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Hindi in USA: अब हिंदी बोलेंगे अंकल सैम

Wed, 21 Dec 2022 05:17 AM IST
Umesh chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Wed, 21 Dec 2022 05:17 AM IST
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सार
यह सामान्य धारणा है कि अमेरिका, ब्रिटेन या अन्य अंग्रेजीभाषी देशों के सभी नागरिक अंग्रेजी जानते-बोलते हैं। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है।
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USA and Uncle Sam will speak Hindi
USA-India - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भाषायी अस्मिता की जब भी चर्चा होती है, स्वाभाविक तौर पर भाषायी साम्राज्यवाद का जिक्र होता ही है। इसके लिए वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के सबसे प्रमुख देश अमेरिका को जिम्मेदार ठहराना अब नई बात नहीं रही। चूंकि अंग्रेजी का नाभिनाल ब्रिटेन है, लिहाजा सवालों के घेरे में ब्रिटेन भी आ ही जाता है। ब्रिटिश और अमेरिकी संस्कृति और अंग्रेजी की पकड़ बनी हुई है। लेकिन लगता है कि अब अमेरिका का नजरिया बदलने लगा है। अब वहां के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के मुख्य भाषणों का अनुवाद हिंदी समेत अमेरिका की कुछ मूल भाषाओं में भी किया जाएगा।



यह सामान्य धारणा है कि अमेरिका, ब्रिटेन या अन्य अंग्रेजीभाषी देशों के सभी नागरिक अंग्रेजी जानते-बोलते हैं। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। उन देशों में भी बड़ी आबादी ऐसी है, जो अपना दैनंदिन व्यवहार से लेकर दूसरी तमाम गतिविधियों के लिए अपनी बुनियादी भाषाओं का ही सहारा लेती है। 2021 के आंकड़े के मुताबिक, अमेरिका की आबादी तैंतीस करोड़ से कुछ ज्यादा है, जिसमें करीब ढाई करोड़ लोग ऐसे हैं, जो एशियाई मूल के हैं या फिर हवाई-प्रशांत द्वीप समूह के मूल निवासी हैं, जिन्हें अंग्रेजी की समझ कम है। अंग्रेजी की सीमित समझ की वजह से इन्हें पता ही नहीं चलता कि उनके राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति की किसी खास मुद्दे पर राय क्या है? अमेरिकी तंत्र में गंभीरता से यह सोचा जाने लगा था कि सफल लोकतंत्र के लिए सरकार और उसके मुखिया की सोच लोकतंत्र के अंतिम पायदान पर पहुंचना चाहिए।


अमेरिकी राष्ट्रपति को एशियाई-अमेरिकी, हवाई मूल निवासी और प्रशांत द्वीप समूहों से संबंधित सलाह देने के लिए एक आयोग काम करता है। इस आयोग के एक सदस्य भारतीय मूल के अजय जैन भूटोरिया हैं। उन्होंने दिसंबर के पहले सप्ताह में हुई आयोग की बैठक में हवाई मूल और प्रशांत द्वीप समूह के साथ ही हिंदी में अमेरिकी राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के भाषणों का अनुवाद करने का सुझाव दिया, जिसे आयोग ने स्वीकार कर लिया। यह तय है कि जब भाषा बोलने वाला समूह आर्थिक और राजनीतिक रूप से ताकतवर होने लगता है, तो उसकी भाषा को भी मान मिलने लगता है। अमेरिका स्थित भारतीय समुदाय की स्थिति अब बदलने लगी है। अब वह वहां सिर्फ नौकरी नहीं करता, बल्कि उसकी राजनीति और अर्थव्यवस्था में प्रभावी उपस्थिति है। चूंकि अमेरिकी एशियाई लोगों के बीच आपसी संवाद के लिए सबसे मुफीद भाषा हिंदी है, इसलिए वह विशेषकर दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों के लोगों के बीच कहीं ज्यादा प्रभावी है। हिंदी की इस ताकत को अमेरिकी राष्ट्रपति रहते वक्त बराक ओबामा और डोनॉल्ड ट्रंप ने भी समझा। ओबामा ने 27 जनवरी, 2015 को दिल्ली के सीरीफोर्ट ऑडिटोरियम में छात्रों और युवाओं को संबोधित करते हुए शाहरूख-काजोल अभिनीत फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के मशहूर संवाद की पैरोडी को हिंदी में ही बोला था। 

ओबामा ने तब कहा था, ‘सेनोरिटा, बड़े-बड़े देशों..आप मेरे कहने का मतलब जानते हैं।' भारतीय धरती पर अंग्रेजी के रहनुमा की जुबान से ठेठ हिंदी में निकले इन शब्दों ने उपस्थित लोगों को इतना भाव-विभोर किया था कि देर तक तालियां बजती रही थीं। अमेरिका स्थित हिंदीभाषियों का दिल जीतने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2014 का नारा ही अपना लिया था। तब मोदी ने नारा दिया था, अबकी बार, मोदी सरकार। ट्रंप ने 2016 में अपने चुनाव अभियान के दौरान उसे बदल दिया था, अबकी बार ट्रंप सरकार। 

यह उस अमेरिका में आया बदलाव है, जिसने अपने सार्वजनिक प्रसारक वॉयस ऑफ अमेरिका की हिंदी सर्विस का प्रसारण 30 सितंबर, 2008 को बंद कर दिया था। यह सच है कि भारत में उदारीकरण जैसे-जैसे तेज होता गया, स्थानीय स्तर पर हिंदी को लेकर भाव बदलता गया। अमेरिकी लोकतंत्र में भारतीयों की धमक बढ़ी है, इसलिए अंकल सैम को भी हिंदी बोलने पर मजबूर होना पड़ा है। अंकल सैम की धरती पर जब भारतीयों के बीच आपसी संवाद का जरिया हिंदी बन सकती है, तो अपने देश में क्यों नहीं...वैसे अपने भी देश में हिंदी की वैसी स्थिति है, संकुचित राजनीति ऐसा सोचने नहीं देती।
 

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