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उत्तराखंड की त्रासदी तो ट्रेलर है
Updated Fri, 21 Jun 2013 09:24 PM IST
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उत्तराखंड की त्रासदी ने मानवीय संवेदनाओं को हिला कर रख दिया है। मशहूर पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह इस हादसे के लिए पर्यावरण से की जा रही लगातार छेड़छाड़ को जिम्मेदार मानते हैं। इस त्रासदी के कारणों और निदान पर विजय गुप्ता ने उनसे खास बात की :
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-उत्तराखंड की आपदा के लिए हम जिम्मेदार हैं या यह प्रकृति की मार है?
उत्तराखंड में 'जल प्रलय' से हुई तबाही के लिए प्रकृति किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं है। इसके लिए सीधे तौर पर हम सब जिम्मेदार हैं। लगातार कहने के बावजूद प्रकृति से खिलवाड़ करना बंद नहीं किया जा रहा है। पहाड़ों को प्रकृतिविहीन किया जा रहा है, जिसके कारण उनकी शक्ति कम हो रही है। इसी के चलते पिछले दिनों उत्तराखंड में पहाड़ों पर जब पानी का भारी दबाव हुआ, तो वह सहन नहीं कर पाया और सारा का सारा बरसात का पानी नीचे आ गया।
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-पहाड़ों की सहनशीलता की तो मिसाल दी जाती है, फिर ऐसा क्यों हुआ?
यह सही है कि सहनशीलता, धैर्य और अडिग रहने की तुलना पहाड़ से की जाती है। लेकिन हिमालय में धैर्य की कमी है, क्योंकि हिमालय को युवा पहाड़ कहा जाता है। जिस तरह से युवाओं में धीरज नहीं होता उसी तरह से हिमालय भी है। हिमालय में धैर्य की भावना अरावली पर्वत जैसी नहीं है। इसी कारण हिमालय को जो भी मिलता है, वह उगल देता है। हिमालय में यदि धैर्य की क्षमता होती तो गंगा और अन्य नदियों में साल भर पानी रहता।
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-इस तरह के विनाश को रोकने का क्या रास्ता है?
बाढ़, सूखा और भूकंप जैसी तबाही को रोकने के लिए जरूरी है कि पहाड़ों पर बांध बनाने का काम तत्काल रोका जाए। जंगलों की कटाई और नदियों में खनन बंद होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो इससे भी बड़ा हादसा कभी भी हो सकता है। उत्तराखंड की ये तबाही सिर्फ नमूना भर है। अभी तो मानसून सक्रिय भी नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में जब देश भर में मानसून सक्रिय हो जाएगा, तब कहीं पहाड़ों पर ऐसी बारिश हुई तो उसका क्या परिणाम होगा। इस स्थिति की कल्पना से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
-पर्यावरणविद तो बाढ़ के लिए नदियों में भरी गाद को कारण बताते हैं, ऐसे में खनन तो जरूरी है?
कोई भी पर्यावरणविद गंगा, यमुना या अन्य नदियों में खनन को सही नहीं मानता। यह कथन सिर्फ सरकार और अधिकारियों का है, क्योंकि खनन के जरिये उनकी जेबें भरती हैं। गंगा और यमुना स्वयं अपनी सफाई कर लेती हैं। इसके लिए खनन की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन इन नदियों की स्वतंत्रता और पवित्रता ही खत्म कर दी गई है। इसके चलते दोनों ही नदियां न सिर्फ प्रदूषित हो गई हैं, बल्कि यमुना को तो अस्तित्व भी समाप्त हो रहा है। सरकार उन्हें प्रदूषण मुक्त करने के बजाए सफाई के नाम पर खनन को बढ़ावा देती है, जो गलत है।
-हाल ही में विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उत्तराखंड जैसे हादसे जो कभी सौ-दो सौ वर्षो में हुआ करते थे, वह अब हर दस साल में हो सकते हैं?
यह सही है, क्योंकि जिस तरह से पहाड़, जंगल और नदियों का अस्तित्व समाप्त किया जा रहा है। उससे दस वर्षों में नहीं, ऐसी आपदाएं हर साल आ सकती हैं। अभी तो गंगा ने ही अपना रौद्र रूप दिखाया है। जिस दिन यमुना अपना रौद्र रूप दिखाएगी, उस दिन दिल्ली सहित उत्तर भारत के कई राज्यों में तबाही आ सकती है। पिछले पंद्रह वर्षो से पर्यावरणविद और वैज्ञानिक इसके लिए सरकार को चेतावनी दे रहे हैं, मगर उसने अनसुना कर दिया है। दिल्ली में यमुना के किनारे कंक्रीट का जाल बिछाकर निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं। जो आने वाले दिनों में बड़े हादसे का रूप ले सकते हैं।