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नदियों से हुई ज्यादती का हिसाब कौन देगा?
पुरुषोत्तम शर्मा
Updated Fri, 21 Jun 2013 09:19 PM IST
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उत्तराखंड में आई भयानक आपदा की पूरी तस्वीर आनी बाकी है। अब तक जो भी तस्वीरें और रिपोर्ट सामने आ रही हैं, वह चारधाम यात्रा स्थलों और मार्गों से जुड़ी हैं। जिन 75 हजार लोगों के फंसे होने और कुछ सौ के मरने या लापता होने की खबरें हैं, वह भी तीर्थ यात्रियों से संबंधित एक अनुमान मात्र ही है।
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इस तबाही में स्थानीय लोगों व गांवों का जो नुकसान हुआ है, अब तक न तो उसकी सुध लेने का किसी को समय है और न ही राज्य सरकार के आपदा प्रबंध की योजना में ही ऐसा दिख रहा है। तबाही का मंजर बता रहा है कि मौतों का आंकड़ा हजारों में है। मगर हमारा कानून तो बरामद लाश को ही मृत मानता है। अब उस अलकनंदा, भागीरथी और गौरी के रौद्र रूप से कौन उन हजारों लाशों को खोज ला पाएगा, ताकि उन्हें हमारा कानून मृत बता सके।
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हमारी सेना और आईटीबीपी के जवान रेस्क्यू ऑपरेशन में जी-जान से जुटे हैं और उनकी प्राथमिकता फंसे यात्रियों का जीवन बचाना और रास्तों को खोलना है, ताकि राहत दल और सामग्री प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंच सके। मगर जितने बड़े पैमाने पर तबाही हुई है, उसमें इस तरह से कई जगहों तक पहुंचने में महीनों लग सकते हैं।
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इस आपदा को प्रकृति की मार कह कर हम राज्य सरकार की आपराधिक गैरजिम्मेदारियों पर पर्दा नहीं डाल सकते। मौसम विज्ञान की आधुनिक तकनीक के इस युग में हम पूर्वानुमान के आधार पर जानमाल के इतने बड़े नुकसान को कम कर सकते थे। इस बार तबाही से पूर्व ही मौसम विभाग ने पर्वतीय क्षेत्र में पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने और मानसून के एक सप्ताह पूर्व ही पहुंचने की भविष्यवाणी कर दी थी।
जाहिर है, जब एक तरफ पश्चिमी विक्षोभ और दूसरी तरफ मानसून एक साथ सक्रिय है, तो भारी बारिश या बादल फटने जैसी स्थिति का पैदा होना सामान्य बात है। ऐसे में एक दिन पूर्व ही चारधाम यात्रा को रोकने और संवेदनशील स्थानों से लोगों को सुरक्षित जगहों तक लौट आने का अलर्ट जारी हो जाना चाहिए था। मगर ऐसा नहीं हुआ और हमेशा की तरह निर्लज्ज सरकार और उसकी नौकरशाही आपदा की फसल काटने के लिए अब तत्पर दिख रहे हैं।
प्राकृतिक आपदा के प्रति राज्य सरकार कितनी संवेदनशील है, इसे दो उदाहरणों से देखा जा सकता है। केंद्र सरकार के मौसम विज्ञान विभाग ने मौसम की पूर्व जानकारियां एकत्र करने के लिए राज्य में दो राडार स्थापित करने के लिए मसूरी और नैनीताल में जमीन की मांग की थी, मगर तीन साल बाद भी जमीन मौसम विज्ञान विभाग को नहीं मिली है।
दूसरा उदाहरण, वर्ष 2010 तक राज्य में आपदा से प्रभावित 243 गांवों को विस्थापित कर पुनर्वास के लिए चुना गया था, जिनकी संख्या मार्च, 2013 तक बढ़कर 550 हो गई। मगर अब तक मात्र एक गांव छातीखाल (रुद्रप्रयाग) का ही अधूरा पुनर्वास हुआ है। राज्य बनने के बाद सिर्फ जमीनों को ही खुर्द-बुर्द कर रही उत्तराखंड की सरकारें विस्थापितों के पुनर्वास के लिए जमीन न मिलने का रोना रो रही हैं, जबकि इसी बीच ये सरकारें पूंजीपतियों, बिल्डरों, धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं, नौकरशाहों और नेताओं को राज्य की लगभग एक लाख हेक्टेयर भूमि दे चुकी हैं।
पहाड़ में जितनी बड़ी बाढ़ आती है, नदियां उतनी ही गहरी होती जाती हैं। इस बात की पुष्टि उन नदियों से की जा सकती है, जहां अभी विद्युत परियोजना नहीं बनी हैं। आज अगर इस आपदा के बाद नदी किनारे आठ से दस फुट गाद या मलबा पट गया है, तो यह सुरंग आधारित विद्युत परियोजनाओं द्वारा नियम विरुद्ध नदी में गिराए गए मलबे के कारण है।
मुनाफे के लिए उनके द्वारा किए गए इस अपराध से नदी किनारे हुई इस तबाही की कीमत विद्युत कंपनियों से वसूली जानी चाहिए। पर्यटकों को प्रकृति के और करीब लाकर धन कमाने और इसके लिए नदियों, पहाड़ों, जंगलों व सड़कों को सत्ता के संरक्षण में कब्जा करने की जो होड़ उत्तराखंड में मची है, उसके बाद इन भवनों को नदी में समाते देखना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। सत्ता के संरक्षण में चल रहे इस गोरखधंधे से हो रहे जानमाल के नुकसान को रोकने की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
(लेखक अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव हैं)