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यूसीसी: सही दिशा में छोटा कदम, पूरे देश के लिए साबित हो सकता है नजीर

Wed, 07 Feb 2024 07:44 AM IST
virag gupta विराग गुप्ता
Updated Wed, 07 Feb 2024 07:44 AM IST
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सार
उत्तराखंड में बन रहा नया कानून संविधान के नजरिये से पूरे देश के लिए नजीर साबित हो सकता है, जिससे प्रेरणा लेकर ‘एक देश एक कानून’ के तहत यूसीसी को पूरे देश में जल्द लागू करने की जरूरत है। इससे संविधान निर्माताओं द्वारा देखा गया लैंगिक समानता का स्वप्न सही मायने में साकार हो सकेगा।
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Uttarakhand UCC can prove example for entire country constitutional point of view One Nation One Law
समान नागरिक संहिता - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

संविधान के प्रावधानों को साकार करते हुए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर कानून बनाने की ऐतिहासिक पहल की है। संविधान की शुरुआत 'सत्यमेव जयते' से होती है, जहां सारनाथ का सिंह कानून के शासन के महत्व को दर्शाता है। गणतंत्र के 75 साल बाद भी यूसीसी पर चल रहे असमंजस को संविधान में उकेरे गए पौराणिक आख्यानों से समझा जा सकता है। संविधान सभा में के. एम. मुंशी जैसे सदस्यों की बात मानकर अगर यूसीसी को मूल अधिकार वाले अध्याय में शामिल किया जाता, तो यह कानून सभी के लिए बाध्यकारी हो जाता। मूल अधिकार वाले अध्याय-3 में रावण को पराजित करने के बाद लौट रहे राम-लक्ष्मण और सीता के साथ अधर्म पर धर्म की जीत का चित्र है। लेकिन नजीरुद्दीन अहमद जैसे सदस्यों के विरोध की वजह से इसे मार्गदर्शक सिद्धांत वाले अध्याय-4 में डाला गया। जहां कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण गीता के उपदेश से अर्जुन के मोह को हरने की कोशिश करके कर्म के लिए प्रेरित कर रहे हैं।



संविधान में स्त्री और पुरुष, दोनों को बराबरी से चुनावों में वोट डालने का अधिकार है। सभी धर्मों के स्त्री और पुरुषों के लिए आपराधिक कानून भी समान हैं। लेकिन शादी, तलाक, बच्चे और  संपत्ति से जुड़े सिविल मामलों में धर्म के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव होना दुर्भाग्यपूर्ण है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद की बातों पर अमल करते हुए वर्ष 1956 में हिंदू कोड बिल के साथ मुस्लिम समुदाय के लिए भी कानून बनना चाहिए था। वर्ष 1985 में शाहबानो मामले के बाद भी इस बारे में ठोस कदम उठाया जा सकता था। उसके बजाय तुष्टीकरण नीति के तहत सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने से कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा ही मिला।


इंडोनेशिया, बहरीन, तुर्किये और लेबनान जैसे कई मुस्लिम देशों में आधुनिक कानून लागू हैं, तो फिर भारत में ओवैसी जैसे कट्टरपंथी नेताओं द्वारा धर्म के आधार पर यूसीसी के विरोध को प्रधानता क्यों मिलनी चाहिए? पर्सनल लॉ के नाम पर रजस्वला होने के बाद नाबालिग मुस्लिम लड़कियों की शादी का समर्थन करने वालों को शरीयत ऐक्ट की धारा 3-बी पढ़ने की जरूरत है। कॉन्ट्रैक्ट ऐक्ट की धारा-11 के तहत ऐसे अनुबंध में दोनों पक्षों का सक्षम यानी बालिग होना जरूरी है। इसलिए शरीयत ऐक्ट की आड़ में नाबालिग मुस्लिम बच्चों की शादी गलत है।

सियासी बवाल और धार्मिक विरोधाभास के साथ कई कानूनी चुनौतियां भी हैं। पहला, लिव-इन के दौर में बहु-विवाह पर प्रभावी रोक कैसे लगेगी? प्रस्तावित कानून में लिव-इन में रहने की स्वघोषणा के साथ अभिभावकों को सूचना देने का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले और कानून के बावजूद सभी शादियों के रजिस्ट्रेशन के नियमों का पालन नहीं हो रहा, तो फिर लिव-इन के दौर में शादी और तलाक के मामलों का निर्धारण कैसे होगा?

दूसरा, देश के कानून के अनुसार, शादी के लिए न्यूनतम उम्र लड़कियों के लिए 18 साल और लड़कों के लिए 21 साल है। लड़कियों की शादी की उम्र 18 से 21 साल करने पर संसद में कई साल से सिर्फ मंथन हो रहा है। उत्तराखंड में पूर्व जज की कमेटी ने भी माना है कि बाल-विवाह के पीछे अशिक्षा और गरीबी बड़ी वजह है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, नाबालिग बच्चों के सहमति से बने संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए। इसलिए लड़कियों की उम्र को बढ़ाने के बजाय लड़कों की शादी की न्यूनतम उम्र को भी 18 साल करने पर विचार होना चाहिए। इससे लैंगिक समानता के साथ कानून-पालन का भाव बढ़ेगा।

तीसरा, कुछ लोग यूसीसी को जनसंख्या विस्फोट से निपटने का कारगर उपाय मानते हैं। भारत में कई दशकों से जनसंख्या नियंत्रण पर सिर्फ कानून बनाने की बात हो रही है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि अगले 10 वर्षों में कामकाजी आबादी कम होने के साथ बूढ़ों की तादाद भी बढ़ जाएगी। यूसीसी के तहत लिव-इन से पैदा होने वाले नाजायज बच्चों को भी कानूनी अधिकार मिलेंगे। सरोगेसी के तहत भी लोग बच्चे पैदा करते हैं। इन नई चुनौतियों के बीच दो बच्चों की नीति पर प्रभावी अमल कैसे होगा?  

उत्तराखंड के अलावा, मध्य प्रदेश और गुजरात में भी ऐसी पहल हो रही है। समवर्ती सूची में यूसीसी से जुड़े अनेक मामलों पर संसद ने कानून बनाए हैं। कई विषयों पर कानून बनने की जोरों से बात हो रही है। इसलिए उत्तराखंड विधानसभा में पारित होने के बाद राज्यपाल इसे केंद्रीय गृह मंत्रालय और राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज सकते हैं। सियासत के नजरिये से राज्यों में कानून बनाना लाभकारी हो सकता है, लेकिन कई राज्यों में मनमाने तरीके से कानून निर्माण से गलत मिसाल के साथ सांविधानिक अराजकता भी बढ़ सकती है।

आईपीसी, सीआरपीसी और एविडेंस ऐक्ट के औपनिवेशिक कानूनों के बजाय पूरे देश के लिए नए आपराधिक कानून बनाए गए हैं। नकल रोकने के लिए भी संसद से राष्ट्रीय स्तर पर कानून बन रहा है। तीन तलाक पर भी केंद्र सरकार ने प्रभावी कानून बनाया है। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत दी गई राज्य की परिभाषा और विधि आयोग की सिफारिशों के अनुसार, संसद से पूरे देश के लिए यूसीसी कानून बनना चाहिए।
यूसीसी का मुद्दा 1989 से भाजपा के घोषणा-पत्र का हिस्सा रहा है। जिस तरीके से अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को संसद के कानून से निरस्त किया गया, उसी ठोस तरीके से यूसीसी पर राज्यों के बजाय केंद्रीय स्तर पर अमल की जरूरत है। विधि आयोग की रिपोर्ट में यूसीसी के लागू होने पर अनेक व्यावहारिक अड़चनों का विवरण है।

उत्तराखंड में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की समिति ने बड़े स्तर पर सभी पक्षों के साथ विमर्श किया है। उन पहलुओं पर पूरे देश में स्वस्थ बहस करने के बाद राष्ट्रीय सहमति बनाने की जरूरत है। उत्तराखंड में बन रहा नया कानून संविधान के नजरिये से पूरे देश के लिए नजीर साबित हो सकता है। महात्मा गांधी और डॉ. आंबेडकर ने स्त्री-पुरुष के सामान अधिकारों पर जोर दिया था। इसलिए उत्तराखंड से प्रेरणा लेकर ‘एक देश एक कानून’ के तहत यूसीसी को पूरे देश में जल्द लागू करने की जरूरत है। इससे संविधान निर्माताओं द्वारा देखा गया लैंगिक समानता का स्वप्न सही मायने में साकार हो सकेगा।
(-लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं)

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