पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। सच यह है कि कई बार हम बड़ा दिल नहीं दिखा पाए हैं। गलतियां सुधारने का मौका बार-बार नहीं मिला करता।

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