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सुरंग हादसा: सेना को सलाम, आपदा प्रबंधन में कौशल देख बढ़ा विश्वास

Arunendra Nath Verma अरुणेंद्र नाथ वर्मा
Updated Wed, 29 Nov 2023 07:12 AM IST
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सार
सिलक्यारा के निकट भीषण सुरंग दुर्घटना में फंसे 41 मजदूरों को थलसेना एवं वायुसेना के साहस, समर्पण और कौशल से बाहर निकाल लिया गया है।
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Uttarkashi Tunnel Tragedy Indian Army skill in disaster management strengthen with successful rescue operation
सिलक्यारा ऑपरेशन सफल - फोटो : amar ujala

विस्तार

चारधाम यात्रा के लिए बनाए जा रहे राजमार्ग पर सिलक्यारा के निकट भीषण सुरंग दुर्घटना में फंसे 41 मजदूरों के निकलने का इंतजार पूरा देश पिछले 16 दिनों से कर रहा था। उन्हें बचाने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान ने हर संभव प्रयत्न किया। उसने देश-विदेश के आपदा विशेषज्ञों से सलाह और मदद भी मांगी, ताकि सुरंग में फंसे मजदूरों को निकाला जा सके। इस कठिन काम में बीआरओ, स्वास्थ्य सेवाओं, ओएनजीसी जैसे कई संस्थाओं ने अथक परिश्रम किया, जिससे उन मजदूरों का मनोबल बढ़ा।



ध्वस्त सुरंग के अंदर सुराख बनाना सबसे जरूरी काम था, ताकि मजदूरों को राहत पहुंचाने के साथ उन्हें बाहर निकाला जा सके। इसके लिए शक्तिशाली ‘ऑगर’ मशीन का प्रयोग किया गया, मगर दुर्भाग्यवश इस मशीन के ब्लेड ध्वस्त सुरंग के मलबे में दबी सरिया और चट्टानों से टकराकर क्षतिग्रस्त हो गए। अंततः हाथ के औजारों से थोड़ा-थोड़ा मलबा खोदकर निकालते हुए फंसे मजदूरों तक पहुंचने का निर्णय लिया गया। इस धीमी और मुश्किल प्रक्रिया को रैट माइनिंग नाम दिया गया था। इसके अलावा सुरंग के ऊपर से कुएं की खुदाई की तरह सीधे नीचे खोदने के लिए ड्रिलिंग मशीनों का उपयोग किया गया। इस तरीके में भी करीब 40 मीटर तक खुदाई करने के बाद सुरंग को मजबूती देने के लिए बनाए गए सरिया के जाल का अवरोध मिलने की पूरी आशंका थी।


इन दोनों तरीकों को समझ लेने के बाद पता चलता है कि अंतिम और बेहद नाजुक दौर में सेना की मदद क्यों ली गई। दुर्गम जगह में खुदाई करने के बाद वेल्डिंग से धातु काटने के कठिन काम को अंजाम देने के लिए स्थल सेना की इंजीनियरिंग कोर की मद्रास सैपर्स इकाई के सैनिकों को लगाने का यही कारण था कि वे दुश्मन द्वारा बिछाई गई विध्वंसक सुरंगों को बेहद सावधानी से साफ करने में माहिर होते हैं। सिलक्यारा की ध्वस्त सुरंग में रैट माइनिंग की प्रक्रिया बेहद खतरनाक थी, क्योंकि वह संकरी सुरंग मलबा गिरने से और अवरुद्ध हो सकती थी। इस काम में हमारे जांबाज सैनिकों से सफलता की पूरी उम्मीद थी।  

अंतिम चरण के पहले ही इस आपदा में भारतीय वायुसेना बहुत महत्वपूर्ण किरदार अदा कर चुकी थी।  जिस दुर्गम क्षेत्र में बॉर्डर रोड जैसी इकाइयों के जेसीबी और सड़क बनाने, चट्टानें काटने के भारी उपकरण हफ्तों या महीनों के परिश्रम से पहुंच पाते हैं, वहां विशालकाय 25-30 टन भारी आगर ड्रिलिंग मशीनों को पहुंचाने का जटिल काम वायुसेना की सहायता के बिना असंभव होता।

दुर्घटना स्थल से सबसे निकट की हवाई पट्टी धरासू में थी, जो भारी ट्रांसपोर्ट विमानों के उपयोग योग्य नहीं थी। ऑगर मशीन का भारी बोझ लेकर वायुसेना के सी-17 और सी-130 जे हर्क्यूलिस जैसे विमान वहां उतर सकेंगे या नहीं, इसका आकलन वायुसेना ने आनन-फानन में पूरा किया। इसी वर्ष सूडान में फंसे हुए 121 भारतीयों को बेहद कठिन स्थितियों में निकाल कर वायुसेना सिद्ध कर चुकी है कि उड्डयन कौशल में वे सर्वश्रेष्ठ श्रेणी के हैं। सूडान में सैय्यदाना की ऊबड़-खाबड़ हवाई पट्टी पर रात में नाइट विजन गोगल्स लगाकर उतरने और टेक ऑफ करने वाले कुशल वैमानिकों के लिए धरासू की हवाई पट्टी भी वैसी ही एक चुनौती थी। और वायुसेना ने सी-17 जैसे भारी विमान के साथ दो सी-130 जे हर्क्यूलिस विमानों को वहां उतार कर अद्भुत प्रदर्शन किया, जहां भारी सामान निकालने के लिए ऑफलोडिंग प्लेटफार्म और उपकरण तक नहीं थे। वायुसेना के हेलिकॉप्टर भी उस क्षेत्र का सर्वेक्षण करने में सहायक सिद्ध हुए।

यों तो सिलक्यारा सुरंग में फंसे 41 मजदूरों को बाहर निकलने के बाद अस्पताल पहुंचाने के लिए 41 एम्बुलेंस गाड़ियां प्रतीक्षारत थीं, लेकिन जरूरत पड़ने पर वायुसेना के हेलिकॉप्टर भी तुरंत उपलब्ध कराने की तैयारी की गई थी। अब जहां सिलक्यारा सुरंग में फंसे 41 मजदूरों के सकुशल बाहर निकल आने पर एक सौ चालीस करोड़ देशवासियों में खुशी की लहर है, वहीं आपदा प्रबंधन के सबसे महत्वपूर्ण चरण में थलसेना और वायुसेना के साहस, समर्पण और कौशल के प्रति भी उनका विश्वास और मजबूत हुआ है।
-लेखक सेवानिवृत्त विंग कमांडर हैं।

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